राधा का सत्याग्रह - rashtrmat.com

राधा का सत्याग्रह

वंदना बाजपेयी की कहानी ‘राधा का सत्याग्रह’ एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक कहानी है, जो घरेलू जीवन की साधारण घटनाओं के माध्यम से स्त्री के आत्मबल, नैतिक दृढ़ता और मौन प्रतिरोध को उजागर करती है। राधा का चरित्र गांधीवादी मूल्यों त्याग, सेवा और सत्य का जीवंत प्रतीक बनकर उभरता है। अंतिम दृश्य में पति का पश्चाताप और राधा की मौन स्वीकृति कथा को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान करती है। नारी सम्मान, विश्वास और मानवीय संवेदना की एक सशक्त साहित्यिक प्रस्तुति है।

                                          कहानी\  राधा का सत्याग्रह

सन 1952, जिला कानपुर में गिरिजा शंकर पांडे जी के दूसरे लड़के के बेटे का मुंडन है।  काम काज का घर है।  कनौजिया ब्राह्मण आदत से लाचार, सो हर तरफ अफरा तफरी मची है। कहने वाले कहते हैं कि कामकाज में चार लोग चीखे-चिल्लाएँ न तो घर काम -काज का लगता ही नहीं। सो “जौ किन्ने रख दओ,  वो किन्ने रख दओ की चीख  पुकार मची है।

घर के  सभी लड़के इधर -उधर दौड़ रहे है, पर घर में चार-चार बहुए होते हुए भी तीसरे नंबर की बहु ही काम करती नज़र आ रही है। देवेन्द्र पांडे की पत्नी राधा तीसरे नंबर की बहु है। दो-दो जेठानियाँ और एक देवरानी के होते हुए भी घर का सारा काम उसके ऊपर है। होता भी क्यों न, सब के सब मायके संपन्न थीं। एक वही गरीब घर की थी, उस पर माँ सौतेली। कहते हैं जब माँ दूसरी हो तो बाप तीसरा हो जाता है। माँ-पिता का बस इतना कर्तव्य था की उसे ब्याह दे और उऋण हो जाए। ब्याहने के बाद उन्हें कोई मतलब ही नहीं था कि वो ससुराल में कैसे रहती है। पिताजी कभी तीज त्यौहार पर आते भी तो ससुर जेठ से मिलकर चले जाते।

कोई कहता भी कि बिटिया से मिल लो तो कहते, “जब घर ऐहेये, तबही मिलिहें, अबैय तो आप लोगन की कुशल समाचार पूछहीं की खातिर आए हैं।” न उसका जल्दी मायके जाने मौका आता न ही मुलाक़ात होती।

इस बात से राधा के पिताजी की तो इज्ज़त भले ही बढ़ जाती पर घर में सबको समझते देर न लगती कि राधा की मायके में कोई इज्ज़त नहीं है। सौतेली माँ के डर से पिता भी बेटी से बात करने से, साथ ले जाने से कतराते हैं। बुढ़ापे में भाग्य से जवान बीबी मिली है उसे खुश रखें या बिटिया को। जाहिर है बीबी का पलड़ा भारी हो जाता।

राधा ने भी इसे अपनी किस्मत समझ लिया था। कोई शिकायत नहीं थी।छोटे कद, दुबला-पतले शरीर और सुनहरी गेहुए रंग वाली राधा ससुराल में दौड़ -दौड़ सबका काम करती रहती। कोई कहता भी कि, “राधा तुम तो चार जनों का काम अकेले ही निपटाय देत हो, तो वो भी मुस्करा कर कह देती, “आखिर ई मानव जन्म सेवा के लिए ही तो मिला है।”  भगवान् ने देह भी बहुत फुर्तीली दी थी।चिड़िया सी फुदकती रहती।

कभी कोई काम में कमी भी निकलता तो हँस कर टाल देती,  “अपने ही तो है, कह दियो तो कह दियो , कौन सा चिपक गओ।” जीवन का एक ही मंत्र जिस पर उसको विश्वास था,  “कामलो सो लाडलो”। क्योंकि राधा सबका काम करती थी तो उसको थोडा बहुत प्यार मिल ही जाता था। कम से कम मायके से तो ज्यादा ही मिलता था।  वो इसी में खुश थी।

राधा भले ही ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी पर गांधी जी के विचारों को जीवन में उतारना चाहती थी। बचपन में पड़ोस में रहने वाले पक्के गांधीवादी मास्टर श्री राम शुक्ल अक्सर उसे गांधी जी के बारे में बताया करते थे। मास्टर जी बताया करते थे कि, “जो सच के पक्ष में खड़ा रहता है, उसे चाहें जितनी दिक्कतों का सामना करना पड़े, अंत में जीत उसी की होती है। झूठ आखिरकार हारता ही है।” उसके कच्चे मन पर विचारों की गहरी छाप पड़ गयी। खादी और चरखे से विशेष लगाव भी हो गया। आज भी कितनी व्यस्त हो दिन में एक बार चरखा जरूर चलाती। पहनती भी खादी ही थी। एक दो बार देवेन्द्र पाण्डेय ने रेशमी साड़ी ला कर दी भी पर राधा ने बड़े सम्मान के साथ उसे देवरानी या जेठानी को दे दिया।जहाँ देवरानी–जेठानी को साड़ी मिलने पर ख़ुशी हुई वहीँ देवेन्द्र पाण्डेय को तसल्ली कि चलो मेहरारू ज्यादा खर्चा नहीं कराएगी।

