भारतीय राजनीति की एक संवेदनशील परत - rashtrmat.com

भारतीय राजनीति की एक संवेदनशील परत

पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की किताब में कही गई कुछ बातें और उस पर राहुल गांधी की टिप्पणी—ये सिर्फ़ एक किताब या एक बयान का विवाद नहीं है, बल्कि  सेना–राजनीति–लोकतंत्र के रिश्ते की कसौटी है।भारतीय राजनीति पर संभावित असर- सेना की निष्पक्षता पर बहस भारत में सेना को अब तक राजनीति से ऊपर और संस्थागत रूप से तटस्थ माना गया है। एक नागरिक के रूप में नरवणे को बोलने का पूरा अधिकार है। लेकिन एक पूर्व सेनाध्यक्ष के रूप में उनकी बातों को:अंतिम सत्य नहीं बल्कि एक पक्ष या एक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।

                         सतीश कुमार \ भारतीय राजनीति की एक संवेदनशील परत 

ज्यादा जाल बुनना कभी कभी खुद को ही फंसाता है। इस‌ सप्ताह लोकसभा में सरकार के साथ ऐसा ही हुआ। संसद की रवायत है कि राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर नेता प्रतिपक्ष बहस शुरू करेगा एवं पूरी बहस का उत्तर प्रधानमंत्री देंगे। लाजिमी है कि अभिभाषण में सरकार का बखान और विपक्ष से सरकारी रीति नीति की तीखी आलोचना हो, जैसा कि अविश्वास या विश्वास प्रस्ताव पर होता है। प्रतिपक्ष के श्री नेता राहुल गांधी ने भाषण शुरू किया एवं चीन के संग डोकलाम के सीमा टकराव की वारदात पर पूर्व जनरल श्री नरवड़े की लिखी किताब के अंशों को उद्धृत कर सरकार पर नुक्ते के सीधे हमलों की शुरुआत की। उससे अनावश्यक ही असहज हुई सरकार और उसके बचाव की जिम्मेदारी में स्पीकर ने इसे नाक का प्रश्न बना कर श्री राहुल गांधी को न बोलने देने की रणनीति अपना ली। उन्हें कहा गया कि किताब प्रकाशित नहीं है और आप उसे उद्धृत नहीं कर सकते, जबकि किताब भले लंबे समय से रक्षा विभाग ने समीक्षा के नाम पर लटका रखी हो, पर वह छप चुकी है, उसके वे अंश एक जर्नल में जहां छप चुके हैं, वहीं किताब विदेशों में उपलब्ध है। फलत: सारी बातें सार्वजनिक हलके में हैं।

