महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के माओ बालाघाट को दूसरा अबूझमाड़ बनाएंगे.. - rashtrmat.com

महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के माओ बालाघाट को दूसरा अबूझमाड़ बनाएंगे..

राष्ट्रमत न्यूज बालाघाट(ब्यूरो)। बालाघाट जिले में छह माह पूर्व 40-45 नक्सली हुआ करते थे। पिछले छह में एनकाउंटर में दस नक्सली मारे जा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में इस साल अब तक 2700 नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। लेकिन बालाघाट के मंडला और डिंडौरी जिले में सक्रिय नक्सलियों में अभी तक सरेंडर करने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। वैसे हाॅकफोर्स नक्सली क्षेत्रों में कैंप के जरिये नक्सलियों के आतंक को रोक दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि बालाघाट नक्सलावाद मुक्त नहीं हुआ तो छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के नक्सलियों के लिए बालाघाट दूसरा अबूझमाड़ बनेगा? क्यों कि यह जिला महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा से जुड़ा है। नक्सली अपने लिए कोई न कोई सेफ जगह पहले से तय कर रखे ही होंगें। तो क्या वो जगह बालाघाट है।


बालाघाट पुलिस का नया प्रयोग
बालाघाट पुलिस एक नया प्रयोग को अंजाम दी है ताकि बालाघाट जिले में सक्रिय तीन दजर्न से अधिक नक्सली सरेंडर कर दें। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस नक्सलियों को सरेंडर करने के लिए उन्हें छत्तीसगढ़ में सरेडर करने वाले नक्सलियों की तस्वीरे फलेक्स में लगा दी है। ताकि उन्हें देखकर बालाघाट में नक्सली मुख्यधारा में शामिल होने की दिशा में पहल करें।
इनके बिना खत्म नहीं होगा नक्सलवाद
सबसे बड़ा सवाल यह कि बालाघाट पुलिस क्या मार्च 2026 तक बालाघाट को नक्सल मुक्त कर पायेगी। इसलिए कि स्थानीय नक्सली दीपक,संपत और संगीता जब तक सरेंडर नहीं करेंगे,बालाघाट से नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। ये सरेंडर करेंगे तो इनके साथी भी करेंगे। इनका मूवमेंट लगातार जारी है। इनकी गतिविधियांें की जानकारी पुलिस को पता भी नहीं है। जाहिर सी बात है कि इस मामले में पुलिस की मुखबिरी कमजोर है। बालाघाट पुलिस छत्तीसगढ़ में सरेंडर करने वाले इनामी टाॅप के माओवादियों के नेताओं की फोटो फ्लेक्स में लगाकर उन्हें प्रेरित कर रही है कि वो भी समाज की मुख्यधारा में लौट आए हैं। बालाघाट पुलिस विशेष अभियान के जरिये बालाघाट में नक्सलवाद खत्म करना चाहती है। लेकिन सफल होगी या नहीं यह वक्त बताएगा।


दो दल खत्म,मगर नक्सली है
मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमाओं से सटा है। ऐसे में यह जिला एमपी का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिला माना जाता है। पिछले छह माह की नक्सल विरोधी कार्रवाई से अब यहां नक्सलवाद दम तोड़ता दिख रहा है। क्योंकि जिस लाल आतंक ने पिछले तीन दशकों से बालाघाट जिले को अपनी चपेट में लिया था वह अब धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है।इस बात का यहां के लोग भी मानते हैं। कभी यहां सबसे ज्यादा सक्रिय रहे दो नक्सल समूह अब खत्म हो चुके हैं। लेकिन नक्सली अब भी हैं।
नक्सलियों की पकड़ कमजोर
बालाघाट के साथ-साथ सीमावर्ती जिलों में भी नक्सल गतिविधियों में भारी कमी देखी जा रही है। खासकर बालाघाट और मंडला जिले की सीमा से लगे कान्हा राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में नक्सलियों की पकड़ कमजोर हुई है।जो मध्य प्रदेश के लिए अच्छी खबर मानी जा रही हैए क्योंकि 2026 तक मध्य प्रदेश से भी नक्सलवाद खत्म करने की प्लानिंग है।