पाण्डेय कुनबा बहुत पैसे वाला नहीं था। मकान बनने के कारण वैसे ही घर में थोड़ी तंगी थी ऊपर से विधि की मार गिरिजा शंकर पाण्डेय जी को लकवा मार गया।  सेवा तो राधा के हिस्से में आई। जब घर में कोई पुरुष सदस्य ना होते तो पिता समझ कर गू-मूत भी कर ही देती।  धीरे –धीरे ये काम भी उसके ज़िम्मे आ गया। अब ये काम कर रसोई में घुस नहीं सकती थी। तो जितनी बार ससुर को शौच कराती उतनी बार नहा कर कपड़ा फींच कर ही रसोई में जाना होता।आखिर ब्राह्मण की रसोई बात–बात पर अपवित्र जो हो जाती। ना करती तो कोई उसके हाथ की बनायी रोटी ना खाता। काम तो सुलट रहा था पर इलाज का खर्चा बढ़ जाने से बज़ट बिगड़ने लगा। जहाँ देवरानी जेठानी अपने जेवर उतार कर मायके रख आयीं वहीँ राधा ने माँ के कंगन ख़ुशी-ख़ुशी उतार कर दे दिए। जेठानी ने टोकरी भर-भर आशीष दी, “लक्ष्मी ये गई है घर मा, अब तो पिताजी जल्दी ठीक हो जईए।”

घर में बीमारी खर्चा निपटा भी नहीं था। उसी समय घर की फर्श बनी। अब कटौती खाने-पीने में भी हुई।  राधा अपने हिस्से की दाल-सब्जी भी पति और जेठ को खिला देती।  खुद सूखी रोटी से सब्र कर जाती। देह सूखने लगी। कभी-कभी बार–बार नहाने से देह कुनकुनी भी हो जाती पर उसने उफ़ तक न की। वैसे ही हँस कर काम करती रहती।  बड़े जेठ को जब बात पता चली तो उन्हें भय हुआ बीमार पड़ गयी तो पिताजी व घर का काम कौन करेगा? आफत आ जायेगी। दिमाग दौड़ाया। पति देवेन्द्र हाज़िर किये गए। अतरिक्त आय के लिए ये फ़ैसला हुआ कि रसोई के पास वाला कमरा किराए पर उठा दिया जाए। हाँ ये जरूर तय हुआ था कि दिया किसी ब्राह्मण को ही जाए। कहीं माँस-वांस खाने वाला हुआ तो घर का धर्म भ्रष्ट होगा। ये लोग ठहरे शुद्ध शाकाहारी जो तामसिक प्याज, लहसुन से भी दूरी बना कर चलते। बोल तो नहीं पाते थे पर गिरिजा शंकर पाण्डेय ने भी जनेऊ की तरफ इशारा कर के बता ही दिया कि कोई गैर जात घर के भीतर बिठा लिया तो इ जनेऊ हमेशा के लिए उतार के धर देंगे। लेकिन ब्राह्मण किरायेदार मिलना मुश्किल था। अव्वल तो उस जमाने में किसी के पास किराया देने का पैसा होता नहीं, ऊपर से जिसे देखो दो गाढ़े बखत के लिए दो पैसा बचाने के फेर में लगा रहता।

गाँव से शहर पढ़ाई  करने आने वाले अपने किसी रिश्तेदार के घर ही टिक जाते, किट -किट होती रहे तो क्या शहर पैसा जोड़ने आये हैं, लुटाने नहीं। वैसे भी वो ज़माना ऐसा नहीं था कि घर आये रिश्तेदार को मना कर सकें। जैसे भी हो निभाना तो पड़ेगा ही का भाव बना रहता। शहर में आस–पास के गाँव बसने लगे थे। गिरिजाशंकर के बेटे भी तो जब गाँव से आये थे तब रिश्तेदारों के यहाँ ही टिके थे, मान-अपमान सब सहा, पर हिले नहीं।  हाँ घर के काम –काज, सेवा टहल में मदद कर देते । पर जब नौकरी लग गयी, चार पैसे जोड़ कर एक कच्चे-पक्के घर का इंतजाम कर लिया तभी रिश्तेदार का घर छोड़ा। खैर राम -राम कर के एक किरायेदार मिला। नया किरायेदार का पता लगाया गया तो बहुत दूर के रिश्ते का निकला। माथे पर पड़ी चिंता की लकीरें मिटीं।

