विनोद जी अंततोगत्वा इस संसार से विदा हुए।लेकिन अपने साथ वो कई कीर्तिमान भी दे गए।चाहे जो कुछ हो जाए वो हमेशा बचे रहेंगे। उनका वजूद बचा रहेगा।उनको कभी भी शेष नहीं होने दिया जाएगा।वे हर हाल में बचे रह जाने वाले रचनाकार हैं।उनका लिखना सचमुच अलग तरह का लिखना है।उनकी कहन और शिल्प रचना संधान भी अलग किस्म का था।
“जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे /मैं उनसे मिलने /उनके पास चला जाऊंगा /एक उफनती नदी कभी नहीं /आएगी मेरे घर /नदी जैसे लोगों से मिलने/ नदी किनारे जाऊंगा /कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा/”
(विनोद कुमार शुक्ल )
“जाते-जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब/ तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा/ और कुछ भी नहीं में /सब कुछ होना बचा रहेगा/”(विनोद कुमार शुक्ल)
विनोद जी अंततोगत्वा इस संसार से विदा हुए।लेकिन अपने साथ वो कई कीर्तिमान भी दे गए।चाहे जो कुछ हो जाए वो हमेशा बचे रहेंगे। उनका वजूद बचा रहेगा।उनको कभी भी शेष नहीं होने दिया जाएगा।वे हर हाल में बचे रह जाने वाले रचनाकार हैं।उनका लिखना सचमुच अलग तरह का लिखना है। उनकी कथन भंगिमा में एक तरह का बाँकपन है।वे अपनी कविताओं कहानियों और उपन्यासों से अलग तरह से झांकते हैं दीवार में एक खिड़की से। वो अलग तरह से कहते हैं और अलग तरह से वर्ताव करते हैं ।इसलिए वे साधारण में असाधारण हैं और असाधारण में साधारण।उनको पढ़ते हुए थोड़ा ठहरना पड़ता है। निहारना पड़ता है।जगह – जगह थमना होता है और उनके कहे पर सोचना भी पड़ता है।

कभी अधूरा न माना जाए
ज़ाहिर है कि उनकी कविताएं, कहानियां और उपन्यास भी बचे रहेंगे सपाटता में नहीं बल्कि एक तरह की हक़ीक़त में और एक तरह के कौतूहल में। एक विशेष प्रकार के सपनें में।उनका जैसे एक पूरा कौतुक हो।उनकी एक कविता है ‘ कोई अधूरा पूरा नहीं होता- 2’ – “कोई अधूरा पूरा नहीं होता/कि एक नया अधूरा छूट जाता है/ बहुत पहले के अधूरे /शुरू से इतने सारे अधूरे /कि गिने जाने पर अधूरे छूट जाते हैं/ इस समाप्त अधूरे से भरे जीवन को /कभी अधूरा न माना जाए/ कि जीवन भरपूर जिया गया/ जीवन के अंधेरे में/ हर नया फल चिनगारी की तरह /जैसा उजाला रहा/ और बीते हुए को राख में दबाकर/ कि चिनगारी सहजी रहेगी जैसा यह बीत गया/ कागज पर लिखी एक पुड़िया- कविता ही/ शायद उस राख की भभूत हो/”(कभी के बाद अभी संग्रह से)
सार्थक जीवन के अनेक आयाम
उन पर बहुत कुछ कहा गया है।बहुत लिखा गया है और ऐसा लगातार लिखा जा रहा है।कोई दोहराव नहीं करते हुए एक अनुभव ही साझा करना चाहता हूँ।बस उनकी रचनात्मक सक्रियता और धज को ही अनुभव कर रहा हूँ।उनकी सार्थक जीवन यात्रा के अनेक आयाम हैं।आना जाना तो लगा ही रहता है। तुलसी ने सच कहा है ‘ मिलत एक दारुण दुःख देहीं /बिछुरत एक प्राण हर लेहीं/’ विनोद जी का महत्व और बढ़ेगा। मीडिया में उनको लेकर समूचे भारत में चर्चा ही चर्चा है है।निश्चय ही श्री विनोद कुमार शुक्ल अनूठे रचनाकार रहे हैं। उनकी कथ्य भूमि,उनका भाषा व्यवहार , वाक्य संरचना और प्रयोग सामान्य नहीं हैं। दिखते भले ही साधारण हों लेकिन हैं वे उनके निजी विशेष ही।उनकी खास चीज़ यह है कि वो जो अनुभव करते हैं उसे असामान्य किस्म से व्यक्त करते हैं।उनको सर्व प्रथम पहचान सीरीज में लगभग जय हिंद (कविता पुस्तिका) में पढ़ा। फिर वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह, सब कुछ होना बचा रहेगा (कविता संग्रह) नौकर की कमीज़, दीवार में एक खिड़की रहती थी (उपन्यास) महाविद्यालय कहानी और इसके अलावा दर्जनों पुस्तकें भी लिखी। उनकी कहन और शिल्प रचना संधान भी अलग किस्म का था।
अंतिम साँस लेने के लिए
उनका जाना एक बहुत बड़ी रिक्ति छोड़ गया। अंत में उनकी एक कविता को स्मरण करते हुए – “मृत्यु के बाद/ मेरा भविष्य क्या बचा रहेगा?/ मृत्यु कभी भी हो/ परंतु अंतिम साँस लेने के लिए/ मेरे पास हमेशा समय रहेगा/कि खिड़की के पास लगे पड़ोस के/ चंपा के फूलों की सुगंध को /अंतिम साँस में समेट लूं/”
उनके रचनात्मक अवदान को भुलाया नहीं जा सकता। विनम्र श्रद्धांजलि।

– डाॅ. सेवाराम त्रिपाठी
