सूचना-यंत्र की बमबारी - rashtrmat.com

सूचना-यंत्र की बमबारी

सूचना-तंत्र दरअसल एक ‘साइकोलॉजिकल बूचड़खाना’ है जहाँ हर सुबह विवेक की बलि दी जाती है और शाम को प्रोपेगेंडा का नानवेज परोसा जाता है। सत्ताधारी दलों के  सूचना-योद्धा अब सेनाओं की तरह काम करते हैं। उनका काम सत्ता सीमा की रक्षा करना है,और विपक्षियों की चोखट में घुस कर सत्ता की सरहदों’ का विस्तार करना है।

सूचना-यंत्र की बमबारी \  व्यंग्य     

    राजेन्द्र मोहन शर्मा

शहर के मुख्य सूचना-केंद्र की मीनार से आज जो प्रकाश पुंज निकल रहा था, वह रोशनी देने के लिए नहीं, बल्कि आँखों को चौंधियाकर विवेक को अंधा करने के लिए था। यह सत्ता के उस सूचना-तंत्र का शक्ति प्रदर्शन था, जिसने मति के मरण को एक उत्सव में बदल दिया है। आज के दौर में बौद्धिक पतन कोई दुर्घटना नहीं बल्कि विशेष दक्षता है। यह सत्ता की प्रयोगशाला में तैयार किया गया एक ‘बायोलॉजिकल वेपन’ है, जिसका लक्ष्य मनुष्य के मस्तिष्क को एक देशभक्ति के फर्जी नरेशन के ‘कूड़ेदान’ में तब्दील करना है। सत्ता का सूचना-तंत्र अब केवल समाचार नहीं देता बल्कि वह ऐसे ‘सत्य का निर्माण’ करता है जिसे झूठ  के प्रसव गृह में उधार की कोख से पैदा किया जाता है।यहाँ सत्य वह नहीं है जो घटित हुआ है, बल्कि सत्य वह है जिसे करोड़ों मोबाइल स्क्रीन्स पर एक साथ ‘ट्रेंड’ करवाया जाता है।

इस तंत्र की कार्यप्रणाली बड़ी सूक्ष्म और मारक है। पहले यह आपकी ‘स्मृति’ पर हमला करता है। सूचनाओं की इतनी भारी बमबारी की जाती है कि आम आदमी के लिए कल की घटना को याद रखना असंभव हो जाता है। स्मृति धुंधली पड़ते ही ‘तर्क’ अपने आप दम तोड़ देता है। सत्ताधारी जानते हैं कि एक विचारशील नागरिक उनके लिए सबसे बड़ा खतरा है, इसलिए उन्होंने ‘सूचना’ को ही ‘ज्ञान’ का विकल्प बना दिया है। आज का नागरिक जितनी सूचनाओं से लदा हुआ  होगा  वह उतना  ही ज्ञानी गिना जाने  लगा  है। वह यह तो जानता है कि किस नेता ने क्या ट्वीट किया है, पर वह यह भूल चुका है कि उसके अपने अधिकार क्या है। यह बौद्धिक पतन की वह अवस्था है जहाँ आदमी  को गुलामी के जंजीरों के ‘डिजिटल गहने’  पहना कर आभासी गर्व में  धकेला जा चुका है।

