जब दुख तुम्हें सताए\ कविता - rashtrmat.com

जब दुख तुम्हें सताए\ कविता

कल्पना मनोरमा दिल्ली में रहती हैं। कहानियां,कविता और जन सरोकार से जुड़े विषयों पर लेख लिखती हैं। यहां उनकी एक कविता दे रहे हैं। उनकी कविताएं बतियाती हैं। विलक्षण कलात्मकता और सघन वैचारिकता आज कल कविता में कम दिखती हैं,और जहां दिखती हैं वहां कवित्व का उजास देखते ही बनता है। आप भी कल्पना की इस कविता को पढ़ते हुए वैचारिक ताप महसूस करेंगे।

            कविता

 जब दुख तुम्हें सताए

तुम हरहराती नदी में जाकर

चुपचाप सो जाना

उठकर किसी पेड़ की जड़ में बांध आना

कच्चे सूत का डोरा

पतझड़ में गिरी पत्तियों को बीनकर

भर लेना काँच के मर्तवान में

मंगलसूत्र उतार कर

टांग देना दरवाजे के पीछे कील पर

अंगीठी की गर्म राख में

गाड़ देना अपने हिस्से की शकरकंद

जिसे अवसर न मिलने पर

छिपा रखा था तुमने आलू के टोकरे में

सड़क पर महीनों से ठिलयाये गए

कंकड़ को रास्ते से उठाकर

रख आना ऊंचाई पर

फिर सुनना पगडंडी की धड़कन

किसी मासूम बच्चे को

दे आना दिलासा,

उदास स्त्री के चेहरे पर छिड़क आना

ठाकुर जी का चरणोदक

दिन के प्रथम पहर में

नहा आना अघाट और

कह आना किनारे पर खड़ी

लमहरा घास के कान में

पानी की बेलाग पीर

जो सुनी थी तुमने

स्नान के दौरान

पुरानी धोती की तरह चीर देना

हवा के पल्ले को

और बांध लेना कलाई पर

दर्द के कुनबों में घुसकर

सिसकियों की पैरवी सुनना ध्यान से

चौराहे पर

ताली बजाते किसी किन्नर को

देखकर घृणा मत करना

पैसे न हों तो मत देना

मगर दे आना दुआएं उसे

गरीब के झोपड़े में

किटकिटाती सर्दीली रात में

किसी जच्चा की कथरी में

छिपा आना अपनी बचत का सूरज

फिर भी अपने आंसुओं को

बचाये रखना और

बे मौसम बारिशों में खबू नहाना

भुरभुरी होकर ढह जाना

किसी खेत की माटी में

किसान जब बोएगा बीज

तब तुम उग आना पूरी ताकत से

फिर देखना

चाँद चूमेगा माथा तुम्हारा

आख़िर दर्द की भी तो

एक मियाद होती है।

  • कल्पना मनोरमा
  • MO-8953654363