उम्मीद से ज़्यादा \ कहानी - rashtrmat.com

उम्मीद से ज़्यादा \ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’ की उम्मीद से ज्यादा कहानी प्रेम से अधिक आत्मसम्मान की है। ब्रेस्ट कैंसर से लड़ रही युवती की बीमारी से अधिक उसके साहस की कहानी है।यह विवाह से अधिक बराबरी की है।क्योंकि कभी-कभी जीवन हमें दर्द,उम्मीद से ज़्यादा देता है। उम्मीद से ज़्यादा” एक ऐसी स्त्री की कहानी है, जिसने प्रेम पाया,खोया  फिर खुद को पाया।

                 उम्मीद से ज़्यादा\कहानी

 मनोरमा को लोग सुंदर कहते थे।

लेकिन वह जानती थी,सुंदरता प्रशंसा से ज़्यादा अपेक्षाएँ लेकर आती है।

कॉलेज के गलियारे में चलते हुए अक्सर छात्र फुसफुसाते,“मैम कितनी ग्रेसफुल हैं..।”

वह मुस्कुरा देती।पर भीतर एक खालीपन था।

सहेलियाँ चिढ़ातीं,“तू तो प्रोफेसर बन गई, अब कोई प्रोफेसर पति भी ढूँढ ले।”

वह मज़ाक में कहती,“सिलेबस में प्रेम नहीं पढ़ाया जाता,इसलिए अब तक पास नहीं हुई।”

लेकिन रात को मोबाइल हाथ में लेकर वह अक्सर किसी ‘सही व्यक्ति’ की तलाश में स्क्रॉल करती रहती।उसे प्रेम चाहिए था,पर दया नहीं।आकर्षण चाहिए था,पर उपभोग नहीं।

उनतीस वर्ष की मनोरमा ने जब फेसबुक पर अपनी नई तस्वीर डाली, तो उसे अंदाज़ा नहीं था कि लाइक्स से ज़्यादा उसे टिप्पणियाँ चुभेंगी।

“अरे मैडम! इतनी बड़ी प्रोफेसर हो गई,अभी तक बॉयफ्रेंड नहीं?”

“कहीं तुम सीक्रेट रोमांस तो नहीं कर रहीं?”

वह हँसकर जवाब देती,“सुंदर होना आसान है,सही आदमी मिलना मुश्किल।”

कॉलेज में वह आत्मविश्वासी थी। हिंदी विभाग की युवा प्रोफेसर। छात्र उसकी क्लास मिस नहीं करते थे। लेकिन शाम को घर लौटते समय उसका आत्मविश्वास अक्सर चुप हो जाता था।

कुछ दिनों बाद एक अनजान प्रोफ़ाइल से प्रियंक नाम के एक लड़के का मैसेज आया।खुद को बिल्डर बताया।

बातें शुरू हुईं।फोन नंबर साझा हुआ।रातें लंबी होने लगीं। धीरे-धीरे “गुड मॉर्निंग” से “मिस यू” तक की दूरी तय हो गई।दोस्ती से रिश्ता बना। और रिश्ता धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया। प्रियंक का प्रवेश उसके जीवन में किसी हल्की धूप की तरह हुआ था।वह बातें करता तो लगता, कोई समझ रहा है।

मनोरमा को लगा,देर से सही,लेकिन उसे अपना साथी मिल गया। फोन पर देर रात तक भविष्य की योजनाएँ बनतीं।

“हम गोवा चलेंगे,तुम्हारे कॉलेज के पास घर लेंगे…।”

मनोरमा ने विश्वास करना शुरू कर दिया था।  शादी के सपने देखने लगी थी। लेकिन वक़्त को कुछ और ही मंजूर था। सिर्फ एक घटना से उसका भरोसा प्रशांत से टूट गया।

दरअसल कई दिनों से मनोरमा की तबीयत खराब चल रही थी। डॉक्टर मिताली से मिली। उन्हें सारी बात बताई। डॉक्टर मिताली को कुछ आशंका हुई। उन्होंने कुछ चेक कराने को कहा। शाम को मनोरमा रिपोर्ट लेकर डॉक्टर मिताली से मिली।

डॉक्टर मिताली रिपोर्ट देखकर कहा,‘‘ मनोरमा मुझे बताते हुए हैरानी हो रही है। इतनी कम उम्र में तुम्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया है। अभी गांठ बड़ी नहीं है। लेकिन आगे चलकर तुम्हें दिक्कत हो सकती है। मन से अपने आप को तैयार कर लो। इलाज के लिए।

रिपोर्ट की पंक्ति, “Malignant”  उसके भीतर किसी हथौड़े की तरह गिरी।

मनोरमा खुद भी हैरान हुई। अभी ठीक से ज़िन्दगी में खुशियाँ आई भी नहीं थी कि ब्रेस्ट कैंसर एक -एक करके सारे दरवाजे बंद करने आ गया है।रिपोर्ट हाथ में थी।

