डाॅ सेवा राम त्रिपाठी का कहना है कि इस समयविकास प्रक्रिया के अखंड प्रहसनों से देश पटा पड़ा है। जमकर देशभक्ति की पॉलिशिंग हो रही है।देशभक्ति के नाना रूप बिखर रहें हैं।न जाने कितने प्रकार की देशभक्तियों में आदतन और इरादतन झमेले फैले हुए हैं और निर्लज्जतापूर्वक फैलाए भी जा रहे हैं। देश में फैले पाखंड, अंधविश्वास,जातिवाद को खत्म करने के लिए लड़ना भी ‘ देशभक्ति ‘ है। जो मूर्खों के खून में नहीं पाई जाती।
सच को झूठा बनाने की परियोजना \ नजरिया
डॉ. सेवाराम त्रिपाठी
हमारे आसपास मंडराता रहता है एक अदद धन्य और एक अदद धिक्कार। हम सभी धन्य और धिक्कार से घिरे हुए लोग हैं।गिन रहे हैं मनुष्यता और लोकतंत्र की अंतिम साँसें।आशा की टिमटिमाती लालटेन भरपूर रौशनी दे रही है। लेकिन यह इंटरनेट का युग है। सच को झूठा बनाने की परियोजना है और झूठ – झांसों को सच की तरह साधा जा रहा है।प्रश्न है कि कोई कब तक धरती का विलाप सुन सकता है।संविधान का विलाप भी कम नहीं है।संवैधानिक संस्थाओं का भी खूब विलाप जारी है।सोचिए हम कितनी चुनौतियों के साथ यात्रा कर रहे हैं।अपना या अपने समाज का मूल्यांकन करना हमेशा कठिन होता है। अपने आप को तटस्थ रख पाना भी। यह सब एक प्रकार से लोहे के चने चबाना ही साबित होता है। अपने आप पर बंदिश लगा, अपनी कमियों को बाहर लाना मुश्किल हुआ करता है। ज़ाहिर है कि हमारे अंदर न जाने कितने कोहराम होते हैं और न जाने कितनी ध्वनियों का विस्फोट । मुख तो समूचे देश में बहुत सारे हैं.उनकी तबाहो- बर्बाद होने की किसी को चिंता नहीं मुखारविंद न जाने कितने विकास के पैंतरे भरोसेमंद दस्तावेजों की तरह परोस रहे.हमारी असल ज़िंदगी का नमक एक रोकड़िया अपने कब्जे में कर रहा है.उसको एक विशेष किस्म का पैशाची खून लग चुका है.वह मज़हब मज़हब का बहुसंख्यक राग अलाप रहा है.वह मौतों की खबरों पर हँसता है. जीवन और जीवन मूल्यों,नैतिकताओं के विध्वंस को लोकतंत्र के लिए ज़रूरी हिस्सा मानते हुए उम्मीदों को नेस्तनाबूद करने में भिड़ा है.प्रजातंत्र क्रूरता नफ़रत और कट्टरता के स्थाई प्रबंधन की तरह कर दिया गया है.आशीष की कविता का यह अंश पढ़ें – “गणतंत्र में अब सिर्फ़ सत्ता पक्ष होगा /विपक्ष भी चुना जाएगा उसकी सहमत से /इस तरकीब से पक्ष और विपक्ष का रोचक खेल जारी रहेगा/ रूपहले पर्दे पर मुर्गा युद्ध की तरह चलती रहेगी बहसें/”
ज़िंदगी में प्रार्थनाएं – ज़िंदगी में प्रार्थनाएं तो होंगी लेकिन उनका कोई अस्तित्व नहीं होगा.कोई है भी तो वो केवल सत्ता व्यवस्था के पक्ष की प्रार्थनाओं को सुनेगा.आम आदमी की प्रार्थनाएं धूल फ़ाँकती रहेंगी.जीवन में वैसे तो हर क्षण युद्ध हैं। रोना धोना तो होगा लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं होगा.मौतें इतनी होंगी कि शवों को ढोने वाले नहीं मिलेंगे.आगे यह भी होगा कि मौतें खूब होंगी लेकिन कोई जान नहीं पाएगा.दो चार प्रतिशत का ही पता चल पाएगा.बाक़ी जतन से छिपा ली जाएंगी.नागरिक न घर के होंगे और न घाट के. कुंभ पर कुंभ मेले होंगे और वे सभी महाकुम्भों के उत्सवों में बदलती जाएंगी और ऊपर से गौरव यात्राएं भी जारी हो जाएंगी.लेखकों कलाकारों का जत्था निकलेगा.किताबों के प्रकाशन, पुरस्कार, सम्मान और पदक से एकदम संतुष्ट.वो ज़्यादातर सत्ता व्यवस्था के प्रवचनों से आपको हर हाल में प्रसन्न मिलेगा.आरती उतार मुद्रा अपनाए. अराजकताओं की लार्ज स्केल पर नुमाइश लगेगी. इसी से काम चला लिया जाएगा.