नया किरायेदार जीवन चतुर्वेदी झींझक का रहने वाला था। अभी अकेला ही था, हालांकि ब्याह पक्का हो गया था। कार्तिक का महीना चल रहा था, ठीक ६ महीने बाद चैत्र में ब्याह होना था। शुरू में थोड़ी ना नुकुर के बाद आखिरकार “हाँ” हो ही गयी। जीवन एक कारखाने में नौकरी करता था। सुबह ९ -१० बजे का गया, देर रात लौटता। रहना ही कितनी  देर था। वह भी नए काम को समझने में लगा था। दिक्कत थी तो नींद की।  सपने भरी जवान उम्र की नींद जल्दी खुलती नहीं थी। अब स्नान –ध्यान करके ठाकुर  जी को धूप बत्ती ना करी तो काहे का पंडित। भले ही दो लोटा डाल के स्नान करे पर नौ बज ही जाता। ऊपर से खुद का भोजन बनाना। यहाँ से बटलोई लाओ, वहाँ से परात, सुबह –सवेरे बड़ी भाग –दौड़ हो जाती। पंडित जो ठहरा, बाहर का खाना खाता नहीं था।  आलम ये था कभी दाल जलती कभी चावल, कभी दोनों ऐसे बनते कि काग़ज़ की नाव तैरा लो। अब मरता क्या ना करता जो पका होता, खाना तो उसे था ही। वैसे भी ये वो पीढी थी जो अन्न की बर्बादी को पाप समझती थी। बड़े बुजुर्गों ने भय बिठा दिया था कि जो अन्न नाली में गया तो नाली का कीड़ा बनोगे।

राधा रसोई से जीवन का कमरा साफ़ दिखाई देता। रोज सुबह उसे स्नान कर उल्टी- सीधी धोती लपेटे चूल्हा फुकनी से तो कभी दाल-चावल से जूझते हुए देखती। कभी मुस्करा देती तो कभी उसका दिल आद्र हो उठता। इतनी मेहनत करता है, बनाने वाली कोई है नहीं। जल्दी ब्याह काहे नहीं कर लेता, बनी बनायी खाने को मिलेगी। चैत्र तक तो बहुत समय बाकी है। ढंग से खाना मिलेगा तो कम से कम नौकरी तो संभाल पायेंगे।  उधर जीवन भी कभी कच्ची–पक्की नींद से रसोई की तरफ देखता तो राधा खटर–पटर करती नज़र आती। वो भोरे-भोरे उठ स्नान ध्यान कर, मन्त्र गाते हुए तुलसी के आगे दीपक धर,  गाय की सानी कर, घर की सफाई व् गोबर की लिपाई कर, ठीक नौ बजे सबकी थाली परोस देती। समय की इतनी पाबंद कि घडी मिला लो, छोटा काँटा नौ पर और बड़ा बारह पर ही मिलता। मज़ाल है दफ्तर जाने में किसी को देर ना हो जाए। खा पी कर सब निकल जाते तो वो चूल्हा फूंकते हुए कल्पना करता कि जब उसकी घरवाली आ जायेगी तो वो भी ऐसे ही चैन से कारखाने जा पायेगा।

उन दिनों कारखाने में कर्मचारियों की छंटाई हो रही थी। जीवन घबराया हुआ था, समय की पाबंदी जरूरी थी। ऐसे में एक दिन तो उसे होश ही नहीं रहा और पतीली जल–जल के कोयला हो गयी। दाल सूख कर ऐसे चिपक गयी कि जैसे हमेशा से उसका हिस्सा रही हो। थोड़ी देर तक साफ़ करता रहा, पर वो भी टस से मस होने को तैयार नहीं थी।  उसने कातर दृष्टि से रसोई की तरफ देखा। राधा रसोई के बाहर बैठ जूठे बर्तन मल  रही थी। तभी जीवन आ गया। उसके हाथ में जला हुआ पतीला था। राधा की ओर देख कर बोला, ” भाभी थोड़ी कोयले की राख मिलेगी, आज पतीला ज्यादा ही जल गया है, कालिख छूट नहीं रही।” राधा ने उसके चेहरे पर बेचारगी देख कर माथे पर थोड़ा नीचे पल्ला सरकाते हुए कहा, “देवर जी, यहीं रख दीजिये, हम धो देंगे। उम्र में छोट हैं आप हमसे। काहे परेशान हुइए।” जीवन ने पतीला वहीँ रख दिया।

राधा हाथ धोकर रसोई से थाली लगा कर ले आई और आग्रह पूर्वक खाने को कहा।  बचपन से यही तो सुना था कि जिस घर में बाँट कर खाया जाता है, बरकत वहीँ होती है। जीवन भी इनकार न कर सका और थाली ले कर अपने कमरे में चला गया । बथुए का रायता, सीताफल की खट्टी मीठी सब्जी, दाल, चटनी, मुलायम रोटी कितने दिनों बाद उस ने ये सब खाया था। आज तृप्त हो कर कारखाने गया।

जीवन शाम को लौटा तो पतीला सोने सा चमक रहा था। उसने हाथ में उठा कर कई बार निहारा। झट से राधा को धन्यवाद देने पहुँच गया। “वाह भाभी तुमने तो कमाल कर दिया। ये तो नया ही हो गया।” “काहे धन्यवाद देते हैं देवर जी, ई कोई बड़ा काम थोड़ी ही है। मानुष जन्म में सेवा से बढ़कर का है। एक पतीला और मांज दिया तो का फर्क पड़ता है” बर्तनों के ढेर मलते हुए राधा ने कहा।

“अरे नहीं भाभी, हम जानते हैं आप बहुत कमेरी हैं। किरायेदार हूँ तो क्या हुआ देखता तो रहता हूँ आप दिन भर अकेले सारा काम करतीं हैं उस पर मेरे बर्तन भी धोये।  अब धन्यवाद तो बनता ही है। ”

