संस्कार - rashtrmat.com

 संस्कार

 

आशा शैली संवेदनाओं की कहानियां लिखती हैं।उनकी कहानी संस्कार सवाल करती है। घर में बेटा बहू के झगड़े पर बहू पर उंगली क्यों नहीं उठती? हमने अपने बेटे को अच्छे संस्कार दिये हैं। जरूरी नहीं है कि बहू को भी अच्छे संस्कार मिले हों । रिश्तों की खिड़की से झांकते संस्कार आप को भी सोचने के लिए विवश कर देंगे कि आखिर गलती कहां हुई है।

 संस्कार \ कहानी

ऊषा उस दिन देर से ही दुकान बंद करके घर के लिए निकली थी। यह उसका रोज का पैरों लगा रास्ता था। थोड़ा लम्बा जरूर था लेकिन सुरक्षित था और रास्ते में जरूरत के सामान की दो-चार दुकाने भी थीं, सो उसे घर के लिए जरूरत का सामान ले जाने की सुविधा भी रहती थी। दूसरा रास्ता कोठियों के पीछे से जाता था, वह रास्ता छोटा तो था पर अक्सर सुनसान ही रहता था। अंधेरा घिर जाने पर उसे उस रास्ते पर जाने से और भी डर लगता था। लम्बा होने पर भी यह रास्ता एक किलोमीटर से ज्यादा तो नहीं था, इसलिए उसे ज्यादा परेशानी नहीं लगती थी। दिन भर बैठने के बाद पैदल चलने से शरीर भी ठीक रहता था।

दरअसल इस बस्ती के उस पार उसको एक छोटी-सी दुकान किराये पर मिल गई थी, जहाँ पर उसने कपड़े सिलाई का काम शुरू कर दिया था। ऊषा के लिए यह काम करना मजबूरी थी। चाव-चाव में सीखी सिलाई आज उसे भर पेट और इज्जत की रोटी दे रही थी।
आज ऊषा को अपनी जुबान के हिसाब से जिस महिला का सूट सिलकर  देना था  वह काम ज्यादा होने से तैयार नहीं कर पाई थी। साथ काम करने वाली लड़की छुट्टी पर थी, परन्तु महिला भी शायद जल्दी में थी या चक्कर नहीं लगाना चाहती थी सो धरना देकर बैठ गई थी।
ऊषा के हाथ मशीन पर तेज़ी से चलते रहे, मजबूरी थी। काम समाप्त होने तक रात उतर आई थी।
काम खत्म होने पर ऊषा ने जल्दी से पड़ोस के लड़के शनि को बुलाकर शटर गिरवाया फिर ताला लगाकर अपने किराये के कमरे की तरफ़ बढ़ चली, तभी शनि भी आ गया और कहने लगा,
‘‘आँटी! पिछले रास्ते से चलते हैं न, जल्दी पहुँच जायेंगे।’’
‘‘तू भी उधर ही जा रहा है क्या?’’
‘‘हाँ आँटी! मुझे अपने दोस्त रोहित के घर जाना है। आपके सामने वाले घर में ही तो रहता है।’’
‘‘हाँ रहता तो है. चल ठीक है।’’ कहने के साथ ही ऊषा के कदम पिछले रास्ते पर आ गये। हालांकि उस छोटे और तंग रास्ते पर लगभग अंधेरा ही था पर बीच-बीच में कोठियों की रोशनी भी छन-छनकर बाहर आ ही रही थी, सो उसे यह रास्ता सही लगा। पड़ोसी लड़के के साथ होने से उसे सुरक्षा का अहसास भी हो रहा था फिर भी ऊषा के कदमों में शिथिलता नहीं आई।
दरअसल जब उसे यह दुकान मिली थी तभी उसने आस-पास इन कोठियों में रहने के लिए कमरा खोजने की भी कोशिश की थी पर उसे कोई कमरा नहीं मिला। मिला तो एक किलोमीटर दूर, फिर भी उसने आबाद रास्ते के कारण इसे ही गनीमत समझा। इस भागदौड़ में वह यह अच्छी तरह से जान गई थी कि इन कोठियों में कौन लोग रहते हैं।
अब तो यहाँ आए उसे तीन साल होने को आ रहे थे, कभी-कभी उसे कोठियों से भी काम मिलने लगा था। आखिर इन कोठियों में नौकर-चाकर भी तो रहते ही थे और वहाँ काम करने वाली महिलाएँ अक्सर ऊषा के पास किसी न किसी काम के लिए आती ही रहती थीं जिससे उसे कोठी वालों के बारे में पता लगता रहता था।