फूल कम पत्थर ज़्यादा –इसे आप विध्वंस लीलाएं भी कह सकते हैं।हम समूचे जीवन को छोड़ भी दें तो प्रतिदिन न जाने कितने बार लहूलुहान होते हैं। हमारे जीवन में फूल कम पत्थर ज़्यादा हैं।.पत्थरों की तेज़ बारिश हो रही है।हम बदहवास भागते हुए भी टोह ले रहे हैं कि हमारी अस्मिता का तापमान क्या है ।लू लपट और बवंडरों के बीच हमारा प्राप्य क्या है?यह एक लंपट और लपोचड़ समय भी है।समय के कटान देखिए। समय के बंधान देखिए।लोग अपनी पहचान बनाने में जुटे हैं।पूर्वाद्ध उम्मीदों के घनत्वों का हुआ करता था।अब उत्तरार्ध संशयों और नफ़रतों से रोज़ लड़ रहा है।एक अजीब तरह के पाखंड और संकीर्णतायें प्रतिमान बन रहे हैं।
प्रार्थनाएं उल्टी पड़ी – प्रार्थनाएं उल्टी पड़ी हैं।विजय देव नारायण साही की कविता में कहना चाहता हूँ – “दो तो ऐसा कलेजा दो/कि अपमान महत्वाकांक्षा और भूख/ की गांठों में मरोड़े हुए /उन लोगों का माथा सहला सकूँ/ और इसका डर न लगे /फिर कोई हाथ ही काट खाएगा/”अंधविश्वास और रूढ़ियों की बल्ले – बल्ले है।अपने बचपन को याद करता हूँ।उस ज़माने के संगी- साथियों को देखता हूँ तो फक्र होता है।कितनी आत्मीयता थी और कितना एक दूजे के लिए समर्पण होता था।शिक्षकों के दुलार को स्मरण करता हूँ तो गर्व से भर जाता हूँ।घर – गाँव के लोग कितना ख़्याल करते थे हम सभी का ।कोई बेगैरत नहीं थे हम, उन सभी के लिए।तो मन ही मन भींग भी जाता हूँ ।गाँव से दूर हूँ तो वहाँ के खेत – खलिहान, नाले, पशु – पक्षी और पेड़ , पगडंडियां ही नहीं बल्कि वहाँ की धूप, हवा, बरसातें, ठंडियां और गर्मी के दिन अचानक मेरे भीतर किल्लोल करने लगते हैं और गाहे – बगाहे नाचने भी लगते हैं।
झूठे नारे की तरह – मैं एकदम ठेठ गाँव का आदमी हूँ।उस ज़माने में घर गलियों और खेतों में न जाने कितना अंधेरा हुआ करता था ।लेकिन दिलों का उजाला उसे पछाड़ देता था।मेरे घर के सामने एक बड़ा चबूतरा हुआ करता था। जो कि अब नहीं है ।न जाने कितने सपनें और चाहतें उसमें ज़िंदा हैं। खेतों में हमारी सार्वजनिक इच्छाएं उगती थीं। उस चबूतरे में पच्चीस – तीस चारपाइयां बिछती थीं। जिसमें कथाओं के मेले लगते,समय थम जाता था और हम खुशियों में नाचते थे ।गर्मी के दिन हुआ करते थे और हवा भी नहीं चलती थी। कभी – कभी तो हवा का नामों – निशान नहीं होता थे।ऐसी क़हल होती कि हम पसीने में नहा जाते।हवा नहीं लेकिन कोई चिंता नहीं।सबका साथ तो था।आज के झूठे नारे की तरह सबका साथ सबका विकास नहीं था। जो हर जगह से खोखला हो।खैर हमारे एक फूफा दादा तीन – चार घंटे तक बिना थके कथाएं सुनाते। हम सभी को हूँका देना पड़ता था।हूंका खत्म तो कथा का समय भी ख़त्म।फिर आप चाहे जितनी चिरौरी- विनती, मिन्नतें कीजिए और लल्लो – चप्पो कीजिए। कथा नहीं होनी तो नहीं होनी।फूफा जबरिया सोने का अभिनय करते। हम सभी बच्चे कोई उनके हाथ – पाँव दबाता। कोई कुछ भी प्रलोभन देता।बड़ी मुश्किल से फूफा दादा मानते। नींद आती नहीं थी। उस चबूतरे का दृश्य भी अजीब था। आज तक हमारे दिलो दिमाग में वो करामाती चबूतरा रोशन है। एक प्यारी छाया की तरह हमें संभाले हुए है।