उसने पहले खुद को संभाला। फिर प्रियंक को बताया,तो पहले सन्नाटा था। कुछ पल की चुप्पी के बाद प्रियंक की आवाज बदली हुई थी।

“मैं ब्रेस्ट कैंसर वाली लड़की से शादी कैसे कर सकता हूँ?मुझे पूरा जीवन चाहिए..अधूरा नहीं। रिस्क नहीं ले सकता। सॉरी, मनोरमा। अच्छा होगा हम यहीं रुक जाएँ।”

प्रियंक का “सॉरी” उसके जीवन का सबसे निर्दयी शब्द था।

फोन कटने के बाद मनोरमा लंबे समय तक मोबाइल को कान से लगाए बैठी रही। जैसे उम्मीद कर रही हो, वह कहेगा, “मैं मज़ाक कर रहा था।”

वह समझ गई,उसे प्रेम नहीं, सुविधा मिली थी। उसने पहली बार महसूस किया,पुरुष कभी-कभी प्रेम नहीं,शरीर से भविष्य तय करते हैं।उस रात उसने पहली बार खुद को बिस्तर से उठने नहीं दिया।सुबह कॉलेज नहीं गई।तीन दिन तक फोन स्विच ऑफ रहा।आईने के सामने खड़ी होकर उसने खुद से पूछा,“क्या बीमारी ने मुझे अयोग्य बना दिया?”

धीरे-धीरे वह अवसाद में उतरने लगी।नींद गायब,भूख कम,चुप्पी ज़्यादा उसे लगता, “मैं बोझ हूँ। मुझसे प्रेम करना जोखिम है।”

एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा,“मुझे कैंसर से कम,अस्वीकृति से ज़्यादा दर्द हुआ है।”

उस रात आईने के सामने खड़ी मनोरमा ने खुद को देखा। उसने तय किया कि मैं डर- डर कर नहीं जीना चाहूँगी। ब्रेस्ट कैंसर है तो क्या हुआ? इसका इलाज है। प्रियंक सिर्फ इतनी बात पर मुझसे ब्रेकअप ले लिया कि मुझे ब्रेस्ट कैंसर है। लेकिन मैं अपनी जिन्दगी को अपने से ब्रेकअप नहीं लेने दूंगी।”

कुछ दिनों बाद कीमोथेरेपी शुरू हुई। कीमोथेरेपी सिर्फ शरीर का इलाज नहीं करती,वह आत्मसम्मान की भी परीक्षा लेती है।बालों का झड़ना सिर्फ एक शारीरिक परिवर्तन नहीं था,वह स्त्रीत्व की सामाजिक परिभाषा से बहिष्कार था।

एक सुबह कंघी में उलझे बालों का पहला गुच्छा हाथ में आया।उसने बालों को देखा।

धीरे से कहा,“अगर मेरे बाल नहीं हैं,तो क्या अब मैं कम औरत हो गई हूँ?”

नहीं। बाल कल फिर आ जाएंगे। मैं फिर पहले जैसे दिखने लगूंगी। ब्रेकअप हो गया तो क्या हुआ? मैं पहले से भी अधिक खूबसूरत तरीके से अपनी ज़िन्दगी से लड़कर उसे अपना बना लूंगी।

कॉलोनी की औरतें सहानुभूति से देखतीं।कुछ फुसफुसातीं,“अभी शादी नहीं हुई थी ना… भगवान की मर्ज़ी।”

उसे लगा,बीमारी से ज़्यादा समाज मारता है।

कीमो के दिनों में वह छुट्टी पर थी। सिर पर दुपट्टा,चेहरे पर थकान। हर दिन अपने आप को आईने में कुछ ज्यादा ही देखती थी। देखकर अंदर से रो पड़ती थी,मगर अगले ही पल मुस्करा के कहती,“ब्रेस्ट कैंसर होने से औरत खत्म नहीं हो जाती। मैं प्रोफेसर हूँ।अपने सभी विद्यार्थियों से कहती हूँ,किसी भी विषम परिस्थितियों में कदम कभी पीछे नहीं करना चाहिए। विपरीत परिस्थिति से लड़ने की हिम्मत अपने अंदर लाना चाहिए। बुरा वक्त हमेशा नहीं रहता। मेरा बुरा वक्त भी ज्यादा दिन मेरे साथ नहीं रहेगा। बुरा वक्त भी प्रियंक की तरह मुझे छोड़कर चला जाएगा।

उसने एक दिन फेसबुक पर अपनी तस्वीर डाली,बिना बालों की।

नीचे लिखा-“मुझे ब्रेस्ट कैंसर है। कीमोथेरेपी के चलते मेरे बाल झड़ गए हैं। क्या मैं अभी भी सुंदर दिखती हूँ..? क्या कोई मेरे साथ डेट करना चाहेगा?”