राधा हँस कर बोली,  “ क्या देवर जी,ई तो इंसानियत की खातिर।  गांधी जी भजन गाया करत थे, “वैष्णव जन तो ते ने कहिये जो पीर पराई जाने रे”। यही तो असली पूजा पाठ है।  आदमी  के काम ही न आवे  तो जीना ही बेकार है। फिर आप तो ह्मरे  छोटे भाई जईसन हैं।”

नौकरी के तनावों से जूझते जीवन की हिम्मत राधा की बातों और अपनेपन से थोड़ी बढ़ गयी। एक दिन राधा से बोल उठा, “भाभी सबका खाना बना कर अपनी ही बटलोई में थोड़ी दाल, चावल उबाल दिया करो, मुझसे ठीक से बनती नहीं। कच्चा -पक्का खा कर सेहत बिगड़ रही है। काम नहीं करूँगा तो  गृहस्थी कैसे चलेगी? गृहस्थी तो छोड़ो, शादी कैसे होगी।  बिना कमाऊ लड़का देखे तो ससुरालिये भी पीछे हट जायेंगे।   बस इतनी मदद कर दो फिर देखना जब ब्याह के बाद हमारी घरवाली आएगी तो तुम्हारी कितनी सेवा करवाएंगे।”

“ठीक है, ठीक है देवर जी, ई कोई काम थोड़ों ही है। ई सब लोग खा के चले जात हैं तब तुम्हारा भी दाल–चावल पकाय देंगे। और हाँ, हम भी दिखिए कितनी सेवा करवईयो?” कह राधा मुस्करा दी।

“बस घर वालों को ऐतराज ना हो” जीवन ने मन की शंका साझा की।

“घर में कोई काहे कुछ कहिये। सब मानुष बसते हैं यहाँ।दोनों समय दिया बाती करने वालों का घर है। फिर भी ऐसी बातों के लिए हम तो इतना जानते हैं कि जिसके पास सच है उसे क्या डर । आपन मन साफ़ है तो दुनिया साफ़ है।”

उसके इस जवाब से जीवन का चेहरा खिल गया। वो फिर से धन्यवाद कहते हुए अपने कमरे में चला गया। वैसे भी दिन भर गृहस्थी में चक्कर घिन्नी की तरह घूमने वाली राधा के लिए ये कोई बड़ा काम नहीं था।

जीवन 10 किलो चावल और पाँच किलो दाल खरीद कर राधा रसोई के बाहर पड़ी टीन की छाया में रख गया। अब अपने घर परिवार का भोजन बना कर रोज जीवन के लिए दाल -चावल बनाना राधा का कर्तव्य हो गया। राधा को इसमें संतोष मिलता। किसी मनुज की मदद करने का संतोष, वही जो गांधी जी  ने सिखाया था। उसकी अम्मा भी यही कहती थी। जिनका साथ तो उसे ज्यादा नहीं मिला पर जिसकी सीख उसने पल्ले में कब बांध गयी ये वो खुद भी ना जान सकी। कभी-कभी आसमान की तरफ देख कर खुद से बड़बड़ाती, ” अम्मा,  देखो तुम्हार बिटिया घर-परिवार, सास ससुराल सब का ठीक से संभाल रही है और एक मनुज की भी मदद कर रही है।” ऐसा कह कर राधा को बहुत संतोष हो जाता कि कहीं ना कहीं उसकी माँ उसके साथ है।

जीवन आता, दाल-चावल ले के चला जाता। कभी राधा ही घर के किसी बच्चे के हाथ से भिजवा  देती। ज्यादा बातचीत उन दोनों के बीच नहीं होती थी। दोनों को अपने –अपने काम से मतलब था। शुरू में तो किसी ने कुछ नहीं कहा,  किराया जो मिल रहा था।  धीरे -धीरे जेठानियों के बीच कानाफूसी होने लगी.. “कुछ तो है, जो दाल के साथ पक रहा है।”

ताने उलाहने दिए जाने लगे। एक दिन राधा कपड़े घरी कर के उठी ही थी कि छोटी जेठानी आ गयी और उसे सावधान करते हुए बोली, “देखो, ई सब इस घर मा नहीं चलेगा।  काहे का ई किरायेदार का पेट भरे राहती हो।” राधा ने सर झुका कर कहा, “ दीदी, हमारे काम से कोई शिकायत तो नहीं है। बर्तन मलते–मलते दाल-चावल उबाल देते हैं। उसका भी पेट भर जाता है। ई जो सब पोथी पत्रा हैं, जिन्हें दादाजी सुबह-सुबह से बाँचना शुरू कर देते हैं। उनमें यहीं तो लिखा रहत है कि मानुष-मानुष के काम आए।”

पर वो कहाँ कुछ सुनना, समझना चाहती थी। “देखो, ज्यादा सवाल जवाब नाही, हम मना कर दिए हैं तो कर दिए हैं” कहती हुई वो पैर पटकती हुई चली गयीं। रसोई से जीवन का कमरा दूर नहीं था । घर में क्या खिचड़ी पक रही है इसकी उसे भी भनक लग ही गयी।  अगले दिन उसने राधा के पास जा कर दाल-चावल बनाने से मना कर दिया।

