मुत्ताकी ने जिस तरह से भारत-अफगानिस्तान द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने पहल की है। उससे अमरीका, चीन और पाकिस्तान की बैचनी बढ़ती दिख रही है। खासतौर से भारत के विदेष मंत्री एस जयषंकर के साथ वार्ता के दौरान मुत्ताकी ने भारत के खिलाफ अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देने व भारत में दुतावास शरू करने की बात कही है, उससे पाकिस्तान सकते में आ गया है।

अफगानिस्तान के विदेष मंत्री आमिर खान मुत्ताकी इन दिनों भारत के दौरे पर है। साल 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार आने के बाद यह पहला अवसर है जब तालिबान सरकार का कोई बड़ा मंत्री भारत के दौरे पर आया है। यात्रा के दौरान मुत्ताकी ने जिस तरह से भारत-अफगानिस्तान द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने पहल की है। उससे अमरीका, चीन और पाकिस्तान की बैचनी बढ़ती दिख रही है। खासतौर से भारत के विदेष मंत्री एस जयषंकर के साथ वार्ता के दौरान मुत्ताकी ने भारत के खिलाफ अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देने व भारत में दुतावास शरू करने की बात कही है, उससे पाकिस्तान सकते में आ गया है।
बगराम एयरबैस की मांग
मुत्ताकी के भारत दौरे को भारत-अफगानिस्तान संबंधों में रीसेट के तौर पर देखा जा रहा है। यात्रा के दौरान मुत्ताकी ने भारत की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा मुश्किल समय में अफगानिस्तान का साथ दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे संबंध केवल व्यापार तक ही सीमित नहीं हैए बल्कि सुरक्षा, संस्कृति, खेल और अन्य संबंधों से भी जुड़े हैं। मुत्ताकी अमेरिका द्वारा बगराम एयरबैस की मांग की पृष्ठभूमि के बीच भारत के दौरे पर आए है। कहीं ऐसा तो नहीं कि तालिबान सरकार द्वारा अमेरिका को बगराम एयरबेस देने से इंकार के बाद उपजे हालातों के दृश्टिगत अफगानिस्तान के विदेषमंत्री किसी कूटनीतिक लक्ष्य को साधने के लिए भारत से संबंध सुधारने की पहल कर रहे हैं। यह आशंका इसलिए उठ रही है क्योंकि मुत्ताकी भारत आने से पहले रूस गए थे। रूस यात्रा के दौरान भी उन्होंने बगराम एयरबैस का मुद्दा उठाया था। रणनीतिक दृष्टि से बगराम एयरबेस ईरान, पाकिस्तान, चीन और मध्य एशिया के समीप होने के कारण अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ठीकाना है। सन् 2021 में अमरीका ने इसी खाली कर दिया था। अब ट्रंप दौबारा सत्ता में आने के बाद इस पर फिर से कब्जा करना चाहते है।
काबुल का इस्तेमाल भारत के खिलाफ
दरअसल भारत अफगानिस्तान संबंधों में इस्लामाबाद एक अहम फैक्टर रहा है। मजहबी समानता और निकट पड़ोसी होने के कारण पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को हमें बैकयार्ड डिप्लोमेसी के तौर पर देखा है। पाकिस्तान को लगता है कि इस्लामिक मुल्क होने के कारण वह अफगानिस्तान के जरिए भारत को नियंत्रित कर सकेगा। साल 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद एक बारगी तो उसकी बाछें खिल उठी थी। उससे लगा तालिबान सरकार के जरिए काबुल को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकेगा। लेकिन मुल्ला हसन अखुंद के नेतृत्व में बनी इस्लामिक अमीरात ने पाकिस्तान के मनसुबों पर पानी फैर दिया। सत्ता में आने के बाद तालिबान ने पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत के साथ संबंध बढाने शुरू कर दिए। आर्थिक, सामरिक और इफ्रास्टक्चर के क्षेत्र अफगानिस्तान भारत को प्राथमिकता देने लगा। अब मुत्ताकी के दिल्ली दौरे को तालिबान के जनक पाकिस्तान के लिए एक झटके के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान काबुल पर दबाव बनाने व अपनी खीज मिटाने के लिए एयरस्ट्राइक का सहारा ले रहा है।
मुत्ताकी का रणनीतिक संवाद
मुत्ताकी के भारत दौरे पर चीन और अमेरिका भी निगाहे लगाए हुए है। भारत और अफगानिस्तान के मजबूत संबंध अफगानिस्तान में चीन और अमेरिका के हितों को भी प्रभावित कर सकता है। खासतौर से बगराम एयरबैस और सीपैक परियोजना के मुद्दे को लेकर। चीन की बैचेनी इस बात को लेकर बढ़ी हुई है कि अगर भारत अफगानिस्तान में मजबूत भूमिका में आता है, तो उसकी बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ैट पर खतरा मंडरा सकता है। हालांकि भारत ने तालिबान सरकार को अभी तक मान्यता प्रदान नहीं की। वह शुरू से ही काबूल में एक समावेशी सरकार के गठन की वकालत कर रहा है। यही वजह है कि भारत ने मुत्ताकी के दौरे को औपचारिक मान्यता नहीं बल्कि रणनीतिक संवाद का माध्यम बताया है। भारत यात्रा के दौरान मुत्ताकी ने विदेषमंत्री व अन्य अधिकारियों से राजनयिकए व्यापारिक और आर्थिक साझेदारियों को लेकर बात कर है, उससे जाहिर है कि अफगानिस्तान की राजनीति में भारत के लिए दरवाजे खुले हुए हैं।

.डाॅ एन.के. सोमानी