दो दिन।

तीन दिन।

कमेंट आए,

“Stay strong.”

“भगवान सब ठीक करेंगे।”

लेकिन डेट के लिए कोई नहीं आया।उस रात उसने मोबाइल बार-बार चेक किया। फिर

धीरे से स्क्रीन ऑफ कर दी।

वह सिर्फ सवाल नहीं था।वह समाज की परीक्षा थी।लोगों ने सांत्वना दी।लेकिन किसी ने इच्छा व्यक्त नहीं की।उसने सीखा,लोग दुख से सहानुभूति रखते हैं,पर संघर्ष से रिश्ता नहीं बनाते।उस रात उसने पहली बार तय किया,“अब मैं किसी की चाहत की मोहताज नहीं रहूँगी।”

कीमोथेरेपी के दौरान मनोरमा की मुलाकात एक और मरीज से हुई, साठ वर्ष की सरोज आंटी।सरोज आंटी के भी बाल नहीं थे।लेकिन आँखों में अजीब चमक थी।

एक दिन आंटी ने मुस्कुराकर पूछा,“ बेटी, तुम्हें सबसे ज़्यादा किस बात का डर है?”

“लोगों का?”

आँसू बह निकले।

“मेरा मंगेतर मुझे छोड़ गया,” मनोरमा ने धीमे से कहा।

सरोज आंटी ने उसका हाथ पकड़ लिया,““जिस आदमी को तुम्हारी देह से प्यार था, वह बीमारी में भाग गया।जिसे तुम्हारी आत्मा से प्यार होगा,वह बीमारी में तुम्हारे पास आएगा।”

वह वाक्य उसके भीतर गूंजता रहा।अगले सत्र में सरोज आंटी नहीं आईं।

नर्स ने बताया,“उनका संक्रमण बढ़ गया था।”

मनोरमा पहली बार किसी अजनबी के लिए रोई।उसे लगा,बीमारी हमें जल्दी परिपक्व बना देती है।उस दिन उसने तय किया,“मैं बच गई हूँ.. तो डरकर नहीं जिऊँगी।”

ऑपरेशन,कीमोथेरेपी,और रेडियेशन के बाद एक दिन वह अपने पिता के घर आ गयी। कॉलोनी में सामने वाले मकान में दो लड़के किराए पर रहते थे। एक आईएएस की तैयारी में डूबा रहता।दूसरा सुशांत विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनने का सपना देख रहा था।

मनोरमा के पिता प्रशांत से सुशांत सुन रखा था कि उनकी बेटी कॉलेज में हिन्दी की प्रोफसर है। सुशांत ने कहा था,“आप की जब बेटी आए अंकल जी मुझे बताना। मैं उनसे मिलना चाहूँगा। हो सकता उनसे मुझे कोई टिप्स मिल जाए तैयारी की।”

एक दिन सुशांत को सब्जी मंडी में प्रशांत मिल गए। प्रशांत को देखते ही सुशांत ने कहा,‘‘ अंकल जी आप कैसे हैं? आप की बेटी कब आने वाली हैं..?”

प्रशांत दबी आवाज में कहे,“मनोरमा आई हुई। इन दिनों उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती। बहुत कम बातें करती है। कुछ बताती नहीं है। मैं भी उससे ज्यादा सवाल नहीं करता। फिर भी तुम उससे मिल लो।”

इलाज के बाद जब वह पिता के घर लौटी,तो उसने पहली बार अपने पिता को बूढ़ा देखा। एक रात वह पानी लेने उठी।पिता ड्राइंग रूम में बैठे थे।उनके हाथ में उसकी बचपन की तस्वीर थी,दो चोटी वाली छोटी मनोरमा।पिता की आँखें भीगी थीं।उन्होंने उसे देख लिया।

“तू सोई नहीं?”

“आप भी अभी तक सोए नहीं।”

कुछ क्षण चुप्पी रही।

फिर पिता बोले,““बेटी, बीमारी से मत डर।तेरी माँ भी मजबूत थी।और तू तो उससे भी ज़्यादा जिद्दी है।”

मनोरमा पहली बार पिता के कंधे पर सिर रखकर रोई।

“पापा.अगर मैं कभी शादी न कर सकी तो?”

