ऋषि दधीचि की तपोभूमि वाला स्थान है कोटेश्वर धाम - rashtrmat.com

ऋषि दधीचि की तपोभूमि वाला स्थान है कोटेश्वर धाम

राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो) । जिले के लांजी क्षेत्र के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित है अध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत संगम वाला प्राचीन कोटेश्वर महादेव मंदिर। सैकड़ों वर्षों पुराना यह पवित्र धाम श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहाँ स्थापित शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में ऋषि.मुनि इन वनों में तपस्या करते थे। जहाँ उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव इस पावन स्थल पर प्रकट हुए और तभी से यह स्थान कोटेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गया।


ऋषि दधीचि की है तपोभूमि
भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर अपनी ऐतिहासिक महत्ता, आध्यात्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। बताया जाता है कि मध्यकालीन काल लगभग 12वीं शताब्दी में पत्थर की एक बड़ी चट्टान पर नक्कासी करके मंदिर का निर्माण हुआ था और इसे चालुक्य या परमार कालीन स्थापत्य शैली से जोड़कर देखा जाता है। पत्थर से निर्मित संरचना, नक्काशीदार स्तंभ और गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग मंदिर की प्राचीनता को दर्शाते हैं। कहा जाता है कि घने जंगलों में साधना करने वाले ऋषि.मुनियों को यहाँ दिव्य ज्योति दिखाई दी। जिसके बाद शिवलिंग स्वयंभू प्रकट हुआ है। तब इस स्थान का महत्व बढ़ा। यह भी बताया जा रहा है कि यह कोटेश्वर धाम ऋषि दधीचि की तपोभूमि वाला स्थान है।
प्रकृति का अद्भुत संगम
दण्डकारणन्य क्षेत्र के अधीनस्थ घने जंगलों और प्राकृतिक वातावरण से घिरा यह धाम श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। मंदिर परिसर के आसपास प्राचीन जलस्रोत और मनोहारी दृश्य इसकी सुंदरता को और बढ़ाते हैं। इसलिए इसे आस्था इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम माना जाता है।वैसे तो 12वी शताब्दी का यह मंदिर मूल रूप से 1800 ईसवी में अस्तित्व में आया है। जब 1897 में इस कस्बे का पहला आधुनिक उल्लेख हेनरी कूसेंस द्वारा लिखी गई किताब मे मिला। उन्होंने बाँस के जंगल के बीच स्थित किले और एक शिव मंदिर का उल्लेख किया है। उन्ही के अनुसार यह मंदिर 18वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में गोंडो द्वारा बनवाया गया था। जिनकी कल्चुरी कालीन कलाकृतियों आज यहां देखने मिलती है।
रामप्रसाद ने मंदिर बनवाया था
सन 1900 में इस मंदिर का निर्माण ब्रिटिश शासनकाल में तत्कालीन तहसीलदार रामप्रसाद दुबे ने कराया था। जिसके बरामदे का निर्माण 1902 में हुआ था। आगे ब्रिटिश भारतीय पुरातत्वविद् जेण्एफण् ब्लेकिस्टन ने 1913.14 में अपनी यात्रा के दौरान इस मंदिर को दयनीय अवस्था में पाया। उन्हें बताया गया था कि मंदिर एक महान तीर्थस्थल हैए लेकिन उन्हें वहाँ कोई भी देखभाल करने वाला नहीं मिला। कोई भी इसकी आंतरिक सफाई नहीं कर रहा था और मंदिर गंदा और चमगादड़ों से भरा हुआ था। 1900 के दशक में जो मंदिर एक बांस के जंगल के बीच स्थित थाए आज वहां खुला मैदान है।
तांत्रिक साधना होती थी यहां
स्थानीय लोगो के अनुसार मंदिर परिसर के आसपास शमशान घाट हुआ करता था। जहाँ साधु बाबा और तांत्रिक साधना करते थे। यहां मांगी जाने वाली हर मुराद पुरी होती है, जिससे मंदिर के प्रति लोगों की आस्था अटूट हो चुकी है। वर्तमान मे पर्यटन की दृष्टि से भी यह स्थल महत्वपूर्ण माना जा रहा है और यहाँ सुविधाओं के साथ विकास की संभावनाएँ जताई जाती रही हैं। धार्मिक दृष्टि से महाशिवरात्रि और सावन माह में यहाँ विशेष पूजा.अर्चना और मेले का आयोजन होता है। जिसमें जिले सहित दूर.दराज से हजारों भक्त दर्शन के लिए पहुँचते हैं।