डॉ. सेवाराम त्रिपाठी बता रहे हैं आज रिश्ते टूट नहीं रहे, धीरे-धीरे घिस रहे हैं।जैसे किसी पुराने फोटो-एल्बम से रंग उड़ते हैं,चेहरे रहते हैं, भाव नहीं।पहले रिश्ते ज़रूरत से पहले निभाए जाते थे,अब ज़रूरत पड़ने पर याद आते हैं।घर अब परिवार नहीं रहा,एक छत के नीचे रहने वाले अलग-अलग द्वीप हो गए हैं।औपचारिकताएँ बढ़ गई हैं,“कैसे हो?” पूछा जाता है,पर जवाब सुनने का समय नहीं ।व्हाट्सऐप के गुड मॉर्निंग में अपनापन ढूँढते हैं,और सामने बैठे इंसान से आँखें नहीं मिलतीं। यह बिखराव सिर्फ पीढ़ियों का नहीं है, संवेदनाओं का है।हम तेज़ होते गए,रिश्ते पीछे छूटते गए। रिश्ते मशीन नहीं हैं कि बदल न सकें।एक सच्ची बातचीत,एक बिना वजह की मौजूदगी।
मन की चौपाल/ डॉ. सेवाराम त्रिपाठी
‘‘मैं अपने घर लौटूंगा/ मेरे घर के आंगन में/जो पचपन वर्ष का बूढ़ा पेड़ है/उसके पांव के पास/एक नन्हीं कोंपल उगी है/मैं अपने घर लौटूंगा उस कोंपल को/अपने शेष जीवन-जल से सीचूंगा… मैं अपने घर लौटूंगा/और अपनी ज़िंदगी की बची हुई ऊन से/एक नन्हा पुलओवर बनाऊंगा/ जो समय के साथ/एक ऐसा पुलओवर बन जाएगा/ दुनिया का हर बच्चा पहन पाएगा/ और घर शब्द को/शब्दकोष से निकालकर/एक लोक शब्द बनाएगा।“ (कुमार विकल)
बिना विश्वास के रिश्ते
रिश्तों को परिभाषित करना हमेशा कठिन रहा है। कुछ रिश्ते हमेशा रक्त संबंधों के साए में चलते हैं और कुछ हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक रूपों से निर्मित होते हैं। एक रिश्ता मनुष्यता का भी है और वह हमारे समय के व्यापक फलक को घेरता है। रिश्तों को खोजना, सींचना और सहेजना पड़ता है। रिश्ते एक-दो दिन में नहीं बनते; कभी-कभी उनकी साज-संभाल में एक उम्र लग जाती है। रिश्ते टूटने में तो एक पल नहीं लगता, इसलिए रिश्तों की गंभीर परवाह करनी चाहिए। सुदृढ़ रिश्तों के लिए हमेशा सुदृढ़ विश्वास की ज़रूरत होती हैं। बिना विश्वास के रिश्ते लंबे चल ही नहीं सकते। यहां मैं अंधविश्वास या मजबूरी की बात नहीं कर रहा हूं।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि
रिश्ते हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होते है और रिश्तों में जीवन की ऊष्मा हो तो कोई भी लक्ष्य पाया जा सकता है। रिश्ते त्याग की मांग करते हैं। रिश्ते प्रेम और जिजीविषा की चाहत रखते हैं। मिर्ज़ा गा़लिब कहते हैं- ‘‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले/बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले।“ समाज में रिश्तों का एक विशेष स्थान है। सामाजिक जीवन की सफलता के लिए रिश्तों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हम जिस दौर में हैं, उसमें पारिवारिक मूल्य, जीवन मूल्य और रिश्तों के प्रति रागात्मकता निरंतर घटी है। ज़्यादातर अपने स्वार्थ के लिए रिश्ते निभाने की मुहिम चल रही है। रिश्तों के संचालन में अमीर-ग़रीब का भेद तो है ही; पैसों की भी विराट लीला है। रिश्तों में प्यार-हुलास और जीवतंता ज़रूरी है। रिश्तों को निभाने के लिए अपनापन और सहजता भी ज़रूरी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमारे जीवन में ज़्यादा रिश्ते भले ही न हों पर जितने भी हों, उनमें गरमाहट का होना लाजमी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो रिश्ते टिकाऊ नहीं हो सकते? अल्पना वर्मा की काव्य-पंक्तियां हैं- ‘‘खुली हथेलियों में कहां रह पाते हैं/मन में बसते हैं, कभी रूह में उतर जाते हैं/कैसे रिश्ते हैं/जो समझ नहीं आते/देह से नहीं बस मन से बांधने वाले/भावों का अथाह सागर कभी दे जाते हैं/अपेक्षाओं से बहुत दूर मगर हैं नाजुक/टूट कर गिरे तो बस बिखर कर रह जाते हैं।“
बेचैन करने वाला कष्ट
रिश्तों में ऐसा क्या है जिसको सहेजने के लिए हम बार-बार तड़प उठते हैं? अतीत को वर्तमान में पूरा का पूरा रख देना चाहते हैं? मेरे एक मित्र हैं अशोक द्विवेदी। इस समय भोपाल में रहते हैं। पीएचई विभाग में इंजीनियर थे। छत्तीसगढ़ राज्य से अवकाश प्राप्त करने के पश्चात सुखी और संपन्न जीवन बिता रहे थे। तीन बेटियां हैं- बेटियों के परिवार अपने काम-धंधे से लगे हुए हैं। एक तरह का अमन-चैन है। लेकिन द्विवेदी जी तनाव के किन आवर्तो में हैं, पता ही नहीं चलता! पिछले वर्ष हार्टअटैक हुआ। लंबे इलाज के बाद स्वस्थ हो ही रहे थे कि अचानक भयानक लकवा (पैरालिसस) का शिकार हो गए। यह हादसा झेलते उन्हें छह महीने से ज्यादा का समय हो गया। ऐसे प्यारे और दिलखोल आदमी का यह कष्ट मुझे बेचैन किए रहता है। दूसरे साथी है श्री बी एन मिश्रा- रीवा (मध्य प्रदेश) में रहते हैं. पिपरिया में वे गर्ल्स हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्राचार्य थे और मैं कॉलेज में प्रोफ़ेसर था। अब हम दोनों सेवानिवृत्त हैं लेकिन रिश्तों की ऊष्मा जस की तस है। उनसे मिलने की इच्छा मुझे हमेशा एक पांव पर खड़ा रखती है। वहीं कुछ रिश्तों का रोना यह है कि जिनके साथ आपने 25-30 वर्षो तक लगातार समय साझा किया, उनके साथ संबंध बहाल करने तक की कोई इच्छा अब शेष नहीं रही!

हम अनुपस्थित रहने लगे
आधुनिक जीवन पद्धति और बाज़ार की माया ने हर चीज़ को स्वार्थों के खेल में बदल दिया है। लोग रिश्तों के भीतर छिपे रूपों को नहीं समझना चाहते। एक दौर ऐसा भी था जब टेलीविजन (या कहें दूरदर्शन) ने हमारे समय को छेड़ या स्तंभित कर दिया था। जैसे कोई मित्र मिलने आया है, कोई रिश्तेदार और प्रिय पात्र हमारे घर में बैठा है लेकिन लोग उलझे हैं टीवी में। किसी के पास वक़्त नहीं। अब सेल फ़ोन का एक अवतार- टच मोबाइल हमारे जीवन और दुनिया में प्रकट हो गया है। आप मन में बड़ा उल्लास व उमंग भर कर किसी से मिलने कहीं पहुंचे और सामने वाले सज्जन मोबाइल से जूझ रहे हैं। आपसे हाँ, हूँ बातें करेंगे और अंत में आप वहाँ से चिढ़ कर वापस आ जाएंगे। पिछ्ले दिनों मैंने एक मित्र की बेटी के सगाई समारोह में गौर किया कि होने वाले वर-वधू के माता-पिता को छोड़ कर लगभग सभी रिश्तेदार और आगंतुक अपने-अपने मोबाइल फ़ोन की स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए हुए थे। यानी आत्मीय बाद-व्यवहार भी अब मात्र एक औपचारिकता बन कर रह गया है। सामाजिक रिश्तों में उपस्थित होते हुए भी हम अनुपस्थित रहने लगे हैं!