पिता ने उसके सिर पर हाथ फेरा,““शादी ज़िंदगी का प्रमाणपत्र नहीं होती।तू जिंदा है, यही काफी है।”

उस रात उसने महसूस किया,पुरुष सभी स्वार्थी नहीं होते।कुछ पिता भी होते हैं।

एक दिन सुशांत मनोरमा से मिलने उसके घर आया। उस समय प्रशांत बाहर घूमने जा रहे थे। उन्होंने मनोरमा को आवाज दी। मनोरमा अपने कमरे से निकल कर ड्राइंग रूम आयी।

प्रशांत ने कहा,“ये सुशांत है। जबसे इसे बताया कि मेरी बेटी प्रोफेसर है,उस दिन से ये तुमसे मिलने के लिए बेचैन है। मैं घूमकर आता हूँ। तब तक तुम दोनों बातें करो।”

जब सुशांत पहली बार मनोरमा से मिला था,उसने उसकी आँखों में थकान देखी थी।

उसकी सुंदरता से पहले उसका साहस आकर्षित करता था।

जब उसने बीमारी के बारे में बताया,सुशांत घर जाकर देर तक सोचता रहा।

“क्या मैं उसके जीवन में सहारा बन सकता हूँ? या मैं भी कहीं दया में तो नहीं बह रहा हूँ?”

वह खुद से डरता था,उसे लग रहा था कि कहीं उसका आकर्षण सिर्फ संवेदनशीलता का भ्रम तो नहीं। लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया,वह उसके साथ सहज है।सुशांत का प्रवेश नाटकीय नहीं था।वह धीरे-धीरे उसकी जिंदगी में आया। पहली मुलाकात साधारण थी। दूसरी बातचीत थोड़ी लंबी। तीसरी में हँसी शामिल हो गई।फिर किताबों पर चर्चा। इंटरव्यू की तैयारी।फिर जीवन पर बातचीत।

एक दिन सुशांत ने पूछा,”“आप इतनी मजबूत कैसे हैं?”

वह हँसी,“जब टूटने का विकल्प नहीं होता,तो इंसान मजबूत दिखने लगता है।”

मनोरमा अब धीरे धीरे महसूस करने लगी थी कि सुशांत उसकी हँसी का इंतज़ार करता है।वह उसकी सलाहों को महत्व देता है।सुशांत उसकी बीमारी से नहीं डरा।वह उसे ‘सर्वाइवर’ कहता था।

धीरे-धीरे मनोरमा को डर लगने लगा,“ यदि इसे सब कुछ सच-सच बता दी तो कहीं ये भी प्रशांत की तरह मुझे  तन्हा छोड़कर चला गया तो..?”

खुद से बोली,“ब्रेस्ट कैंसर से कभी नहीं डरी तो सुशांत के चले जाने से क्या डरना.. । उसके मन में चाह होगी तो  लौट कर आ सकता है। लेकिन अपना सच उसे बता दूंगी तो अंदर से और मजबूत हो जाऊॅंगी। अब मैं डर को अपनी ज़िन्दगी में जगह नहीं देने का फैसला कर लिया है।

एक दिन मनोरमा ने खुद ही कह दिया,“मुझे ब्रेस्ट कैंसर हुआ था। मेरा बॉयफ्रेंड मुझे छोड़ गया।”

सुशांत चुप रहा। फिर बोला,“आपने उसे नहीं खोया। उसने आपको खोया है।”

उस दिन पहली बार मनोरमा को लगा,कोई उसे बीमारी से अलग देख रहा है। मनोरमा को सुशांत की दोस्ती धीरे- धीरे अच्छी लगने लगी। वैसे सुशांत उससे दो साल छोटा था।लेकिन परिपक्वता उम्र से बड़ी थी।

मनोरमा उसे इंटरव्यू की तैयारी कराती। मॉक इंटरव्यू लेती। किताबें सुझाती।एक दिन रिज़ल्ट आया।सुशांत प्रोफेसर बन गया।

उसने खुशी में कहा,““आपने मुझे पढ़ाया नहीं,संभाला है।”

लेकिन मनोरमा के भीतर डर जागा,“कहीं यह भी मुझे सीढ़ी बनाकर आगे तो नहीं बढ़ गया?”

जब कोई दो बार ठुकराया जाता है,तो तीसरी बार प्रेम नहीं,डर पैदा होता है।सुशांत की सफलता पर उसे गर्व था।पर भीतर आवाज उठती,“अब इसे मेरी जरूरत नहीं होगी।”

यह स्त्री की वह असुरक्षा थी जो समाज ने उसके भीतर बो दी थी।

सुशांत का चयन प्रोफेसर पद के लिए हुआ मगर दूसरे शहर के लिए। सुशांत जाते वक्त   मनोरमा से मिलकर गया। पहले रोज़ कॉल।फिर हफ्ते में दो बार।फिर कभी-कभार। मनोरमा को उसके फोन की आदत हो गयी थी। सुशांत के एक फोन से  मनोरमा अंदर से फूल की तरह खिल जाती थी। यह सिलसिला कुछ महीने तक चला, फिर धीरे- धीरे फोन पर बातें करने की सिलसिला कम होता गया। मनोरमा फिर डरने लगी।पर इस बार उसने खुद को रोका।