बालाघाट में दो दलों का सफाया
नक्सल विरोधी अभियानों की वजह से अब नक्सली जंगलों में छिपने के लिए विवश हैं।क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई के कारण बालाघाट जो कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, वहां भी उनका प्रभाव तेजी से कम हो रहा है। पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा का कहना है कि नक्सलियों को पूरी तरह खत्म करने के लिए सुरक्षा बल हर मोर्चे पर सतर्क हैं। वर्तमान में बालाघाट और मंडला की सीमा से लगे कान्हा क्षेत्र में तीन एरिया कमेटी में से अब सिर्फ भोरमदेव दलम सक्रिय है। लेकिन उनकी संख्या और गतिविधियां बहुत सीमित रह गई हैं। जबकि बोड़ला और खटिया मोर्चा दलम का लगभग सफाया हो चुका है। एक समय नक्सलियों के यह दोनों दल बालाघाट जिले में सबसे ज्यादा सक्रिए माने जाते थे।


तुम भी लौट आओ अब
जिला मुख्यालय से 30 किमी दूरी पर स्थित नक्सल प्रभावित ग्राम माटे में सड़क के किनारे एक मकान की दीवार पर एक फ्लैक्स लगा है। जिसमें छग में आत्मसर्पण हुए टाप लीडरों सुजाता उर्फ कोपुरा, रूपेश उर्फ वासुदेव राय, भूपति उर्फ सोनू दादा, तारा अक्का यभूपति की पत्नी जो हथियारो के साथ छग में आत्मसमर्पण किये है, उनकी फोटो लगी है। जिसमें पुलिस ने शीर्षक दिया है पुर्नावास से पुनर्जीवन जंगलो में हथियार लेकर भटकते हुए बरसों बीत गये कई साथी लौट चुके है और सम्मानित जीवन जी रहे है।

सुविधायें देने का दावा
बता दे कि पुलिस का यह इशारा जिले में सक्रिय टाप लीडर नक्सली दीपक की ओर है। जो माटे गांव का निवासी है। पुलिस ने फ्लैक्स में लगभग 2100 माओवादियों के मुख्यधारा में वापस लौटने का भी उल्लेख किया है। पुलिस के अनुसार मुख्य धारा में वापस आने पर पुर्नावास नीति के तहत जमीन खरीदने के लिये 20 लाख रूपये, आवास निर्माण के लिए 1.50 लाख रूपये की सहायता राशि मुकदमों से राहत पाने 25 हजार रूपये प्रतिमाह शासकीय सेवा में नियुक्ति, माओवादी पुर्नावास नीति का लाभ लेने के बाद जिस क्षेत्र का निवासी है वहां परिवार के पास जाने व रहने सुविधा प्रदान होगी। वहीं नक्सलियों के आत्मसर्पण में मध्यस्था कराने वाले व्यक्ति को भी शासकीय सेवा में नियुक्ति और सुविधायें देने का दावा किया जा रहा है।
तो बालाघाट दूसरा अबूझमाड़ बनेगा
बालाघाट पुलिस फलैक्स के जरिये नक्सलियों को संदेश दे रही है कि वो लौट आएं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि बालाघाट से नक्सलवाद खत्म नहीं हुआ तो क्या होगा? क्या छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र के नक्सली बालाघाट को दूसरा अबूझमाड़ बनाएंगे। छत्तीसगढ़ में कितने नक्सली हैं पुलिस भी नहीं जानती। मार्च 2026 तक सभी नक्सली सरेंडर नहीं किये तो क्या सरकार मान लेगी की नक्सलवाद खत्म हो गया। या फिर यह कहेगी नक्सलवाद कमजोर हो गया है देर सबेर खत्म हो जाएगा। अभी गंभीर समस्या है बालाघाट को नक्सलावाद मुक्त करना।