रिश्तों को रेखांकित करने के दावे
रिश्तों को रेखांकित करने के दावे के साथ इधर फेसबुक में विभिन्न प्रकार के दिवसों को मनाने का एक नया रूप सामने आया है। मसलन, पितृ दिवस (फादर्स डे), मातृ दिवस (मदर्स डे), शिक्षक दिवस (टीचर्स डे), मित्रता दिवस (फ्रेन्डशिप डे), प्रेमी-प्रेमिका दिवस (वैलेंटाइंस डे), बेटी दिवस (डॉटर्स डे), अलाना दिवस, फलाना दिवस। लोग धड़ल्ले से सेवा, त्याग, सम्मान, समानता, प्यार और स्नेह जताने वाली पोस्ट ठेल रहे हैं। उनमें सत्यता कम कृत्रिमता ज़्यादा है। वरना क्या कारण है कि अपने ख़ून से बचपन सींचने वाली मां को बंद कमरे में कंकाल बनने के लिए छोड़ कर संतान विदेश में ऐश करती है और बेहतर परवरिश के लिए आजीवन खटने वाले पिता को लोग वृद्धाश्रमों में अजनबियों के हवाले कर देते हैं। पास-फ़ेल होने के भय का दायरा लांघते ही अधिकतर विद्यार्थी अपने शिक्षकों को नमस्कार करने की ज़रूरत भी नहीं समझते! छोटे-से मनमुटाव के चलते बरसों के याराने चले जाते हैं। नए आकर्षण साथ जीने-मरने की क़समें खाने वालों को झटके में बेवफ़ा बना देते हैं। सबको लपेटे में न लिया जाए तब भी ऐसे रिश्तों के जन्नत की हक़ीकत सबको मालुम है।
बार-बार भीग-भीग जाता हूं
जानता हूं, आत्मीय रिश्तों की बुनावट हमें हमेशा तरोताज़ा और संवेदनात्मक बनाती है। अपने गांव की याद करता हूँ तो बार-बार भीग-भीग जाता हूं। वहां हर धर्म-जाति-बिरादरी के लोग, जो मेरे पिता जी को भाई कहते रहे हैं, उनके साथ उम्र और शिक्षा-दीक्षा की परवाह किए बगैर मेरे रिश्ते मुझसे एक पीढ़ी ऊपर के थे। मसलन परमा नाऊ को मैंने कभी उनका नाम लेकर नहीं बुलाया, वे मेरे लिए हमेशा काका रहे। मेरे पिता जी मनबोधी कोटवार को भाई कहते थे- मैं उन्हें आदर के साथ कक्का कहता था। इसी तरह लोहार काका, बढ़ई काका लगभग उम्रहोने के बावजूद रिश्तों की ऊपरी सीमा पर थे। हमारे घर एक तेली भैया आते थे- मेरी माँ को काकी और पिता जी को काका कहते थे। वे भी मेरे लिए हमेशा भाई रहे और उनकी घरवाली को मैं भउजी कहा करता था। गांव में तथाकथित छोटी जातियों के लोग, जैसे विसलियां कोटवार के दामाद आते थे तो हमारे यहाँ उनको पूरे सम्मान से बैठाया जाता था। उनके साथ शिष्ट व्यवहार किया जाता था। सचमुच रिश्तों का बड़ा सम्मान था हमारे जीवन में।
वहां के वातावरण में
रीवा या अन्य जगहों में रहते हुए मेरी मां जब भी गांव से आतीं कभी झरबेरी के बेर लातीं, कभी कैथा, कभी अंबरा (आंवला), कभी अमचूर, कभी बिरचुन, कभी पड़ोरा, कभी नीबू। कभी-कभी चना की भाजी भी लाती थीं। वे 92 वर्ष की होकर हमसे विदा हुईं। उनकी जीवन शैली में गाय का अग्रासन (अगरासन) शामिल था। साथ ही भोजन करने के पहले होम लगाना ज़रूरी था। मैं जहाँ रहता था गाय वहाँ थी नहीं। उन्हें दिक्कत होती। हमने बहुत दिनों तक मां की लाई हुई चीज़ों को, उनकी भावनाओं को शायद ठीक से समझा