“अगर उसे लौटना होगा,तो वह लौटेगा।अगर नहीं,तो मैं फिर भी पूर्ण हूँ।”

यह आत्मनिर्भरता उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

जबकि सुशांत के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसने तय कि अगर मैं लौटूँ, तो बराबरी से लौटूँ।सफल होकर।ताकि उसे कभी न लगे कि मैंने उसे सीढ़ी बनाया।

उस एक साल में उसने खुद को बनाया।जिम जॉइन किया।आत्मविश्वास बढ़ाया।

लेकिन हर उपलब्धि के बाद उसे वही चेहरा याद आता,दुपट्टा बाँधे, मुस्कुराती हुई मनोरमा।तब उसे समझ आया,वह प्रेम है।

धीरे-धीरे मनोरमा के बाल लौट आए। उसके बाल घुंघराले आए थे। जो भी देखता पूछे बगैर नहीं रहता। कहाँ से सेट कराया है। बड़ी सुन्दर दिख रही हो इस स्टाइल में।मनोरमा मुस्करा के रह जाती थी। स्वास्थ्य सुधरने लगा।वह कॉलेज वापस जॉइन कर चुकी थी।

इसी बीच सुशांत का फोन आना भी बंद हो गया था। उसकी ज़िन्दगी में और कमरे में भी अजीब खालीपन था। वह कॉलेज से आती तो उसे लगता कोई घर में होना चाहिए,जिससे वो दिन भर की बातें शेयर कर सके। उससे बातें कर सके। उसके साथ कॉफी पी सके। उसके साथ दो बातें कर सके। उसकी फीलिंग को वो समझे। एक दिन उसने तय किया कि इतनी बड़ी दुनिया है,क्यों ना अपने लिए कोई हमसफर खुद ढूंढा जाए। एक रात उसने मैरिज ऐप डाउनलोड किया।

मैरिज ऐप उसके लिए प्रेम नहीं,सुरक्षा की तलाश थी।

प्रोफाइल भरते हुए उसे  गा,“क्या मैं खुद को बेच रही हूँ?”

प्रोफाइल भरी।

नाम।

उम्र।

पेशा।

फिर आया कॉलम— Health History.

उसने टाइप किया:Breast Cancer Survivor

जब उसने “Breast Cancer Survivor” लिखा,तो उंगलियाँ काँप गईं। कुछ सेकंड देखा।

उसने खुद से पूछा,“क्या मुझे अपनी लड़ाई का प्रमाण देना होगा?”

यह उसका निर्णायक क्षण था।उसने चुना, अकेलापन,पर आत्मसम्मान के साथ।

मोबाइल बंद करते हुए उसने सोचा,““मैं दया पर नहीं,सम्मान पर जीना चाहती हूँ।”

उसने ऐप अनइंस्टॉल कर दिया।

सुशांत को गए एक साल हो गए थे। इस बीच मनोरमा से उसकी कभी बातचीत नहीं हुई। मनोरमा भी भूल चुकी घी। संडे का दिन था। मनोरमा कॉफी हाउस में अकेली किसी सोच में डूबी हुई थी। तभी एक सुन्दर स्मार्ट युवक उसके सामने आकर कहता है-

“माफ़ कीजिए..क्या आप मुझे पहचानती हैं?”

मनोरमा ने सामने खड़े युवक को देखा।स्मार्ट। आत्मविश्वासी। डिंपल वाला।

वह उसे पहचान चुकी थी।पर उसने अनजान बनने का अभिनय किया। वह जानती थी,शरीर ठीक हो गया है,लेकिन अस्वीकृति का घाव अभी भी ताज़ा है।इसलिए कॉफी हाउस में उसने उसे तुरंत पहचानकर भी स्वीकार नहीं किया।वह देखना चाहती ,“क्या वह मेरे अतीत सहित मुझे चुनता है?”