सत्ता का सूचना-तंत्र एक ऐसा ‘इको चैंबर’ बनाता है जहाँ केवल सत्ता की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यहाँ ‘अल्गोरिदम’ ही अब नया धर्मग्रंथ है। यह अल्गोरिदम आपकी पसंद-नापसंद को इस कदर नियंत्रित करता है कि आपको लगने लगता है कि पूरी दुनिया वैसा ही सोच रही है जैसा आप देख और सोच रहे हैं। यह ‘बौद्धिक पतन’ का चर्मोत्कर्ष है क्योंकि यहाँ व्यक्ति ने प्रश्न पूछना ही बंद नहीं किया है, बल्कि उसे लगने लगा है कि उसके पास सारे उत्तर पहले से मौजूद हैं—जो उसे व्हाट्सएप की ‘यूनिवर्सिटी’ से प्राप्त हुए हैं। यह सूचना-तंत्र दरअसल एक ‘साइकोलॉजिकल बूचड़खाना’ है जहाँ हर सुबह विवेक की बलि दी जाती है और शाम को प्रोपेगेंडा का नानवेज परोसा जाता है। सत्ताधारी दलों के  सूचना-योद्धा अब सेनाओं की तरह काम करते हैं। उनका काम सत्ता सीमा की रक्षा करना है,और विपक्षियों की चोखट में घुस कर सत्ता की सरहदों’ का विस्तार करना है। वे किसी भी उठते हुए सवाल को ‘राष्ट्रद्रोह’ के मलबे के नीचे दबा सकते हैं। जब मति का मरण होता है, तो सबसे पहले भाषा मरती है। शब्दों के अर्थ बदल दिए जाते हैं। बेरोजगारी को ‘अवसर’ कहा जाता है, गिरती अर्थव्यवस्था को ‘आध्यात्मिक शुद्धि’ का नाम दिया जाता है और सड़कों पर उतरते युवाओं को ‘भटका हुआ’ करार दिया जाता है। भाषा का यह पतन दरअसल उस बौद्धिक क्षरण का प्रतिबिंब है जिसने हमें एक ऐसे समाज में बदल दिया है जो केवल नारों पर जिंदा है। इस तंत्र ने ‘मति’ के स्थान पर ‘डेटा’ को स्थापित कर दिया है। अब आपकी योग्यता आपके विचारों से नहीं, बल्कि आपकी ‘रीच’ और ‘एंगेजमेंट’ से तय होती है। जो जितना बड़ा झूठ बोल सकता है, वह उतना ही बड़ा ‘इन्फ्लुएंसर’ है। सत्ता ने बुद्धिजीवियों की एक ऐसी नई फौज खड़ी की है जो भाड़े पर तर्क गढ़ती है। ये ‘बौद्धिक किरायेदार’ हर उस विफलता को सफलता सिद्ध करने के लिए तैयार रहते हैं जिससे सत्ता की साख जुड़ी हो। वे जानते हैं कि जनता की मति अब उस बिंदु पर पहुँच चुकी है जहाँ उसे तथ्यों की नहीं, केवल राष्ट्र भक्ति की ‘तसल्ली’ की जरूरत है। और सूचना-तंत्र चौबीसों घंटे इसी तसल्ली की सप्लाई चेन बनाए रखता है।बौद्धिक उन्नयन का सबसे उत्सव  तब सजता है जब समाज के सबसे पढ़े-लिखे लोग सत्ता के सूचना-तंत्र के सामने  रीढ़ विहीन होकर सपेरे की धुन पर नागिन की तरह लहराते हैं। वे अपनी डिग्री और ज्ञान का उपयोग सत्ता के अपराधों को न्यायोचित ठहराने के लिए करने लगते हैं। यह ‘वैशाली की नगर वधुओं ‘ का वह दौर है जहाँ बौद्धिक रूपसियों की बलि इसलिए दी जाती है ताकि सत्ता की ताड़काओं का वर्चस्व बना रहे। मति  तर्पण  के क्रियाकर्म का दायित्व उन पात्रों ने थाम लिया है जो मीडिया हाऊस विश्वविद्यालयों के मठाधीश और दौलत खानों के पहरेदार हैं। जब ये संस्थान स्वयं  ही सूचना-तंत्र के पुर्जे बन गए हैं, तो महान बौद्धिक उन्नयन तो पूर्ण होना ही है।

आज का नागरिक उस मछली की तरह है जिसे पता ही नहीं कि वह जाल में है या जीवनदायिनी जल में। क्योंकि जाल को ही ‘सुरक्षा कवच’ बताया जा रहा है और जल गटर के परनालों से गलबहियां कर नागरिकों का जीवन लीलने में मशगूल है। सूचना-तंत्र ने हमें एक ‘डिजिटल नशे’ में डुबो दिया है। यहाँ हर नोटिफिकेशन एक ‘डोपामाइन’ की तरह है जो हमें सोचने की तकलीफ से राहत दिलाता है। हम उस दौर में हैं जहाँ ‘फेक न्यूज’ ही एकमात्र ‘रियल न्यूज’ है क्योंकि वह हमारी कुंठाओं को सहला रहा है। मति के इस मरण पर सत्ताधारी अट्टहास कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि एक बार जब जनता अपनी सोचने की शक्ति खो देती है, तो उसे भेड़ों की तरह किसी भी दिशा में हाँका जा सकता है। यह बौद्धिक पतन और सूचना-तंत्र का गठजोड़ हमें एक ऐसे ‘अंधेरे युग’ की ओर ले जा रहा है जहाँ रोशनी की बात करना भी अपराध होगा। मति का तर्पण हो चुका है, राख ठंडी पड़ रही है, और सूचना-तंत्र उस राख से नए भ्रमों की इमारतें खड़ी कर रहा है। हम उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं जहाँ हमारे पास ‘सूचना’ का समंदर तो है, पर ‘विवेक’ की एक बूंद भी शेष नहीं है। सत्ता की जीत यही है कि उसने हमें अपना दुश्मन पहचानने की ताकत से भी वंचित कर दिया है। अब हम केवल मतिहीन ‘मंद मतिराम’ हैं, जो अपनी ही बर्बादी के वीडियो को ‘लाइक’ कर रहे हैं।

राजेन्द्र मोहन शर्मा,MO-  9829187033

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