प्रवासी पक्षी \ बाल कहानी - rashtrmat.com

प्रवासी पक्षी \ बाल कहानी

डॉ सीमा श्रीवास्तव कि प्रवासी पंक्षी  कहानी  हमें सिखाते हैं कि जीवन का सौंदर्य ठहरने में नहीं, सही समय पर उड़ान भरने और सही समय पर लौट आने में है। वे बताते हैं कि सीमाएँ नक्शों पर होती हैं, आकाश पर नहीं।”

प्रवासी पक्षी \ बाल कहानी 

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के पास एक गांव में रोली रहती है वह अपने घर में सबसे छोटी है। उसकी उम्र आठ साल की है। वह कक्षा तीसरी में पढ़ती है। वह रोज शाम को अपने दादाजी और दीदी के साथ शाम को बगीचे में जाती है और वहां के रंग – बिरंगे फूलों को देखकर बहुत खुश होती है। वहां बहुत से बड़े बड़े छायादार पेड़ भी लगे हैं। जिनकी छाया में बैठकर लोग बाते करते हैं। वहीं और भी बच्चे भी खेलते रहते है। उन पेड़ों पर कई पक्षी भी घोंसले बनाए हुए हैं। सुंदर- सुंदर घोंसलो और तरह-तरह के रंग – बिरंगे पंक्षियो को देखकर रोली और गुल्लू बहुत खुश होतें हैं। कभी -कभी तो बच्चे मिलकर ताली बजा बजाकर पक्षियों को उड़ाते और फिर खुद उनके पीछे दौड़ लगाते। अलग अलग तरह के पंक्षियो के बारे में मिनी ने दादा जी से पूछा तो दादा जी ने बताया- इनमें से अधिकांश प्रवासी पक्षी हैं। मिनी ने पूछा -ये प्रवासी पक्षी कौन हैं? दादा जी इनके बारे में और कुछ बताइए । तब उनके पास कुछ  और बच्चे भी आकर बैठ गये

दादा जी ने कहा – ये पक्षी दूर देश से आते हैं। इसलिए इन्हें प्रवासी पक्षी कहते हैं। जब इनके देश में रहने के स्थानों का तापमान बहुत कम हो जाता है। यह तापमान 0 डिग्री से माइनस 50 डिग्री तक नीचे चला जाता है और इनके जीवन के लिए ठंड मुसीबत बन जाती है , तब ये प्रवासी पक्षी लगभग  चार पांच हजार किलोमीटर से भी अधिक और कई पक्षी तो  बीस तीस हजार से भी अधिक दूरी से आते हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान ये लम्बी- लम्बी उड़ान भरते हैं। अपनी यात्रा में बीच में कई स्थानों पर ये रूकते भी हैं। और कई दिनों की याञा करतें हैं। हमारे देश के कई स्थानों में ये पक्षी रहते हैं । विशेष रूप से उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में नवम्बर से मार्च तक लगभग रहते हैं । फिर  वापस अपने-अपने देश लौट जाते हैं।

यहां की जलवायु इन्हें बहुत अच्छी लगती है। इसलिए  समुद्र को पार करके बहुत दूर से आते हैं ।और भारत में अनुकूल स्थानों पर ठहरते हैं। ये अधिकतर ठंडे जलीय स्थानों पर बसेरा करते हैं। इन पंक्षियो के कुछ नाम हैं-साइबेरियन क्रेन , ब्लैक टेल्ड गाॅडविट, ग्रेटर फ्लेमिंगो डेमोइसेल क्रेन, यूरेशियन गौरेया, रफ बर्ड आदि। फिर दादा जी बोले बच्चों इन पंक्षियो का इस तरह से आना रहना आश्चर्य जनक है।

प्रतिवर्ष इतनी दूरी से आना वाकई बहुत कठिन है। पर अपने जीवन और  प्रजनन के लिए इनको आना ही पड़ता है। और यह सिलसिला सालों से चला आ रहा है। ये पक्षी तरह तरह के सुंदर घोंसले बनाते हैं।अपन बच्चों और अपने बच्चों के लिए। इन पक्षियों की अलग -अलग कई तरह की प्रजातियां होती हैं। इन प्रवासी पंक्षियों से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन भी एक सफर है। जीने के लिए हमें यदि दूर कहीं जाना पड़े तो भी यात्रा करने से घबराना नहीं चाहिए। हर सफर से आदमी कुछ न कुछ सीखता है। बच्चों को प्रवासी पंक्षियो की जानकारी बहुत  मन भा रही थी । सभी बच्चे पूरे ध्यान से सुन रहे थे।

तभी ढ़लते सूरज को देखकर दादा जी ने कहा बच्चों अब घर जाने का समय हो गया ।सभी बच्चे उठ खड़े हुए और सभी ने एक स्वर में कहा दादा जी यह सब जानना बहुत अच्छा लगा। कल भी आप कोई कहानी जरूर सुनाना । दादा जी ने हंसकर कहा हां बच्चों । सभी बच्चे खुश मन से  अपने-अपने घर की ओर चल दिये। रोली और गुल्लू भी अपने दादा जी के साथ घर की ओर चल पड़े।

डा सीमा श्रीवास्तव,रायपुर छत्तीसगढ़

MO-96441 03870