राष्ट्रमत न्यूज बालाघाट(ब्यूरो)। नक्सल प्रभावित ग्राम पंचायत चितलखोली के स्कूल में दो शिक्षक पदस्थ हैं। लेकिन वो आते नहीं है। बच्चों को पढ़ाने का काम आंगन बाड़ी कार्यकार्यकर्ता करती हैं। जाहिर सी बात है कि नक्सली पंचायत होने का फायदा दोनों शिक्षक उठा रहे हैं। उन्हें भी लगता है कि कोई जांच करने आएगा नहीं। इसलिए जब मन करे जाएं या न जाए।
मजबूरी में कुंताबाई पढ़ाती हैं
सरकारी प्राथमिक विद्यालय के कक्ष में अध्यापक नहीं बल्कि आंगनवाड़ी कार्यकार्यकर्ताकुंताबाई तेकाम बच्चों को पढ़ा रही थीं। जी हाँ वही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जिनकी नियुक्ति 3 से 6 वर्ष के बच्चों की सेवाओं और पोषण कार्यक्रम के लिए होती है। वह सरकारी प्राथमिक विद्यालय के छात्र.छात्राओं को पढ़ा रही थीं। दोनों शिक्षक अर्जुन और राजकुमार सोनवाने नहीं आए थे। पहले तो राष्ट्रमत टीम को लगा कि शायद कोई विशेष कार्यक्रम होगा,लेकिन पता चला कि अनोखी व्यवस्था नहीं बल्कि मजबूरी की शिक्षा है। दोनों शिक्षक राजकुमार सोनवाने और अतिथि शिक्षक अर्जुन तेकाम गायब थे।
राजकुमार आते ही नहीं
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कुंता बाई तेकाम ने बताया कि आंगनवाड़ी भवन ही नहीं है जिसके चलते आंगनवाड़ी केंद्र भी प्राथमिक स्कूल के भवन में ही चलता है और उसी भवन में आज विद्यालय के दोनों शिक्षक अनुपस्थित होने के कारण उन्हीं को स्कूल के बच्चों को पढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने कहा किसी भी शिक्षक ने मुझे न तो सूचना दी और न ही किसी को बताया कि वे आज स्कूल नहीं आएंगे।
दोनों शिक्षक लापता
मीडिया ने स्कूल के छात्र देवराज से बात की। वह मासूम आवाज में बोला आज अर्जुन सर नहीं आए। वह तो रोज आते है हमें वही पढ़ाते हैं। लेकिन राजकुमार सोनवाने सर तो स्कूल आते ही नहीं हैं। कल आए थे,पर वो 15-20 दिन में एक बार आते हैं। देवराज ने दो टूक कहा सर नहीं आते तो हमारी पढ़ाई नहीं हो पाती। आज दोनों नहीं आए इसलिए हमें आंगनवाड़ी मैडम पढ़ा रही हैं। बच्चों के चेहरों पर मुस्कान भी था और निराशा भी आखिर पढ़ाई का हक कब तक यूँ ही लटकता रहेगा।
शिक्षा विभाग शिकायत सुनता नहीं
नक्सल प्रभावित चैरिया पंचायत के ग्राम चितलचखोली जो कि नक्कसल प्रभावित इलाका है। यहां पढ़ाने वालो शिक्षक ही लापता हैं। ऐसे में यहां के बच्चों के शिक्षा का स्तर कितना विकसित होगा सहज ही कल्पना की जा सकती है। स्कूल भवन जर्जर,आंगनवाड़ी के लिए अलग भवन नहीं। शिक्षक हफ्तों तक नदारद रहते हैं। बच्चों की पढ़ाई आंगनवाड़ी कार्यकरता के भरोसे। क्या यही है ग्रामीण भारत में शिक्षा की तस्वीर। स्कूल अक्सर अतिथि शिक्षक के भरोसे चलता है। वह नहीं आए तो ताले लटक जाते हैं। आंगनवाड़ी मैडम मजबूरी में बच्चों को पढ़ाती हैं। यह उनका काम ही नहीं है। गांव वालों के अनुसार शिक्षा विभाग को कई बार शिकायत किया गया पर कोई सुनवाई नहीं।