राष्ट्रमत न्यूज,बालाघट\लांजी(ब्यूरो)। दक्षिण बैहर क्षेत्र के दुर्गम एवं दूरस्थ अंचलों को मुख्यधारा से जोड़ने वाली घोटी-चोरिया-डाबरी सड़क सरकारी कार्यप्रणाली, निर्माण एजेंसी की लापरवाही और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है। विडंबना की बात यह है कि फरवरी 2018 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत उक्त सड़क निर्माण के लिए अनुबंध हो चुका था, लेकिन अनुबंध के बाद भी सड़क का निर्माण कार्य आज तक पूर्ण नहीं हो सका है। करीब 09 वर्ष का समय बीतने जा रहा है, लेकिन कार्य को अब तक गति नही मिली है। नतीजतन, क्षेत्र के सैकड़ों गांव आज भी सुगम आवागमन से दूर नजर आ रही है और यहां की जनता को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
विभाग ने ठेका निरस्त कर दिया
जानकारी अनुसार सड़क की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। जिसकी अनुमानित लागत लगभग 36 करोड़ रुपये बताई जा रही है। लेकिन इतनी बड़ी परियोजना का वर्षों तक अधूरा रहना अपने आप में गंभीर विषय है। सवाल यह है कि आखिर जिम्मेदार विभागों की निगरानी में ऐसी कौन-सी खामियां रहीं, जिसके चलते इस महत्वपूर्ण सड़क परियोजना को 09 साल बाद भी अधूरा होने का दाग झेलना पड़ रहा है। घोटी-चोरिया-डाबरी मार्ग की वास्तविक समस्या पितकोना से चौरिया के बीच अधूरे पड़े निर्माण कार्य से जुड़ी है। प्रारंभ में जो निर्माण एजेंसी थी, उसके द्वारा कार्य में खूब लेटलतिफी की गई। अंतत: विभाग ने ठेका निरस्त कर दिया, लेकिन अनुबंध निरस्त होने के बाद भी अधूरे हिस्से का निर्माण कार्य अब तक पूरा नहीं हो सका है, जिसका खामियाजा आज तक स्थानीय ग्रामीणो को भुगतना पड़ रहा है।
घाट वाला हिस्सा कटकर खराब
इस मार्ग का लगभग 10 किलोमीटर का हिस्सा दुर्गम घाट क्षेत्र वाला है। इस दूरी से सफर बडी चुनौती वाला है। बारिश के दौरान घाट वाला हिस्सा कई जगह से कटकर खराब हो गया है। जिससे अब आवागमन जोखीम भरा होने के साथ दोहरी चुनौती वाला बन चुका है। सरकारी कर्मचारियों की पहुंच ही दुर्गम गांवों तक बाधित हो रही है, तो शिक्षा, प्रशासनिक सेवाओं और वन एवं राजस्व संबंधी कार्यों की नियमितता पर पड़ने वाले प्रभाव का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों और अन्य जरूरतमंदों के आवागमन की समस्या भी ग्रामीणों की चिंता बढ़ाती है।
ठोस कार्ययोजना आवश्यक है
जानकारी के अनुसार उक्त सड़क अब लोक निर्माण विभाग को हस्तांतरित हो चुकी है। ऐसे में विभागीय जिम्मेदारी, शेष निर्माण कार्य की स्थिति, पुल-पुलियों की आवश्यकता और मरम्मत की समयसीमा स्पष्ट करना जरूरी है। केवल विभागीय हस्तांतरण से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि अधूरे निर्माण को पूरा करने के लिए ठोस कार्ययोजना और समयबद्ध क्रियान्वयन आवश्यक है। फिलहाल बारिश के बाद अब कार्य की गति दिलाने की उम्मीद जगाई जा रही है। लेकिन इसके लिये विभागीय अमले को भी इस ओर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा। क्योकि प्रश्न सिर्फ सड़क निर्माण का नही, बल्कि क्षेत्र की जनता को सड़क बनने के बाद मिलने वाली सुविधाओं व मुख्यधारा से जोड़ने से जुडा है।