क्योंकि वह दया नहीं चाहती थी।वह प्रस्ताव चाहती थी।

“शायद नहीं।”

वह मुस्कुराया।

“गौर से देखिए।”

वह जान चुकी थी।लेकिन चाहती थी,वह खुद बोले।

“इतनी सुंदर महिला अपने प्यार को कैसे भूल सकती है?” उसने कहा।

“मैं कल भी अकेली थी,आज भी अकेली हूँ।” मनोरमा ने शांत स्वर में उत्तर दिया।

“मैं नहीं चाहता कि मुझसे मिलने के बाद आप दोबारा ऐसा कहें।”

कुछ पल चुप्पी।

जब सुशांत ने कहा,“मैं तुम्हें बीमारी में नहीं,बहादुरी में चाहता हूँ।”

तब उसकी आँखों में पानी आ गया।वह पहली बार समझी,कोई उसे उसके अतीत से नहीं,उसके साहस से देख रहा है।उसके भीतर की सारी गांठें ढीली पड़ गईं।वह जानती थी,यह दया नहीं है।यह चुनाव है।

मैं तुम्हारा बॉयफ्रेंड ही नहीं,लाइफ पार्टनर बनना चाहता हूँ।

क्या मेरा प्रस्ताव स्वीकार है?”

मनोरमा हँस दी।

“मैं तुम्हें पहले ही पहचान चुकी थी।जब तुम मुस्कुराते हो तो गाल पर डिंपल पड़ता है।

और अभी दस मिनट में तुम दस बार अपने बालों पर हाथ फेर चुके हो।”

उसकी आँखें नम थीं।

“मुझे तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार है।शायद तुम मुझे उम्मीद से ज़्यादा खुशियाँ दे सकते हो।”

लेकिन यह स्वीकार सिर्फ विवाह का नहीं था।यह स्वयं को स्वीकार करने का क्षण था।

अब उसे डर नहीं था।क्योंकि उसने सीखा था,सुंदरता अस्थायी है,देह नश्वर है,पर आत्मसम्मान शाश्वत है।

कॉफी ठंडी हो चुकी थी।लेकिन जीवन फिर से गर्म हो उठा था।मनोरमा ने उस दिन जाना,सुंदरता बालों में नहीं होती।प्रेम शरीर में नहीं होता।और सच्चा साथी दया से नहीं, सम्मान से मिलता है।

उस दिन के बाद मनोरमा ने डायरी में लिखा,“मैं अब किसी की अधूरी नहीं हूँ।मैं पूरी हूँ।और जो मुझे चुनेगा, वह मेरी मजबूती चुनेगा।”

उसे समझ आ गया था,बीमारी शरीर को कमजोर करती है,अस्वीकृति आत्मा को

लेकिन आत्म-स्वीकृति दोनों को जीत लेती है।

शादी सादगी से हुई।मनोरमा ने विग नहीं पहना।उसके छोटे-छोटे नए उगे बाल खुले थे।

कई लोगों ने कहा,“अरे, दुल्हन तो अलग लग रही है…।”

कुछ ने कानों में फुसफुसाया,“सुना है..बीमारी हुई थी इसे..।

सुशांत ने उसका हाथ कसकर पकड़ा।उसने धीरे से कहा,““तुम जैसी हो, वैसी ही सबसे सुंदर हो।”

लेकिन समाज की आवाजें धीरे नहीं बोलतीं।वे हवा में फैल जाती हैं।कुछ दिनो तक ससुराल में सब सामान्य था।सास ने मुस्कुराकर कहा,“बेटी, अब सब ठीक है ना?”

यह प्रश्न चिंता से ज़्यादा जाँच जैसा लगा।कभी-कभी रिश्तेदार आते और पूछते.“अब तो पूरी तरह ठीक हो गई ना?”

“डॉक्टर ने कहा है ना कि आगे कोई दिक्कत नहीं होगी?”

एक दिन किसी ने सीधे पूछ लिया,“माँ बनने में तो दिक्कत नहीं होगी?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।मनोरमा मुस्कुराई।पर भीतर कोई पुराना घाव फिर हरा हो गया। शादी के छह महीने बाद से ही बातें शुरू हो गईं,“अब खुशखबरी कब दे रही हो?”

“उम्र भी हो रही है।”

मनोरमा को डॉक्टर की वह सलाह याद आई,“कुछ साल सावधानी रखनी होगी।”

उसने एक शाम सुशांत से पूछा,“अगर मैं माँ न बन सकी तो?”

सुशांत ने बिना सोचे कहा,“तो हम दो ही काफी हैं। ज़रूरी समझे तो किसी बच्चे को गोद लें लेंगे। पर मैं तुम्हें किसी जैविक परीक्षा में नहीं तोलूँगा।”

सुशांत के शब्दों से उसे सुकून मिला कि इसके मन में अन्य महिलाओं की तरह सवाल नहीं है। पर समाज की अपेक्षाएँ अभी खत्म नहीं हुई थीं।शादी हुए सात आठ महीने हो गए थे। मनोरमा के कॉलेज की महिला सहकर्मियों के बीच उसकी गैर मौजूदगी में तरह- तरह की बातें होने लगी।शादी कर ली है। मगर आगे चलकर यह माँ नहीं बनी तो,पता नहीं इसकी सास और इसके पति इसे कब तक बर्दाश्त करेंगे। पुराने जमाने की सास कैसी होती हैं,सभी जानते हैं। छह महीने बाद ही मोहल्ले की महिलाएं पूछने लगती हैं,कब खुशखबरी दे रही हो।