नहीं। हम कहा करते थे- क्यों परेशान होती हो? वे कहती थीं- बिना मां-बाप बने इन भावनाओं को क्या समझ पाओगे? पिता जी जब हमारे पास स्थायी रूप से शहर में रहने आ रहे थे तो उनका प्रस्ताव था कि घर की गाएं दुधारू हैं- उन्हें यहां ले आया जाए। मैंने अपनी असमर्थता जाहिर की। यदि मेरे माता-पिता कभी अपने आप को उपेक्षित महसूस करते तो कहा करते- तुम लोग भी हम जैसे बूढ़े होओगे तब सारी बातें समझोगे। छोटी-छोटी चीज़ों से उनका लगाव और जुड़ाव अद्भुत था। गांव में जो हमारे पुरखों के सजाए खेत हैं- आज हमें कारूं का ख़ज़ाना लगते हैं। उन खेतों का एक-एक दाना हमारे लिए बेशक़ीमती है, क्योंकि उनसे हमारी भावनाएं जुड़ी हैं। हमारा अपनत्व हमारी निजता उनकी मिट्टी में है, वहां के वातावरण में हमारे प्राण बसते हैं। भले ही महीनों न जा पाएं- रिश्ता है तो है।

अनमोल धरोहर की तरह
रीवा में जहाँ मैंने अपना आशियाँ बनाया है- शिल्पी उपवन में, वह कॉलोनी नई है। घर में आम का एक पेड़ है। इस साल उसमें आठ-दस फल ही लगे। बड़े होने पर उनमें से दो आम भोपाल रहने वाले मझले बेटे को दे दिए। कुछ दिनों बाद जब बड़ी बहू नीलम बनारस जाने लगी तो दो आम उसको दिए गए। वह टालमटोल कर रही थी। कहने लगी कि क्या बनारस में आमों की कमी है? वहीं ख़रीद लेंगे। मैं और मेरी धर्मपत्नी यानी उसके सास-ससुर थोड़ी देर के लिए ख़ामोश खड़े रहे। मौके की नजाकत समझकर वह लगभग रुआंसी हो गई। उसे समझते देर नहीं लगी कि आम के ये फल ज़्यादा से ज़्यादा आधा किलो वजन के होंगे। लेकिन इन दो फलों में मम्मी-पापा के स्नेह, आंतरिकता और मोह का रस भरा हुआ है। उसने फौरन अपने ज़रूरी सामान के बीच उन आमों को किसी अनमोल धरोहर की तरह सहेज कर रख लिया। रिश्तों की प्रगाढ़ता आंखों से टपक पड़ी। अपने माता-पिता की कही बातें किसी चलचित्र की तरह मेरे मस्तिष्क में घूमने लगीं।

उनसे बातें होती हैं मोबाइल पर।
हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ चीज़ों से जुड़ी भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं होती। अब तो ऐसा समय है जो मात्र स्वार्थ के दावानलों में है। किस-किस को याद करूं! शायद कुछ लोग पढ़ कर हंसें भी। मेरे एक गुरु जी हैं- नाम है श्री चन्दभान धर द्विवेदी- वे 90 वर्ष के हैं, अपने छोटे बेटे के साथ भोपाल में रहते हैं। कभी- कभार उनसे बातें होती हैं मोबाइल पर। इस वर्ष मझले बेटे मनीष, बहू नन्दिनी और पोतों के साथ उनसे मिलने गया था। साथ में मेरी जीवनसंगिनी शांति भी थी। उनके बहू-बेटे ने हमें जो सम्मान दिया, वह अकथ है। विदा लेते वक़्त गुरू जी इतने भावुक हो गए कि रो पड़े! अपने विद्यार्थी जीवन से बहती चली आई संवेदना की उस अजस्र धारा से मैं अब तक आप्लावित हूँ।
उनकी आत्मीयता हर पल मेरे साथ