स्मृतियां जब बजती हैं – गर्मी के दिन पसीने से चिपचिपाये हुए कितनें उत्साहों – उछाहों के दिन हुआ करते थे।कोई पके हुए आम बीनने जा रहा है। कोई देशी पंखा झल रहा है। उसे बिजना भी कहा जाता था।न दिन में सोते और न रात में।हम लोगों की नींद अक्सर आकाश में सुदूर टंग जाती थीं। अभाव थे, गरीबी थी लेकिन छोटे-बड़ों का प्यार मनुहार था। स्मृतियां जब बजती हैं तो समूची कायनात खिलखिलाने लगती है। मोहब्बत हो तो अभावों की हम ऐसी- तैसी कर देते हैं। मोहब्बत नहीं हो तो समूची संपन्नताएं हमारे ऊपर गाज की तरह गिर पड़ती है। इसी को कहते हैं जब आवे संतोष धन सब धन धूर समान।

नौटंकियां अब भी स्मरण हैं- वो स्कूल दिल दिमाग़ में किल्लोल करता है जहाँ की टाट – पट्टियों, डेस्कों में हमनें पढ़ाइयां की थी। संगी-साथियों के साथ छोटी-छोटी लड़ाइयां की थीं और झगड़े किए थे। छोटी -मोटी मारपीट तो आम बात थी, हमारे जीवन यथार्थ का अटूट हिस्सा भी ।खून खच्चर भी हुए। डेस्कों के नीचे दबाए गए सिरों को भी याद करता हूँ।कुछ दिनों की अनबन भी। फूले हुए मुँह भी।उनकी क़ीमत उस समय समझ में नहीं आई थी। अब वो दिन विदा हो गए।वे कापियां,किताबें, पेन – पेंसिल और चॉक – डस्टर अब सपनों में बतियाते से लगते हैं ।तब उनको समझा नहीं अब समझ में आया तो वे साक्षात नहीं हैं। दिन – रात उपालंभ देते से जान पड़ते हैं।वे केवल हमारी स्मृतियों के तमाम तहखानों में बार- बार दस्तक दे रहे हैं और मुझे बुला रहे हैं। सोचता हूँ क्या किसी भी हालत में उनसे कभी मुलाक़ात हो सकती है?क्या उनको किसी भी प्रकार छू सकता हूँ।स्कूल के बिताए दिन मेलों के दिन, झूला झूलने के दिन।कच्ची अमियां खाने के दिन। गुल्ली डंडा खेलने के दिन। तिली – गुड़ – गादा खाने के दिन। मेलों में नौटंकियां हुआ करती थीं। कुछ देखी गई नौटंकियां अब भी स्मरण हैं – जैसे ध्रुव, भक्त प्रह्लाद, राजा हरिश्चंद्र, सुल्ताना डाकू ,मोरध्वज आदि।वो दिन हवा हुए ।अब तो हम न जाने ‘ कितने क्विंटल झूठ ‘ के साम्राज्य में साँस ले रहे हैं।
देशभक्ति मूर्खों के खून में नहीं- दुनिया शायद ऐसे ही बदलती है।न जाने कितने बड़े अंधविश्वासों, विकृतियों,विरूपताओं और धूर्तताओं के महामायाजालों की गुंजलकों में फंसे हुए हैं हम।हिंदू – मुस्लिम ,सिख, ईसाई के नफ़रतों के पुलिंदों से हमें दीक्षित किया जा रहा है और मुल्क को भी। और बुद्धिजीवी और अपने आप को चैतन्य लेखक मानते हुए कानों में ठेंपी दिए हैं और अपना मुँह उरमाए बैठे हैं। वो लोकार्पण-लोकार्पण खेल रहे हैं।प्रसिद्धि के अबाबील उड़ा रहे हैं।एक भयावह अंधेरे में हमारी अस्मिता, आकांक्षा, जिजीविषा, चिंताधारा और सामाजिकता के बीच हम रह- रह कर बिखरते जा रहे हैं। विकास प्रक्रिया के अखंड प्रहसनों से देश पटा पड़ा है। जमकर देशभक्ति की पॉलिशिंग हो रही है।देशभक्ति के नाना रूप बिखर रहें हैं।न जाने कितने प्रकार की देशभक्तियों में आदतन और इरादतन झमेले फैले हुए हैं और निर्लज्जतापूर्वक फैलाए भी जा रहे हैं।भगत सिंह जी ने कहा था – “देश में फैले पाखंड, अंधविश्वास, जातिवाद को खत्म करने के लिए लड़ना भी ‘ देशभक्ति ‘ है । जो मूर्खों के खून में नहीं पाई जाती।”इसकी वास्तविकता और भूमिका को समझने की ज़रूरत है। पाखण्ड के विभिन्न क्षेत्र विकसित हो रहे हैं और उसके रूप और रूपाकार दनादन सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। फिलहाल बंदर के हाथ उस्तरा लग चुका है।और वो सबको क्रमशः मूड़ रहा है।

डॉ. सेवाराम त्रिपाठी
MO-9425185272