‘‘तुझे आज रोहित से क्या काम आन पड़ा?’’
‘‘वो आँटी! मेरा बचपन का दोस्त है, बस इसलिए मिलना है।’’ शनि ने उत्तर दिया।
‘‘अरे चुप…चुप। यह आवाजें कहाँ से आ रही हैं?’’ अचानक ही किसी के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगीं।
‘‘लगता है किसी कोठी में झगड़ा हो गया है। आपको पता है आँटी, ये काठियों वाले भी खूब लड़ते हैं आपस में और हम लोगों को कहते हैं कि तुम लोग जाहिल हो। आपस में लड़ते हो।’’
‘‘तुझे ये बड़ी-बड़ी बातें किस ने सिखाई रे?’’ वह हँसने लगी। अब तक वे उस कोठी के पिछवाड़े पहुँच गये थे जहाँ से आवाजें आ रही थीं। वे दोनों ठिठक गये।
‘‘यह तो सुहासिनी मैडम की कोठी है आँटी! सुहासिनी ओबेराय। मैं इनके घर में दूध देने जाता हूँ।’’ शनि एक छोटा जनरल स्टोर चलाता था, जिसमें जरूरत का सामान रहता था।
‘‘जानती हूँ। चेयरमैन थीं न महिला आयोग की? जब मैं कमरा खोज रही थी तब पता चला था मुझे। मैं लिखा नाम पढ़कर ही वापस लौट आई थी।’’
‘‘क्यों आँटी…क्या आप जानती हैं मैडम को?’’
‘‘हाँ जानती हूँ।’’ वे दोनों वहीं खड़े हो गये थे।
‘‘क्या ये अच्छी नहीं हैं?’’
‘‘पता नहीं, …..’’
‘‘इनका न…अपने बेटों से रोज ही झगड़ा क्यों होता रहता है, मैं जब भी इधर से जाता हूँ तो लड़ने की आवाजें आती हैं। मुझे समझ में नहीं आता ये कैसे पढ़े लिखे लोग हैं। तीन दिन पहले भी खूब लड़ाई हो रही थी घर में।’’
‘‘जाने दे, हमें क्या लेना इनकी लड़ाई से, चल अपना काम देखें।’’ ऊषा के स्वर में उदासीनता सी उतर आई थी। उसने पैर आगे बढ़ाए तो शनि भी आगे बढ़ आया। अब ऊषा को शनि की कोई बात भी समझ में नहीं आ रही थी हालांकि शनि बराबर बोल रहा था।
‘‘आँटी, आप ताला खोल लो, मोबाइल जलाऊँ क्या?’’ उसने चौंक कर देखा, उसका कमरा सामने था। उसने पर्स से चाबी निकालकर घर का ताला खोला और शनि अपने दोस्त के घर की तरफ मुड़ गया।
इस समय कुछ बनाने की इच्छा नहीं हुई उसकी। हाथ-मुँह धोकर फ्रिज टटोला और थोड़ा-बहुत उदरपूर्ति का सामान निकाल लिया। बिस्तर पर लेटते ही उसे सुहासिनी ओबेराय के घर से आने वाली आवाजें फिर से सुनाई देने लगीं। सुहासिनी के रोने की आवाज वह साफ सुन रही थी हालांकि वह घर यहाँ से काफ़ी दूर था। सुहासिनी आज बिल्कुल उसी तरह रो रही थी जिस तरह एक दिन रोती हुई वह उसके सामने की कुर्सी पर बैठी हुई थी। सुहासिनी का वह दर्पभरा चेहरा उसकी आँखों के सामने नाचने लगा।
रेणुका, सुहासिनी और ऊषा तीनों बचपन की सहेलियों को युवावस्था आते आते अलग तो होना ही था। ऊषा को गाँव अच्छे लगते थे सो उसका विवाह गाँव के पढ़े-लिखे युवा दिनेश से कर दिया गया। रेणुका स्वास्थ्य विभाग में नर्स लग गई और सुहासिनी राजनीति की ओर मुड़ गई थी। इसी राजनीति ने उसे महिला आयोग में अध्यक्ष के पद पर आसीन करा दिया था।