मेरे एक महान शिक्षक थे डॉ. कमला प्रसाद। एक प्रतिभावान आलोचक, मेधावी संपादक और संगठक के तौर पर हिंदी का समूचा साहित्य-संसार उन्हें जानता और याद करता है। बाद में वह अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव भी बने। वे मेरे शिक्षक भर नहीं थे; मार्गदर्शक और बड़े भाई की तरह रहे हैं। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी आत्मीयता हर पल मेरे साथ है। याद आता है कि एक बार ग्वालियर से अकेले लौटते समय उन्होंने अपने बच्चों के साथ-साथ मेरे लिए भी शर्ट का एक पीस ख़रीद लिया था और जब रीवा में मैंने संकोचवश उसे स्वीकार करने से मना किया तो कहने लगे कि यह ‘शिष्यदक्षिणा’ है! कल्पना कीजिए कि वह ‘गुरुदक्षिणा’ वगैरह में विश्वास नहीं करते थे लेकिन मुझे वह उपहार स्वीकार करने के लिए राजी करने हेतु ‘शिष्यदक्षिणा’ शब्द को ईजाद कर डाला!
ढाबे में खाते हैं लिट्टी एक साथ
मेरे अत्यंत आत्मीय और हिन्दी के एक बड़े कवि अरुण कमल ने कमला प्रसाद जी के जन्मदिन पर एक कविता लिखी थी, जिसका शीर्षक है ‘दोस्त‘। उसके दो अंश आप भी पढ़ें- “जानता हूँ कोई है मेरा वीर कहीं/जो बचा लेगा मुझे आखिरी वक़्त/चाहे जितना भी पाप करो/जो उतार लेगा मुझे फूल सा फांसी के फन्दे से/उसकी आस्तीन में पोंछता चेहरे की गर्द/कोई है जिसके मुंह पर झूठ न बोलूं/कोई है जिसके आगे ग़लत सुनते डरूं/जिसकी नज़र से गिरने का मतलब चौबीसवीं मंजिल से गिरना।” उसी का एक दूसरा अंश- “दो छोटे बच्चे जूते चमकाने वाले/बैठे हैं सुबह से ग्राहक के वास्ते/कि शाम होते-होते आता है एक के पास एक ग्राहक/और दूसरा उसे अपनी डिबिया से देता है क्रीम/और फिर दोनों ढाबे में खाते हैं लिट्टी एक साथ/क्या है इस छोटी-सी बात में/जो आज मुझे व्याकुल कर रहा है/अभी-अभी सुना मैंने चन्द्रमा पर जल है/और दोस्त की सुराही में जल/मेरे कुएं का पानी खारा दोस्त के घर का मीठा जल/दोस्त जिनसे ज़िन्दगी में मानी पैदा होते हैं।” अरुण कमल की बात रिश्तों के जादू को प्रकट करती है। हमारी भावनामयता को नया आलोक देती है।
गजाधर बाबू इतने अकेले हैं
बहुत पहले पढ़ी कथाकार उषा प्रियंवदा की एक कहानी ‘वापसी’ याद आती है। उसके गजाधर बाबू हमें बार-बार स्मरण आते हैं। साठ-सत्तर के दशक की यह कहानी आधुनिकता की लंबी छलांग की कहानी है। अपनी पत्नी, बच्चों के लिए गजाधर बाबू का समर्पण बेमिसाल है। लेकिन वे अंतिम दौर में उपेक्षा का दंश झेलने को बाध्य हुए। रेलवे की नौकरी से रिटायर होने के बाद वे अपने घर इस आशा और विश्वास के साथ आए थे कि परिवारजनों के साथ हंसी-ख़ुशी रहेंगे, लेकिन लौटने पर उन्हें सब कुछ बदला-बदला दिखाई पड़ता है। गजाधर बाबू इतने अकेले हैं, इतने आंतरिक दुख में हैं कि उनकी पत्नी और बच्चे तक उस अकेलेपन को, उस पीड़ा को नहीं समझ पाते। क्या हो गया है हमारे समय और समाज को! हमारे रिश्तों के ग्राफ़ को!! हम अकेलेपन की खाई में मुश्कें बांध कर धकेल दिए गए हैं या यह महज समय का रुझान है!!!