एक दिन मनोरमा से एक सहकर्मी ने धीरे से कहा,““मैम, आप तो सर्वाइवर हैं..लेकिन इतना तनाव मत लिया कीजिए।”

उसे लगा,अब उसकी पहचान ‘प्रोफेसर’ से पहले ‘कैंसर सर्वाइवर’ हो गई है।

एक सेमिनार में उसे बुलाया गया “कैंसर पर प्रेरक वक्तव्य” देने के लिए। वह अवाक रह गयी है,जब उसे ^कैंसर पर प्रेरक’ वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया।वह दुविधा में थी।क्या वह अपनी बीमारी को मंच बना दे?या उसे निजी रखे?

आख़िर उसने मंच पर जाकर कहा.““मैं प्रेरणा नहीं हूँ।मैं सिर्फ एक स्त्री हूँ जिसने जीने का निर्णय लिया।”

तालियाँ बजीं।लेकिन इस बार तालियाँ उसे चोट नहीं पहुँचा रही थीं।

एक दिन सुशांत के एक सहकर्मी ने मज़ाक में कहा,““यार, तुमने तो बड़ा रिस्क लिया…।”

सुशांत मुस्कुराया,“रिस्क नहीं,चुनाव किया है।”

सहकर्मी की बात उसके मन के किसी कोने में दबी थी। घर आया पर बेचैन था। बावजूद इसके वह चुप था। उसके चेहरे को देखकर मनोरमा ने कहा,“क्या कोई बात हो गयी है? या फिर किसी ने कुछ कह दिया है। बड़ी देर से देख रही हूँ कि चुप हो।”

सुशांत ने कहा,“तुमसे एक बात कहनी है। आज मेरे एक सहकर्मी की बातें मुझे अब परेशान कर रही है। उस वक्त तो मैंने जवाब दे दिया था। पर पता नहीं उसकी बात क्यों मुझे परेशान कर रही है। डर लगता है।”

मनोरमा ने हैरान होकर पूछा,“डर लगता है,,!”

हाँ,“कभी-कभी डर लगता है…अगर बीमारी लौट आई तो?”

यह पहली बार था जब उसने उसका डर देखा।प्रेम सिर्फ सहारा नहीं, भय भी साझा करता है।

मनोरमा ने उसका हाथ थामा,“अगर लौटेगी भी,तो इस बार मैं अकेली नहीं हूँ।”

उस रात सुशांत ने सिर्फ इतना ही कहा,“हाँ इस बार तुम अकेली नहीं हो।

कुछ दिनों बाद सुशांत और मनोरमा एक पारिवारिक समारोह में साथ गए हुए थे। वहां एक किसी बुजुर्ग महिला ने कहा,“आजकल लड़के भी न जाने क्या सोचकर शादी कर लेते हैं। ”

मनोरमा ने पहली बार सीधे जवाब दिया,“सोचकर ही की हैआंटी।हमारी शादी को लेकर किसी को चिंता नहीं करनी चाहिए। हमें ज़िन्दगी जीना आता है।”

कमरे में सन्नाटा था।वह अब चुप रहने वाली स्त्री नहीं थी।विवाह की पहली वर्षगाँठ पर सुशांत ने उसे वही कॉफी हाउस ले गया।

उसने कहा,““तुम जानती हो, मैं क्यों लौटा था?”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम्हारे साथ मैं कमजोर होने से नहीं डरता था।और यही प्रेम है।”

मनोरमा मुस्कुराई।उसे लगा,अब उसे समाज से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए।

उस रात को बालकनी में खड़ी थी।छोटे-छोटे बाल हवा में उड़ रहे थे।उसे अचानक सरोज आंटी याद आईं।पिता की भीगी आँखें याद आईं।प्रियंक की कायरता याद आई।

और उसने मन ही मन कहा,““मैं अब किसी की दया नहीं,किसी की बराबरी हूँ।”

सुशांत पीछे से आया।

“क्या सोच रही हो?”

“यही कि तुम मुझे उम्मीद से ज़्यादा मिले।”

सुशांत हँसा,“और तुम मुझे साहस से ज़्यादा मिली।”

दोनों की हँसी, रात में घुल गई।

पाँच साल समाज और रिश्तेदारों के अलावा दोस्तों के सवालों में गुजर गए। लेकिन मनोरमा के साथ पहाड़ की तरह सुशांत साथ खड़ा रहा। और एक दिन सुशांत एक प्यारी सी बेटी का पिता और मनोरमा माँ बनी। उस दिन बरसात की हल्की शाम थी।बालकनी में खड़ी मनोरमा अपनी पाँच साल की बेटी को देख रही थी, जो ड्राइंग रूम में रंग बिखेरकर बैठी थी।

“मम्मा, देखो! मैंने आपको बनाया है!”