“काहे देवर जी, जो कहा हमसे कहा, आप क्यों दिल पर लेते हो। उनकी सोच है तो हम का करें, हमने तो पहले ही कह दिया था, जिसके पास सच है उसे का डर” सर का पल्ला सँभालते हुए राधा ने कहा।

“पर भाभी”, जीवन कुछ कह पाता उससे पहले राधा ने दाल-चावल का पतीला आगे कर दिया।  देवरानी ने सारी बातचीत अपने कमरे की खिड़की से सुन ली। उसे लगा गज़ब औरत है, मायके में कोई खैरख्वाह नहीं तब भी समाज का डर नहीं, इसे तो सीधा करना ही पड़ेगा, कल को कोई ऊँच -नीच हो गयी तो? कुल बोरनी, कुल का नाम पाताल में ले जाकर ही डुबोयेगी। फिर इस परिवार की लड़कियों का ब्याह कैसे होगा। उस ने सारी बातें नमक मिर्च लगा कर जेठ-जेठानी को बता दी। सुनते ही जेठ आग बबूला हो गए।

शाम को जैसे ही देवेन्द्र घर आये तो उन्होंने उसे बुला कर कहा, ” जरा ठोंक पीट कर अपनी घरवाली को समझा दो, ये भले लोगों का घर है, यहाँ ये सब शोभा नहीं देता।   पराये मर्द से मुँह लगाए फिरती है, उसकी सेवा-टहल करती है। अभी बात घर के अन्दर है, कल को बाहर जायेगी। ये प्रेम-प्रीत यहाँ चलेगी नहीं।”

बड़े भाई का सारा गुस्सा उसकी की आँखों  में उतर आया। सीधा कमरे में जाकर अलमारी से संटी निकाल कर लगे राधा की चमड़ी उधेड़ने। राधा, “हमने कुछ नहीं किया, हमने कुछ नहीं किया” की गुहार लगाती रही पर पति का गुस्सा उसे अधमरा करे दे रहा था।  कितने घूँसे, कितने थप्पड़, की तो गिनती ही नहीं थी, एक बार तो उसके बाल पकड़ कर खींचते हुए कमरे के कोने में ले गए। अनायास  धक्के से सर दीवार से टकरा गया  माथे से खून की धाराएं फूट पड़ीं।  पता ही नहीं चलता था कि कौन सा खून  का रंग है और कौन सा सिंदूर का।

अभी तक तो देवरानी दूर खड़ी हो कर मजा ले रही थी, इस तरह चोट देख कर घबरा गयी। दौड़ी-दौड़ी आई और घूँघट और नीचे सरका कर बोली, “रहे देयो भैया, का जान से मार दोगे,अब नाही करिहे।” छोटी को देखककर उनका गुस्सा थोड़ा कम हुआ।

पैर पटकते हुए “कल से ना करने” की हिदायत देते हुए कमरे के बाहर चले गए। राधा टूट गई।  एक तो पति की मार से दूसरे देवरानी की गुहार से… जिसने आग लगाई थी वही बचाव करने आ गई।  दूसरे दिनभर कमरे में ही पड़ी रही। शरीर से ज्यादा चोट आत्मा पर थी। पहली बार उसने भाग्य को कोसा। मायके में कोई होता तो क्या ये लोग यूँ जानवर की तरह पीट पाते या औरत का शरीर ही ना मिला होता, भगवान् चिड़िया, कौव्वा कुछ भी बना देता तो इस तरह बिला वजह अपमानित तो न होना पड़ता।

उस दिन ना उसने पकाया, ना खाया। रसोई देवरानी जेठानियों ने मिल कर संभाल ली।  पर संध्या तक उस के कमरे का द्वार खटका कर कह गयीं कि, “अब कब तक महारानी बनी पड़ी रहोगी, कोप भवन से निकलो, घर-गृहस्थी संभालो।” अगले दिन हिम्मत कर के रसोई में पहुँची।

मन संकल्प ले चुका था। घर का खाना बना, जीवन का दाल-चावल बनाया और स्वयं जीवन के कमरे में लेकर गयी। आज पहली बार जीवन में कमरे में गयी थी। जीवन चारपाई पर लेटा हुआ था।  उसे देख सकपका गया। उस ने उसकी पिटाई की खबर सुनी थी। अपराधबोध से वैसे ही भरा हुआ था,  पर उसके हाथों व् मुँह में नीले साये और चोट के निशान देखकर उसकी आँखे भर आयीं ।

आँसू पोछते हुए बोला, ” भाभी हमने मना किया था ना, पर आप ने ही ये कह कर बात काट दी कि “जिसके पास सच है उसे क्या डर”। “देखिये कितना मारा आपको, कसाईं की तरह। आप कहाँ मनुष्यता की बात करती हैं, इहाँ तो सब जानवर बसे हैं। महीना खत्म होने में कुछ दिन ही बाकी है । बस !अब हम ये कमरा खाली कर देंगे। तब तक आप दाल-चावल ना बनाना हमारे लिए।”

