राष्ट्रमत न्यूज,रीवा(ब्यूरो)। डिप्टी सीएम राजेन्द्र शुक्ला के रीवा में संजय गांधी अस्पताल पर बढ़ते दबाव को कम करने के मकसद से करोड़ों की लागत से वर्षो पहले शव परीक्षण भवन बनाया गया था। लेकिन इस शव परीक्षण भवन में बेड लगाकर इसे वार्ड बना दिया गया है। इसमें मरीजों का उपचार होता है। इस भवन में अन्य चिकित्सकीय समान रखे हुए हैं। आज तक इस शव परीक्षण भवन में एक भी मुर्दे का परीक्षण नहीं हुआ। जिला अस्पताल की प्रभारी डॉक्टर प्रतिभा मिश्रा कहती हैं कि एचआर नहीं है। स्टाफ की कमी है। पहले स्टाफ की नियुक्ति की गयी थी लेकिन किस वजह से शव परीक्षण भवन में शवों का परीक्षण नहीं हुआ, सरकारी व्यवस्था के जिम्मेदारों को भी पता नहीं।

शव परीक्षण का भवन में चिकित्सा सामग्री है
शव परीक्षण भवन में कहीं बेड लगाकर वार्ड बना दिया गया है, तो कहीं अन्य चिकित्सा सामग्री रखी हुई है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि डॉक्टरों की कमी के कारण संचालन शुरू नहीं हो सका। सवाल यह है कि जब भवन तैयार था और कर्मचारी भी नियुक्त हो चुका था, तो आखिर इतने समय तक यह सुविधा शुरू क्यों नहीं हो पाई? इस सवाल का जवाब शायद डिप्टी सीएम के पास हो। वो भोपाल से आने के बाद निर्माण कार्यो की समीक्षा करते हैं,लकिन इस मुर्दा घर की और क्यों ध्यान नहीं गया। यह सबको हैरान करता है।
वर्षों पहले शव परीक्षण का भवन बना
रीवा जिला अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। वर्षों पहले शव परीक्षण केंद्र के लिए भवन तैयार कराया गया, जरूरी इंतजाम किए गए और वर्ष 2025 में सिरमौर से दुर्गा स्वीपर को जिला चिकित्सालय में पदस्थ भी किया गया। इसके बावजूद शव परीक्षण केंद्र का संचालन आज तक शुरू नहीं हो सका।

मरीजों को ड्रिप भी लगाई जाती है
जिस उद्देश्य से इस भवन का निर्माण कराया गया था, वह उद्देश्य अब तक अधूरा है। करोड़ों की लागत से तैयार भवन का उपयोग पोस्टमार्टम के बजाय दूसरे चिकित्सा कार्यों के लिए किया जा रहा है।मौके पर पहुंचकर जब भवन की स्थिति देखी गई, तो तस्वीर और भी चौंकाने वाली नजर आई। शव परीक्षण के लिए बनाए गए भवन के अंदर बेड लगाकर बाकायदा वार्ड का रूप दे दिया गया है। यहां मौजूद डॉक्टर एसके शर्मा के मुताबिक, मरीजों को आयरन की दवाएं दी जाती हैं और उन्हें ड्रिप भी लगाई जाती है।
शव परीक्षण गृह में दूसरा उपचार
इतना ही नहीं, भवन के अंदर ही जनरेटर का डीजी सेट और अन्य सामग्री भी रखी हुई है। वहीं, एक अलग कमरे में ओएसटी सेंटर संचालित किया जा रहा है, जहां एड्स से संबंधित उपचार की व्यवस्था बताई गई।
यानी जिस भवन में शव परीक्षण की सुविधा शुरू होनी थी, वहां दूसरी चिकित्सा गतिविधियां संचालित हो रही हैं, लेकिन पोस्टमार्टम का इंतजार खत्म नहीं हुआ है।
जरूरी स्टाफ की कमी है-डॉक्टर प्रतिभा
मामले में जब जिला अस्पताल की प्रभारी डॉक्टर प्रतिभा मिश्रा से बात की गई, तो उन्होंने स्वीकार किया कि शव परीक्षण केंद्र के लिए कर्मचारी की नियुक्ति हुई थी, लेकिन डॉक्टरों और जरूरी स्टाफ की कमी के चलते इसका संचालन शुरू नहीं हो पाया।प्रभारी के मुताबिक, इस संबंध में भोपाल स्तर पर बातचीत चल रही है। आने वाले कुछ महीनों में जिला अस्पताल का 300 बिस्तरों तक विस्तार होने की योजना है। डॉक्टरों की नियुक्ति होने के बाद शव परीक्षण केंद्र का संचालन शुरू किए जाने की उम्मीद है।
व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त भार
गौर करने वाली बात यह है कि विंध्य के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में शामिल संजय गांधी अस्पताल में पोस्टमार्टम का काम लगातार दबाव में रहता है। यहां बड़ी संख्या में शव परीक्षण होने के कारण व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त भार पड़ता है। इसी दबाव को कम करने के उद्देश्य से जिला अस्पताल में अलग शव परीक्षण केंद्र तैयार किया गया था।
स्टाफ की व्यवस्था नहीं
लेकिन सुविधा तैयार होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं हो पाना कई सवाल खड़े करता है। अगर डॉक्टरों की कमी पहले से थी, तो क्या भवन तैयार करने के साथ ही स्टाफ की व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए थी? क्या संचालन शुरू करने की जिम्मेदारी तय थी? और आखिर कब तक तैयार भवन अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर रहेगा?
शव परीक्षण की तारीख तय नहीं
फिलहाल जिला अस्पताल का शव परीक्षण केंद्र कब शुरू होगा, इसकी कोई निश्चित तारीख सामने नहीं आई है। अस्पताल प्रबंधन आने वाले महीनों में डॉक्टरों की नियुक्ति और संचालन शुरू होने की उम्मीद जता रहा है। अब सवाल यह है कि सरकारी धन से तैयार भवन का उपयोग उसके मूल उद्देश्य के लिए कब शुरू होगा और संजय गांधी अस्पताल में पोस्टमार्टम के बढ़ते दबाव से मरीजों के परिजनों तथा संबंधित व्यवस्थाओं को राहत कब मिलेगी?