मनोरमा ने मुस्कुराकर कागज़ लिया।

चित्र में एक स्त्री थी,छोटे बाल,बड़ी मुस्कान,और बगल में एक छोटी लड़की। ऊपर लिखा था,“मेरी सुपर मम्मा”।

उसकी आँखें भर आईं।

मातृत्व उसके जीवन में आसान नहीं आया था।शादी के दो साल बाद डॉक्टर ने कहा था,“गर्भधारण संभव है, लेकिन सावधानी रहेगी।”

हर महीने इंतज़ार।हर रिपोर्ट में धड़कन।हर जाँच में डर।एक रात उसने सुशांत से कहा था,“अगर मैं माँ न बन सकी तो?”

सुशांत ने वही जवाब दोहराया था,“तुम पहले से पूरी हो। बच्चा हमारे प्रेम की शर्त नहीं।”

लेकिन नियति ने इस बार उसे निराश नहीं किया।जब उसने पहली बार रिपोर्ट में “Positive” देखा, तो हाथ काँप रहे थे।वह हँसी भी,रोई भी।

डिलीवरी के समय ऑपरेशन थिएटर की सफ़ेद रोशनी में उसे पाँच साल पहले का वही अस्पताल याद आया,कीमोथेरेपी का कमरा,सरोज आंटी का चेहरा।

उसने मन ही मन कहा,““देखो आंटी, मैं हार नहीं मानी।”

उन्होंने बेटी का नाम रखा ,आशा।क्योंकि वह सिर्फ बच्ची नहीं थी,वह विश्वास थी।

जब आशा पहली बार स्कूल गई,तो किसी ने पूछा,““तुम्हारी मम्मा के बाल छोटे क्यों हैं?”

आशा ने मासूमियत से जवाब दिया,“क्योंकि मेरी मम्मा बहादुर हैं।”

मनोरमा ने सुना तो उसकी रीढ़ में एक अजीब सी शक्ति दौड़ गई।कभी जो शब्द उसे तोड़ देते थे,अब वही उसकी बेटी के लिए गर्व थे।

समाज पूरी तरह नहीं बदला था।अब भी कभी-कभी कोई पूछ लेता,““तुम्हें डर नहीं लगता… बीमारी दोबारा आ सकती है?”

वह शांत स्वर में कहती,““डर से ज़िंदगी लंबी नहीं होती।”

कॉलेज में अब वह सिर्फ प्रोफेसर नहीं थी,वह छात्रों के लिए एक उदाहरण थी।लेकिन उसने कभी अपनी बीमारी को प्रदर्शन नहीं बनाया।

वह कहती,“मेरी पहचान मेरी लड़ाई नहीं,मेरी शिक्षा है।”

पाँच साल बाद एक शाम सुशांत ने उसे फिर उसी कॉफी हाउस चलने को कहा।

वही कोना।

वही दो कप कॉफी।

“याद है?” उसने मुस्कुराकर पूछा।

“जब मैंने तुम्हें नहीं पहचाना था?” मनोरमा ने छेड़ा।

“और जब तुम पहचानकर भी अनजान बनी रहीं,” सुशांत हँसा।

कुछ पल बाद वह गंभीर हो गया।

“तुम जानती हो, मैं आज भी डरता हूँ।”

“किससे?”

“तुम्हें खोने से।”

मनोरमा ने उसकी आँखों में देखा।

“अब मैं खुद को नहीं खोती। इसलिए तुम भी मुझे नहीं खो सकते।”

यह वाक्य वर्षों की साधना से निकला था।

रात को घर लौटकर उसने आशा को सुलाया। छोटी उँगलियाँ उसकी उँगली पकड़कर सो गईं।आईने के सामने खड़ी उसने खुद को देखा।छोटे,सधे हुए बाल।आँखों में संतुलन।

चेहरे पर शांति।पाँच साल पहले वह आईने से पूछती थी,“क्या मैं सुंदर हूँ?”

आज उसने आईने से कहा,“मैं पूर्ण हूँ।”

बालकनी में हवा चल रही थी।आशा नींद में बुदबुदाई,“सुपर मम्मा..”

मनोरमा मुस्कुराई।

उसे लगा,बीमारी ने उससे बहुत कुछ लिया,पर एक चीज़ लौटा दी,स्वयं पर विश्वास।

और उसने मन ही मन कहा,““मैं सचमुच उम्मीद से ज़्यादा जी गई।”

रमेश कुमार ‘रिपु’

रायपुर,छत्तीसगढ़

MO-7974304532