“ये मार उस मार से ज्यादा गहरी है देवर जी”, राधा धीरे से बोली।

“क्या मतलब भाभी”, जीवन ने आश्चर्य से पूछा।

देवर जी हम रोज ऐसे ही दाल-चावल बनाएंगे आपके लिए। हमने वादा किया था आपसे, आपका ब्याह होन तक छोटे भाई की तरह आप का भोजन का इंतजाम हमरा रहिए।   हम अपने वचन से कैसे  फिर जाएँ । पहले ही कहा था ना, ” जिसके पास सच है उसे क्या डर । जब हमारी और आपकी आत्मा पवित्र है तो इल्जाम लगाने वाले चाहे जो कहें जितना मारे… शरीर को ही तो चोट दें पहिए , आत्मा को नाहीं। लेकिन अगर आप चले गए या हमने दाल-चावल बनाना छोड़ दिया तो ये सिद्ध हो जहिए कि कुछ तो गलत था जो मार कर ठीक कर दिया। समय रहते देख लिया तो जीवन बाबू कमरा छोड़ कर चले गए, वरना दुई जने आँख के नीचे क्या –क्या गुल खिलात रहते। ये दाग कभी नहीं मिटिए। ये घाव आत्मा पर हुइए, जो कभी नहीं भरिए। माना की हमरा कोई नहीं है पर  इतनी कमजोर नहीं हैं  देवर जी कि मार के डर से उनके झूठ को सच बनाय दें।  ये हमरा युद्ध है, देर सवेर हमरी सच्चाई साबित हो ही जहिए।” कह कर राधा चली गयी ।

जीवन उसके साहस के आगे नतमस्तक हो गया। रोज उसी तरह राधा दाल-चावल बनाती रही, ताने-उलाहने सहती रही,  पति -पत्नी में बातचीत बंद थी। देवेन्द्र पाण्डेय जितनी देर उससे बोलते बस जरूरी काम के बारे में ही बोलते। कितनी बार सुबह वो सर पर पट्टी बांधे मिलती, कितनी बार कुछ नए नीले साव उसके गेहुए रंग में और उभर कर दिखाई देने लगते। कितनी बार उसके क़दमों में लड़खड़ाहट होती पर वो रोज सुबह किसी अजेय योद्धा की तरह अपने काम में लग जाती।  घर में उसका सबसे अबोला था। देवरानी, जेठानी उससे काम तो करवाती पर पास बैठने न देतीं जैसे वो कोई अछूत हो। आये–गए भी उसके हाथ की रोटी पानी खा-पी कर देवरानी–जेठानी के पक्ष में बोलकर चले जाते।  जरूरी नहीं कि सब उसे दोषी ही समझते हों, पर घर की सत्ता का भय था। उसके घाव पर मरहम रखने वाला कोई नहीं था।  अलबत्ता कुछ लोग तरस खा कर जरूर समझाते, “अरे काहे इत्ती मार सहती हो माफ़ी माँग लो, कह देना हो गई गलती, अब नाही करिए।  अरे मानुष है,मान जहिए” पहले उसके गुणों के कारण सब उसे मोती कहते थे, अब मठठर कहने लगे।  “बात ही नाही मानत है अरे, सच्चे-झूठे कैसे भी माफ़ी माँग ले, पूरी मठठर है। अरे औरत की जिद चली है कबहुँ ?”

जीवन अपरोक्ष रूप से उसके इस युद्ध में साथ था। वो जानता था कि घर के लोग जानते हैं कि राधा ने कुछ किया नहीं है, फिर भी वो उसे अपनी अहमियत और उसकी औकात दिखाने के लिए सता रहे हैं। जैसे बरसों से औरतें सताई जाती रही हैं ताकि वो बोल ना सकें। सर झुका कर बस स्वीकार करें। जब राधा संघर्ष कर रही है तो वो कैसे घर छोड़ के जा सकता है। वैसे भी किराए की वजह से उससे सीधे कोई घर छोड़ने को कहेगा नहीं। हालांकि उसकी आत्मा चीत्कारती कि कब तक यह चलेगा। कई बार धैर्य चुक जाता लगता अभी जा कर देवेन्द्र पाण्डेय को चार घूंसे जमाये और कहे, “उस लाचार पर क्यों जुलुम करते हो, आओ हमसे निपटो।” पर राधा की बात याद आ जाती। ऐसे तो उनका झूठ सच हो जाएगा। बंधी हुई मुट्ठियाँ वो खुद ही के ही पैरों पर धीरे-धीरे मुक्के मार कर खोल लेता। माघ का महीना लग गया था। वसंती बयार चल पड़ी थी। घर–घर औरतें चिप्स और पापड़ बनाने में व्यस्त हो गयीं थी। तभी वो कारखाने से छुट्टी लेकर महीने भर के लिए गाँव चला गया।

