ज़िन्दगी में होने वाली छोटी छोटी घटनाएं एक बड़ा संदेश दे जाती है। ज्योत्सना कपिल समाज की सतह पर तैरते ऐसे यथार्थ को पकड़ कर उसे शब्दो में बांधती हैं। संवेदनाओं की ओट में वो स्त्री विमर्श की परछाई को भी देख लेती हैं। देखिये इन लघुकथा की तस्वीर को आप भी कहीं न कहीं देखे हैं।
सही कदम
” मम्मी अब मैं वापस नही जाऊँगी, विवेक और उसके घरवाले बहुत लालची हैं। आज बिजनेस के बहाने पाँच लाख माँगे हैं। कल कुछ और चाहिए होगा।”
” ऐसे नही कहते बेटा । इंसान जरूरत पड़ने पर अपनों का ही मुँह देखता है। वैसे भी हमारा जो कुछ है, तुम बच्चों का ही है। ”
” मम्मा आप उनकी आदत बिगाड़ रही हो, यह ज़रूरत नहीं, बल्कि पैसा उगाहने का तरीका है। आप मुझे यहीं रहने दो। मैं अपना कॅरियर बनाऊँगी और अपना बोझ खुद उठाऊँगी । ”
” बेटा, शादीशुदा बेटी को आज तक कौन माँ बाप अपने पास रख पाए हैं। ” स्वर में खिन्नता थी।
” मतलब आप मुझे यहाँ नहीं रहने देंगी ? ” बेटी ने तल्ख स्वर में कहा।
” भाभी अब मैं चलूँ ? ” तभी लछमी ने माँ बेटी की बातों में ख़लल डाल दिया ।
” लछमी ज़रा जाने से पहले बाथरूम की टाइल्स और साफ कर दे। बहुत गन्दी दिख रही हैं। ”
” भाभी कल कर दूँगी, अभी देर हो रही है। सुबह देर से आँख खुलने से, कुछ बना न पाई थी। सिबानी स्कूल से आने वाली होगी। ”
” शिवानी ? उसकी तो तूने शादी कर दी थी ?”
” हाँ भाभी , पर अब उसे मैं बापस ले आयी हूँ। उसका घरवाला शराब पीकर खूब मारता तोड़ता था, तो हम उसे अपने साथ ले आये। ”
” तुम लोगों में सबकी यही कहानी है, तेरा आदमी भी तो पीकर, तुझसे मार पीट करता है ?”
” हमे तो कोई सहारा देने बाला न था भाभी , पर अपनी सिबानी को न भुगतने देंगे। उसका दाखिला हमने स्कूल में करा दिया है, पढ़ लिखकर हिल्ले लग जाए, तो ये सब बर्दास्त न करना पड़ेगा । ”
” तू उसे घर लायी, तो तेरे दामाद ने कुछ न कहा ? ”
” क्यों नही, पहले तो खूब अकड़ा, फिर जब देखा कि हम खूब पक्के पे बैठे हैं, तो आजकल खूब हाथ पैर जोड़कर माफी माँग रहा है । ”
” जब माफी माँग रहा है तो भेज दे, बेटी को सारा जीवन, तो आज तक राजा भी अपने पास न रख पाया है। ”
” हम गरीब आदमी, राजा लोग की का जानें। पर जब बिटिया को जनम दिये हैं ,तो आग में तो न झोंकेंगे।” मालकिन को सोच में पड़ा देखकर उसकी हिम्मत बढ़ गई ” शराबी का कौन भरोसा भाभी , देखते हैं ,दो चार साल में सुधर गया तो ठीक, वरना निकल ले पतली गली से। ” कहती हुई वह निकल गई, तो बेटी ने तीखी एवम शिकायती दृष्टि से हतप्रभ माँ को देखा।
” ठीक है बेटा, किसी प्रोफेशनल कोर्स में तेरे एडमीशन की बात करती हूँ ।” कुछ पल सोचकर वह दृढ़ स्वर में बोली, तो बेटी हतप्रभ सी, माँ के बदलते हुए दृष्टिकोण देखती रह गई।
विकलांग
” आज तो, रामनवमी के दिन, मंदिर में खूब भीड़भाड़ रही, तेरी अच्छी कमाई हो गई, अब मेरा हिस्सा निकाल। ” खाकी ने उस पंगु, बूढ़े, भिखारी की पसलियों में अपना डंडा चुभोया, तो भिखारी के चेहरे पर तिरस्कार के भाव आ गए।
” कहां हुजूर, आजकल भगतों के दिल में रहम की भावना बची ही कहां है दिबान जी। ” उसने खाकी को चकमा देने की कोशिश की।

