अस्तित्व बचाने नक्सलियों ने बदली रणनीति,लाल गलियारा क्या बरकरार रहेगा..! - rashtrmat.com

अस्तित्व बचाने नक्सलियों ने बदली रणनीति,लाल गलियारा क्या बरकरार रहेगा..!

राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)।लालगलियारे की कहानी क्या छह माह बाद खत्म हो जाएगी? छह माह बाद माओवादियों और सुरक्षा बल के जवानों के बीच मुठभेड़ की खबर आनी बंद हो जाएगी। अथवा मिशन 2026 आगे खिंचेगा। इसलिए कि नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदल दी है। वो अब सीधे पुलिस से टकराना नहीं चाहते।वो अपनी विचारधारा को जिंदा रखने के लिए अपना तरीका बदल दिये हैं। सरकार ने फैसला किया है कि 2016 मार्च के बाद प्रदेश में ,देश में नक्सलवाद नहीं रहेगा।अब नक्सली अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सुरक्षात्मक रवैया अपना लिये हैं। वे अब छोटी- छोटी टुकड़ियों में जंगल में चलने का फैसला किया है। ताकि मुठभेड़ होने पर उनका कम नुकसान हो।इसलिए उन्होंने अपनी रणनीति में कई बड़े बदलाव किए हैं।


नक्सली अब टुकड़ी में चलते हैं
मओवादियों ने अब फैसला किया है कि वे अब 15-20 की संख्या में एक साथ नहीं चलेंगे। छोटे छोटे टुकड़ी में बंटकर जंगलों में सफर करेंगे। इसके अलावा नक्सलियों ने अपनी वेशभूषा भी बदल दी है और अपनी जान बचाने के लिए सिविल ड्रेस में घूम रहे हैं। हालांकि पुलिस की मजबूत रणनीति के कारण उनका गांवों तक पहुंचना या बैठक लेना पूरी तरह बंद है। लेकिन माओवादियों की हर पैतरे को भांपकर पुलिस और सुरक्षाबलों ने भी अपनी रणनीति में भी बदलाव लाया है। यही वजह है कि पहले की तुलना में सुरक्षाबल माओवादियों पर भारी पड़ रहे हैं।


नक्सलियों की तलाश में हाकफोर्स
अब सीआरपीएफ, हाकफोर्स लंबे और बड़े आपरेशन कर रही है। लांजी, किरनापुर, बैहर के घने जंगलों के अंदरूनी इलाकों में जवानों की मुस्तैदी पहले से ज्यादा तेज हुई है। वर्तमान में 1200 से अधिक हाकफोर्स जवान और सीआरपीएफ की तीन बटालियन घने जंगलों में माओवादियों को चैतरफा घेरने के लिए तैनात है।
नक्सली गतिविधियां थमी नहीं
नक्सल उन्मूलन में तैनात सुरक्षा जवानों के चक्रव्यूह को लाँघते हुए माओवादियों ने पिछले माह लगातार चार दिनों तक अपनी गतिविधियां दिखाई थी। नक्सली बैनर पोस्टर और पर्चे फेंकने के साथ-साथ माओवादियों ने पुलिस मुखबिरि के शक में एक युवक की हत्या भी कर दी। उसके बाद 03 अक्टूबर को पुलिस और नक्सलियो के बीच मुठभेड़ हुई। जिसमें नक्सली बचकर भाग निकले। जबकि आखिरी बार सुरक्षा जवानों ने 14 जून को बालाघाट के पचामादादर के जंगल में तीन महिला समेत चार हार्डकोर माओवादियों को ढेर किया था। उनसे भारी मात्रा में हथियार भी बरामद हुए थे।


हर बार सफलता नहीं मिलती
बालाघाट रेंज के आइजी संजय कुमार का कहना है कि पुलिस और नक्सलवाद के बीच गोरिल्ला युद्ध है,जिसमें हर बार सफलता नहीं मिलती। लेकिन नक्सलियों को धूल चटाने के लिए अब जवान जंगल से लेकर घोर नक्सल इलाकों में बसे गावों मे भी सर्च कर रही है। जिसे लेकर ऑपरेशन बड़ा दिया गया है।
नक्सलियों की चहल कदमी जारी
पिछले एक माह मे नक्सलियों की 04 मर्तबा गतिविधियां देखने और सुनने को मिली। पिछले 02 सितंबर को मप्र और छग सीमा के झुरनापाठ जंगल में एक्सचेंज आफ फायर हुआ। जिसमे माओवादी भाग निकले। उसके बाद 14 से 15 सितंबर को झांको गांव के पास नक्सली बैनर बांधे। 16 सितंबर को लांजी के चैरिया क्षेत्र के दहियान से पुलिस मुखबिरी शक मे युवक देवेंद्र यादव का माओवादियों ने अपहरण कर उसे मौत के घाट उतार दिया। 17 सितंबर को परसवाड़ा के चीनी से कुकड़ा मार्ग पर माओवादी पोस्टर, बैनर टंगे मिले। जिसमंे पुलिस की एसएसयू भर्ती का विरोध किया गया और देवेंद्र यादव की हत्या की जिम्मेदारी लीं गई। उसके बाद इस माह बीते 04 अक्टूबर को किरनापुर क्षेत्र के कलकत्ता,बटामा जंगल में पुनः एक्सचेंज आफ फायर हुआ। जहाँ 8-10 माओवादी अंधेरे का फायदा उठाकर भाग निकले।


हिड़मा के खात्मे में लगी पुलिस
नक्सलवाद से निपटने के लिये छग में पूरी ताकत झोंकी जा रही है। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी नक्सलवाद से निपटने के लिये नई रणनीति तैयार कर रहे हैं। कांफ्रेस करेगें। चूंकि मप्र का बालाघाट जिला छग सीमा से लगा हुआ है। जहां से नक्सलियों का कनेक्शन भी जुड़ जाता है। अबूझमाड़ में सुरक्षा बल के पहुंचने से नक्सली कमजोर हुए है।उनके लगभग सभी बड़े लीडर एक एक करके मारे गए है।हिड़मा की तलाश जारी है। माना जा रहा है कि हिड़मा की घेराबंदी की जा रही है। जाहिर सी बात है कि छग में नक्सलवाद खत्म होगा तो छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे राज्यों में भी लाल सलाम वाले खत्म होंगे। उम्मीद है कि छग सरकार की रणनीति से मध्यप्रदेश पुलिस को संयुक्त ऑपरेशन चलाने में बल मिलेगा। छग के पूर्व नक्सली कमांडर बदरना का कहना है कि क्रांति आयेगी मगर देर से आएगी। नक्सलवाद की विचारधारा खत्म नहीं होगी।सरकार नक्सली मार रही है,मगर विचार जिंदा रहेगा तो लालगलियारा भी रहेगा।

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