महीने भर बाद वो अपनी पत्नी ज्योति को लेकर घर आया। राधा की ख़ुशी का ठिकाना न था। उसने ही आरती उतार कर गृह प्रवेश कराया ज्योति ने राधा के पाँव छू कर आशीर्वाद लिया। उसने ज्योति के हाथ पर कुछ रुपये रखते हुए जीवन से कहा, “चाँद सी देवरानी ले आये देवर जी, अब हम सेवा करवइए।” जवाब में जीवन मुस्करा दिया। अब राधा जीवन के लिए दाल-चावल नहीं बनाती थी। ज्योति ही पूरी रसोई बनाती थी।  अपने काम से छुट्टी  होते ही राधा की मदद करने चली आती। कभी उसके बालों में तेल लगाती, कभी चोटी गूँथती तो कभी यूँ ही मनुहार कर कुछ खिलाती। दो बहनों सा प्रेम नित परवान चढ़ने लगा। ज्योति को जीवन ने सब बता दिया था। ज्योति के मन में राधा के लिए बहुत इज्ज़त थी। वो हर दिन पूजा के बाद राधा के पाँव छूती। राधा मना करती तो कहती, छूने दो जीजी, ये सिर्फ जेठानी के आशीर्वाद के लिए नहीं करती हूँ।  आप की हिम्मत के लिए झुकती हूँ जो आपने दिखाई है। कितनी विपरीत परिस्थितियों में आप टूटी नहीं।  राधा हँस कर उसे गले लगा कर कहती, “गांधी जी को नहीं पढ़ा है का? तुम तो लिखी-पढ़ी हो। हम तो इतना पढ़े नहीं हैं, पर इतना जानत हैं कि वो अंग्रेजों से इसी सच के सहारे भिड गए। एक लाठी भी नहीं उठायी। सच में ताकत होत है, बस भरोसा अपनी हिम्मत का करन होत है। हिम्मत ना टूटने पाए। ये ताकत ही तो दिखानी हम औरतन को,  हमने तो शुरुआत की है, आगे…तुम्हे, सब को हिम्मत करनी है, ऐसइन  बेतुके लांक्षनों के आगे।“

“पर दीदी ,कैसे?” ज्योति ने हिचकिचाते हुए पूछती ।

“बस, अपने सच पर अडिग रह कर। जितनी ज़मीन मिली है, उतने पर ही जम कर खड़े रहकर। हमरा तो कोई खैरख्वाह नाही, हम लिखी पढ़ी नाहीं। तब भी उन लोगन के झूठ के आगे डिराई नाहीं।  तुम लोग अपने तरह से सत्य पर खड़े होवो। कर्तव्य से पीछे ना हटो, अधिकार में कोई कमी ना होन दो। कितने दिन कोई ताने देहिएl  नाम बदनाम करिए। आखिरकार तो सच ही जितिहे।” राधा उसके सर पर प्रेम भरी चपत लगाते हुए कहा।

ज्योति और राधा में अपनापन बढ़ते देख जेठानियों के बीच खुसुर -पुसुर भी बंद हो गयी थी। अबोला खुलने लगा। घर के बच्चे संध्या को उसके पास वैसे ही कहानी सुनने बैठने लगे। उसके हाथ की रोटी तो सब निगलते थे पर अब उस के हाथ से दिए प्रसाद का बहिष्कार बंद होने लगा। सब कहने लगीं,  हमीं ने गलत समझा था, इसके और जीवन के बीच तो कुछ था ही नहीं। ई तो बस मदद करने की भावना थी।” देवेन्द्र पाण्डेय को भी लगने लगा बेकार ही डांटा-मारा ये तो निर्दोष है। पछतावा सर चढ़ कर बोलने लगा।  आत्मा धिक्कारने लगी। इही तो पढ़ा है धर्म में मानुष ही मानुष के काम नहीं आएगा तो कौन आएगा। कित्ती धर्म –कर्म वाली मेहराऊ मिली है। इतनी बार मानस पढने के बाद भी बुझा नहीं पाए कि झूठे आरोपो ने माँ जानकी का जीवन दुःख से भर दिया और राम जी को अकेला कर दिया।

“हे राम” कही सुनी बातों में आकर बड़ा अपराध हो गया। उस रात कई दिन बाद वो अपने कमरे में गए। लालटेन की रोशिनी में में राधा चद्दर पर बेल बूटे काढ रही थी।  मुखमंडल सत्य के ओज से दिपदिपा रहा था। पौरुष का दंभ जाता रहा, देवेन्द्र पाण्डेय नन्हे बालक बन पत्नी के सामने नत होकर बिलखने लगे। “राधा बहुत गलती हो गई हमसे, कही सुनी बातों में आ गए, तुम तो माँ सीता सी हो और हम… हाथ जोड़ कर बार-बार क्षमा माँगने लगे। नेत्रों से अश्रु धाराएं बह कर मन के दर्पण को साफ़ करने लगीं।

राधा निर्दोष साबित हो गयी थी और निर्दोष साबित हो गया था सत्य का वो अवलंबन  जिस पर स्त्री स्वाधीनता संघर्ष की अनाम योद्धा राधा को अटूट विश्वास था। पति के आँसुओं के आगे सत्य के मार्ग की राही पिघलने लगी। क्षमा करना वीरों का काम है।

“ठीक है! ठीक है !, पर मन कैसे मान ले कि दोबारा आप किसी के बातों में नाहीं अहिए?” राधा ने प्रश्न किया। आगे बढ़े हुए देवेन्द्र के हाथ रुक गए। सकपकाते हुए बोले, “ठीक ही कहती हो, हम पश्चाताप करेंगे।”

दिन महीनों में बदले और महीने साल में। राधा ने घर के सारे उत्तरदायित्व निभाते हुए भी पति को अपनी देह को हाथ न लगाने दिया। कमरे के अंदर दो खाटें अलग-अलग बिछने लगीं। तीज-त्योहार आते राधा सजती धजती, शृंगार करती। पति के मन पर वार होता पर राधा की लक्ष्मण रेखा को पार करने का साहस उनमें नहीं रहा। राधा के चेहरे पर दिपदिपाते सच के आगे पुरुष मन हार जाता। मन में निराशा थी पर उन्होंने इसे ही अपनी नियति मान लिया। वो पश्चाताप की अग्नि में जलते रहे पर आगे बढ़ कर कभी अपनी पत्नी को हाथ ना लगा सके।