नेता प्रतिपक्ष उसके अंश पढ़े बिना उस विषय पर बोलने लगे, तो चेयर ने एक अपूर्व रूलिंग दी कि आप वह विषय बोल ही नहीं सकते, जो अभिभाषण में नहीं हैं, यद्यपि इसके विपरीत यही स्पीकर सन् 2020 में रूलिंग दे चुके हैं कि उन विषयों पर भी बोल सकते हैं, जो अभिभाषण में नहीं है और सदस्य ये मानें कि होना चाहिये। सत्ता पक्ष ने जब नेता प्रतिपक्ष को इस तरह नहीं बोलने देकर उन्हें मोरेली डाउन करने की रणनीति का ताना बाना बुना, तो यह नहीं समझा था कि परिणति खुद प्रधानमंत्री के ही न बोलने तक चली जायेगी और इस तरह गैरजरूरी कुश्ती बराबरी पर छूटेगी। यह सारा खेल सत्ता पक्ष की ओर से नरवड़े की किताब को लेकर एक कल्पित प्रेत युद्ध सा था, जिससे बचा जा सकता था और अंत में विपक्ष को उत्तर का माकूल रास्ता संभव था। उस किताब की पहले से सार्वजनिक यह बात ही तो राहुल गांधी उद्धृत करना चाहते थे कि चीन सीमा पर आमने-सामने किसी टकराव की स्थिति आने पर सैन्य प्रमुख प्रधानमंत्री से आदेश ले कर कार्रवाई करेंगे और डोकलाम में सीमा की ओर बढ़ते चीनी सैनिकों के सामने आ जाने पर रक्षा मंत्री के माध्यम से सेनाध्यक्ष के रूप में नरवड़े ने आदेश लेने की पहल की तो यही कहा गया को जो उचित समझें वह करें, जिससे नरवड़े ने अनुभव किया कि इस्टेब्लिशमेंट ने उन्हें कठिन क्षण में अकेला छोड़ गया। आखिर इसमें क्या खास बात है, जो सरकार की परेशान का शबब बन गई ? बेशक श्री राहुल गांधी का प्रहार इसे लेकर उनके इस भाष्य पर टिका होता कि प्रधान मंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण मौके पर अनिर्णयग्रस्त थे। बाद में जबाब देते वक्त प्रधान मंत्री यों भी तो जबाब दे सकते थे कि वो अनिर्णयग्रस्त नहीं थे, बल्कि उस वक्त की सीमा की नाज़ुक स्थिति में स्थलीय परिस्थिति के तकाजों के अनुसार अपने सैन्य नेतृत्व पर भरोसा जताते हुये तत्काल उचित फैसले की जिम्मेदारी उन्हें दी थी और सरकार उनके साथ खड़ी थी। इस विमर्श में यह बात उभर कर आई है कि डोकलाम का उल्लेख नेता प्रतिपक्ष कर रहे थे, जो त्रुटिपूर्ण था, तो पुस्तक के अंश पढ़ने पर वह भी तो सदन में साफ होता और पीएम के पास आलोचना का अतिरिक्त मौका भी होता। इस तरह सहज रूप से बहस में विपक्ष के प्रहार की काट का एक रस्ता संभव था, पर पूरे संदर्भ में जिस तरह नेता प्रतिपक्ष को घेर कर चित्त कर देने की रणनीति बुनी गई, उसमें तो खुद नेता सदन भी चित्त गिरे। विपक्ष के नेता को बोलने ही न देने की यह रणनीति बैकफायर साबित हुई। कई बार एक झूठ के चलते कई झूठ गढ़ने पड़ते हैं और प्रधानमंत्री के नहीं भाषण करने के बचाव में कहना पड़ा कि उनको विपक्षी सांसदों से शारीरिक आघात का खतरा था, इसलिये उन्हें सदन में नहीं आने की सलाह आसन से ही दी गई।

एक चैनल पर तो एक प्रवक्ता ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस की महिला सांसद दांत भी काट सकती थीं। इस तरह के कल्पित प्रेत युद्ध की स्थिति गैरजरूरी थी। नेता प्रतिपक्ष जो बोलना चाह रहे थे, उन्हें बोलने देते और उन्हें उत्तर भी दे देते, बात यहां तक बढ़ती ही नहीं कि प्रधानमंत्री ही बहस का जबाब देने के दायित्व से बड़े खोखले काल्पनिक तर्कों के नैरेटिव के सहारे कतरा गये। जो बात बोलने से विपक्ष के नेता को रोका गया, वह भी इस तरह और ज्यादा ही चर्चित हुई। प्रधानमंत्री जी को फिजिकल थ्रेट के गढ़े नैरेटिव का विपक्ष की ओर से उत्तर रहा कि वह सदन में इसलिये नहीं आये कि श्री राहुल गांधी ने उन्हें नरवड़े की किताब भेंट करने का एलान और उस आधार पर इस बात की भी पूर्व घोषणा की थी कि वो तो सदन में आयेंगे ही नहीं। सदन में प्रधानमंत्री को घेर कर बेशक कुछ महिला सांसदों ने पट्टियों के साथ प्रदर्शन किया था, पर यह संसदीय इतिहास में नया तो नहीं था। भाजपा के सांसदों ने भी प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह के खिलाफ इस तरह का प्रदर्शन करते हुये राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर ही सारे दिन नहीं उन्हें बोलने नहीं दिया था।

सतीश कुमार 

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