” अबे तू मुझे मूरख बनाने की कोशिश कर रहा है ? सुबह से भक्तों का तांता देख रहा हूं , भगवान के दर्शन को भी और तुझे भीख देते भी। चल टाइम खराब मत कर , बिना चूं चपड़ किए मेरा हिस्सा दे दे। ” खाकी ने भिखारी को धमकाया।
भिखारी ने मन मसोसते हुए, अपनी गुदड़ी में से कुछ नोट निकालकर खाकी की ओर बढ़ा दिए। खाकी ने नोट अपनी जेब के हवाले किए और थोड़ा दूर खड़े होकर सिगरेट के कश भरने लगा। यह दृश्य देखकर कुछ दूर पर खड़े अजय व विक्रम के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आए। दोनों ने एक दूसरे को देखा, फिर अजय मंथर गति से चलता हुआ बूढ़े भिखारी के पास गया। जेब से एक सौ का नोट निकालकर, उसने भिखारी की ओर बढ़ा दिया।
” बाबा, मेरा बच्चा लंबी बीमारी के बाद, अब जाकर ठीक हुआ है। दुआ करो कि वह हमेशा ठीक रहे। ”
” भगवान आपके बच्चे को खूब तंदुरुस्त रखे। बड़ा होकर आपका नाम रोशन करे बाबू। ” बूढ़े ने आसमान की ओर हाथ उठाकर दुआ मांगी।
जाते हुए वह पलभर को ठिठका, एक दृष्टि खाकी पर डाली, और फिर एक सौ का नोट उसके हाथ में भी थमा दिया
” आप भी चाय पानी के लिए रखो दीवान जी, और मेरे बेटे के लिए दुआ करना। ” खाकी ने हैरानी से उसे देखते हुए, नोट अपनी जेब में रख लिया।
” आपका बेटा हमेशा हंसता खेलता रहे, खूब लंबी उम्र हो उसकी। ” खाकी ने भी दुआ की।
अजय और विक्रम वापस आकर बाइक में बैठे और आगे बढ़ गए।
” यार तूने उस बूढ़े को पैसे दिए, यह तो समझ में आया। क्योंकि बेटे के ठीक होने के बाद तूने इक्कीस हेंडिकेप को दान करने का संकल्प लिया था। पर उस दुष्ट खाकी को क्यों ?”
” बीस दिव्यांगो को दान कर चुका था, पर उस खाकी को देखकर ख्याल आया कि एक विकलांग ही सही। बस यह बात दिमाग में आते ही मैंने उसे भी दान दे दिया। ”
” विकलांग …?”
” हां भई, बूढ़ा बेचारा तो दिव्यांग ही था, पर वह खाकी विकलांग निकला। ” अजय के जवाब पर विक्रम की आंखों में समझने के भाव झलक पड़े।
आपेक्षाओं के दंश
2 दिसम्बर
प्रीबोर्ड में मेरे सिर्फ एट्टी परसेंट मार्क्स देखकर मम्मी बहुत नाराज़ हुईं हैं । इसलिए कि अपने सर्कल में उनकी बेइज्जती हो जाएगी। उनका मानना है कि अभी इतने कम मार्क्स हैं तो बोर्ड में क्या होगा ?

15 दिसम्बर
पापा खुद ज्यादा पढ़ नहीं सके थे, तो उनकी सारी उम्मीदें मुझसे है। वह मुझे आईएएस बनाना चाहते हैं। यदि मैं उसमें सफ़ल न हुआ तो वे बेहद निराश होंगे। पर मैं तो सिंगर बनना चाहता हूँ। एनुअल फंक्शन के लिए मैम ने मुझे स्कूल के बैंड में लिया था, पर पापा के फोर्स करने पर मुझे उसमें से अपना नाम निकलवाना पड़ा। मेरी अपनी इच्छा की कोई कीमत ही नहीं !
1 जनवरी
आज दोस्तों के साथ नए साल के जश्न के लिये मम्मी पापा ने मुझे जाने ही नहीं दिया। वह चाहते हैं कि अब मुझे सिर्फ पढ़ना चाहिए, पर थोड़ी देर के एंटरटेनमेंट का हक़ तो मुझे भी है। उन्होंने जबर्दस्ती मुझे पढ़ने बैठा दिया है। अब तो मुझे पढ़ाई के नाम से नफरत होने लगी है।
8 फरवरी
आज कैमिस्ट्री के खराब प्रेक्टिकल के साथ मेरी बोर्ड की शुरूआत अच्छी नहीं रही। अब क्या होगा ? मम्मी पापा मेरे कम नम्बर देखकर निराश होंगे। पर क्या करूँ ? मैंने तो दिनरात एक करके पढ़ाई की। फिर भी अगर कुछ गड़बड़ हो जाए तो क्या करूँ मैं ?
12 मार्च
इतनी मेहनत करने पर भी मैथ्स का पेपर खराब हो गया। दो क्वेश्चन मुझे समझ ही नहीं आये। आज मैं बेहद निराश हूँ। पापा कहते हैं ट्वेल्थ बोर्ड बहुत महत्वपूर्ण है। अगर नम्बर कम आये तो अच्छे कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलेगा ।
21 मार्च
आज फ़िज़िक्स का पेपर भी मैं नाइंटी परसेंट सॉल्व कर पाया। मम्मी पापा चाहते हैं कि मेरे कम से कम नाइंटी एट परसेंट मार्क्स आयें। पर मुझे नाइंटी परसेंट की भी उम्मीद नहीं। मैं मम्मी पापा की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। अब अपने सर्कल में मम्मी की निगाह झुक जाएगी और पापा को भी शॉक लगेगा। वह दोनों मुझसे इतना प्यार करते हैं । उनकी खुशी के लिए इतना करना मेरी जिम्मेदारी थी।
4 अप्रैल
निराशा बढ़ती ही जा रही है। जीवन बेकार लगने लगा है। मुझे जीने का हक़ नहीं। अपने माता पिता के सपनों को मैं चाहकर भी पूरा नहीं कर सका और मेरे सिंगर बनने के सपने को पापा पूरा नहीं होने देंगे। उनकी नज़र में जो किसी लायक नहीं होते वो ही भांड मिरासी बनते हैं।
11 अप्रैल
अब तो लगने लगा है कि मम्मी पापा ने मुझे सन्तान सुख के लिए नहीं, बल्कि अपनी समाजिक प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी लिए ही जन्म दिया है। अपनी इच्छाओं का गला घोंटते हुए, बस अपेक्षाओं का बोझ ढोते मैं थक चला हूँ। या शायद मैं ही किसी लायक नहीं। मैं स्वयं को समाप्त कर रहा हूँ।
अगम।

ज्योत्सना कपिल