गुलमोहर खिलाना ऐसे ही सीखा
लेकिन रिश्तों के घटाटोप में कभी-कभी उजली यादों की एक बिजुरी चमकती है और आशा-दिलासा के फूल खिल जाते हैं। याद आता है कि अपने छोटे बेटे अभिषेक को जब मैं गंभीर स्थिति में इलाज के लिए निपट अजनबी महानगर बंबई (अब मुंबई) ले कर जाने की योजना बनाते हुए घबरा रहा था, तो मेरे उमरी (ज़िला -सतना) निवासी गुरु जी रामराज सिंह ने कैसे मेरा ढाढ़स बंधाया था। उन्होंने न सिर्फ मुझे पशोपेश से निकाला बल्कि अपने मुंबई में रहने वाले एक नाती को मेरे पहुंचने से पहले ही चिट्ठी लिख कर चेता दिया कि सेवाराम आएंगे तो अपने पिता की तरह ही उनकी ख़ैरख़्वाह रखिएगा। अब बताइए, मैं स्वयं तब दूसरे बच्चों को महाविद्यालय में पढ़ाता था, लेकिन संबल मिला मुझे माध्यमिक शाला में पढ़ाने वाले अपने गुरु जी से! रिश्तों का गुलमोहर खिलाना ऐसे ही सीखा जाता है।

यदि रिश्तों में घनत्व है
रिश्तों की स्मृतियों के हाथीद्वार पर साथ पढ़ने-खेलने वाले कई लंगोटिया यार, नौकरी के दौर के सहकर्मी और मेरे अनेक विद्यार्थी लगातार दस्तक देते रहते हैं। समय की कोई धुन इसकी अनुगूंज को मद्धिम नहीं कर सकती। यह एक ऐसा रसायन है जिसमें अपनत्व का अमृत घुला हुआ है। मेरे लिए रिश्ते किसी मीठी लोरी से कम नहीं। इसलिए यदि रिश्तों में घनत्व है तो उन्हें अनिवर्यतः सहेजा जाना चाहिए। रिश्तों की धमक और चमक व्यक्तियों से लेकर समाज और देश-विदेश तक आवाजाही करती है। इस प्रसंग में हमारे समय के एक बेहद महत्वपूर्ण और चहेते कवि केदारनाथ सिंह का यह कवितांश मेरी आत्मा को नम कर रहा है- “अब तो आ गया हूं पर क्या करूं मैं/एक बूढ़े पक्षी की तरह लौट-लौट/मैं यहीं क्यों चला आता हूं बार-बार/पृथ्वी पर ऊब क्या उतनी ही पुरानी है जितनी डूब/… जो मेरे नहीं है/आख़िर वे भी तो मेरे ही हैं/चाहे जहां भी रहते हों/फिर क्यों यह जिद/कि यहीं, यहीं/ सिर्फ मेरा ही घर है?” (ज़मीन पक रही है)।
अपने गाँव, अपनी धरती को याद करना, भूले-बिसरे सहचरों का स्मरण करना, उन सब की छुअन को महसूस करना हमें मनुष्यता की गरिमा से ओत-प्रोत करता है और रिश्तों के फलक को पृथ्वी की जड़ों से लेकर आकाश की फुनगी तक विस्तीर्ण कर देता है।

डॉ. सेवाराम त्रिपाठी,रीवा, मध्यप्रदेश
मो.7987921206