यूँ ही 3 बरस बीत गए। जीवन और ज्योति का अपना घर बन गया। अब कमरा किराये पर नहीं उठा था। राधा की जेठानी की लड़की सावित्री का ब्याह था।  पूरा घर दुल्हन की तरह सजा था। उन दिनों बराते तीन दिन टिका करती थीं। राधा भाग-भाग कर सबकी सेवा-टहल कर रही थी। राधा की फुर्ती और सधी हुई देह ही उसकी असली सुंदरता थी, जो उसे भीड़ से अलग करती थी। एक रोज मुँह अंधेरे राधा स्नान करके निकली कि सावित्री के चचिया ससुर ने उसे दबोच लिया। वो चीख-चिल्ला पाती कि जेठानी उधर आ गई।  चचिया ससुर के हाथ पाँव थरथरा उठे। उन्होंने तुरंत उसे छोड़ दिया और जेठानी की ओर पलट कर बोले, “माफ करो समधिन, दो दिन से इशारे कर रही है, जी भरमा गया। अब कोई गलती न हुइए।”

जेठानी ने पहले ही सब देख लिया था, बात तो सब समझ गईं पर मामला बिटिया की शादी का था और राधा आसान शिकार थी। वे राधा को ले सीधे जेठ के कमरे में पहुंची। राधा ने पल्लू से मुँह ढाँप लिया।

वो बार-बार कहती रही कि उसका कोई दोष नहीं है पर उसकी हर आवाज को अनसुना कर दिया गया। गड़े मुर्दे फिर से उखाड़े जाने लगे। जिस अग्नि परीक्षा को वो पार कर चुकी थी वो पुन: भूतकाल से उठ कर उसके सामने सर्प बन कर आ गई थी।

“अरे जीवन के साथ भी तो यही था। तब भी नहीं मानी थी। का जरूरत थी उलर-उलर के बैठका में जा कर सबकी सेवा-टहल करने की।  आदमी के जी का, का भरोसा?  उनका तो सब चलत है, हम औरतन को ही अपनी मर्यादा का ख्याल रखना पड़त है। ई तो सुधरती ही नाही।”

राधा अपराधी ठहराई जा रही थी।

देवेन्द्र पाण्डेय फिर हाजिर किये गए।

“जरा अपनी मेहरारू को समझा दो ठोंक-पीट कर। कम से कम बिटिया के घर को तो बख्श दे।” जेठ जी ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा।

देवेन्द्र पांडे के राधा की ओर देखा।  घूँघट में ढंके चेहरे में भी सत्य की तनी गर्दन दिखाई दी।  आगे बढ़ राधा के बगल में खड़े होकर बोले,  भैया, हमें राधा पर पूरा भरोसा है अब आप ये सोचो कि जिस घर मा ऐसन चचिया ससुर हैं, जिनके जी का भरोसा कह कर तुम पक्ष ले रहे हो उस घर में बिटिया ब्याहना का ठीक है…कुछ ऊँच-नीच हो गई तो?”

घूँघट की आड़ से ही सही राधा पति को देखती रह गई ।

जेठ-जेठानी दोनों सन्न रह गए।  इस तरह से तो सोचा ही नहीं था। सही है, संस्कार से गिरे आदमी का क्या भरोसा।  पर .. पर बारात लौटना ठीक नहीं है। एक बार बारात लौट गई तो बिटिया कौन ब्याहेगा? बिटिया कुँवारी ही रह जाएगी। ब्याह तो होना ही है पर डर सर चढ़ कर बोलने लगा।

विदा के समय जेठानी बिटिया को समझाने लगीं, “बिटिया,जरा चचिया ससुर पर निगाह रखना। जी के थोड़े कच्चे है। फिर भी कौनों बात हो जावे तो अपनी चाची की तरह अडिग खड़ी रहना। का है कि,  “कर नहीं तो डर नहीं’। सच्चाई सिद्ध हो ही जईए।” राधा को दोषी ठहराने वाले एक और राधा तैयार कर रहे थे।

उसी समय दालान से गुजरते हुए देवेन्द्र पांडे ने ये बात सुनी तो मुस्करा उठे ।

सावित्री को विदा कर राधा थक कर बेसुध सो गई। हल्की ठंड के दिन थे। थकान में रजाई भी ठीक से ओढ़ी नहीं थी। देवेन्द्र कमरे में आए। निश्चिंत सोती राधा को अपलक देखते रहे, फिर उसे राजाई ओढ़ाने लगे। रजाई उढ़ा कर अपनी खाट की तरफ जा ही रहे थे कि राधा उठ बैठी। उन्होंने पलट कर देखा, राधा की आँखों में स्वीकार्य भाव था। वे अपने पश्चाताप की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए थे। बाहर दूज के चाँद की मद्दिम चाँदनी छिटकी हुई थी और अंदर कमरा प्रेम के उजास से जगमगाने लगा।

वंदना बाजपेयी

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