इस समय उसे अपना गाँव का वह बड़ा-सा घर बहुत याद आ रहा था जो उसने जवानी के दिनों में अपने पति दिनेश के साथ मिलकर बनाया था, पर अब कोई चारा नहीं था। वह वापस जाना नहीं चाहती थी। ऊषा को याद आया कि कैसे उसके भरे-पुरे घर में दिनेश के जाने के बाद आई उथल-पुथल ने सब कुछ चौपट कर दिया था। बस वह कुल पचास ही तो पार कर पाई थी अब तक।
सेब का लहलहाता बाग, दो-दो ट्रक, सामान से नाक तक भरी दुकान, सब देखते ही देखते उसके हाथ से निकलकर बेटे वैभव के हाथ में चले गए। जिस दुकान के सारे बही-खाते कल तक उसके हवाले थे, उसी दुकान से अब वह नहाने का साबुन भी मांगने जाती तो उसे वैभव की फटकार सुनने को मिलती।
‘‘क्या करते हो इतने साबुन का? सँभालकर खर्च करना नहीं आता?’’ सुनकर ही उसका दिमाग गर्म हो जाता। वह भिन्ना जाती,
‘‘हद है! मैं क्या साबुन को खाने लगी हूँ?’’ और उसका पूरा दिन खराब हो जाता। इसी तरह जरूरत की हर चीज़ उसकी पहुँच से दूर होती जा रही थी फिर भी वह कोई न कोई बीच का रास्ता निकाल ही लेती। वह पूरी कोशिश करती कि घर में शान्ति बनी रहे, फिर भी कुछ न कुछ अप्रिय हो ही जाता और कई दिन तन वातावरण में तनाव बना रहता।
जिस घर को उसने अपने खून-पसीने को एक करके बनाया था आज उसी घर में उसकी हैसियत नौकरानी से भी बदतर हो गई थी। बहू से रोज ही किसी न किसी बात पर तकरार होना जरूरी था। इसका बड़ा कारण यह भी था कि वह अभी तक खुद को घर का बड़ा ही समझ रही थी और किसी न किसी बात पर अपनी राय देने के कारण अपना अपमान करा बैठती। जब कुछ भी बस नहीं चलता तो वह रोने लगती, इस पर भी उसे सुनना पड़ता कि गाँव वालों को नाटक कर के दिखा रही हैं और यदि वह आँसू पोंछकर उठ खड़ी होती तो बहू कहती, ‘‘बिल्ली की पीठ नीचे कैसे लगेगी? झुक जाएँगी तो नाक नीची नहीं हो जाएगी? अकड़ तो देखो।’’ उसे समझ में नहीं आता कि आखिर वह करे तो क्या करे।
उसे याद आया, दिनेश किस तरह खाली समय दुकान के बाहर तख़्त बिछाकर बैठे रहते और खाली होती तो वह भी उनके पास जा बैठती। भरा-पुरा गाँव था। दिनेश सड़क से गुजरने वाले अपने परिचितों को आवाजें दे-देकर बुला लेते,
‘‘अरे ओ भाई रामसिंह! अरे ओ अलाने-फलाने! कहाँ जा रहे हो? आ जा यार! एक कप चाय ही सही।’’ यदि रामसिंह यह कह दे कि बाबू जी अभी घर से चाय पीकर ही आया हूँ तो तुरन्त जवाब मिलता,
‘‘यार! तेरे बहाने से मुझे भी मिल जाएगी। वरना दस बातें सुना देगी ये मुझे चाय मांगने पर।’’
संकेत सीधा-सीधा पास बैठी ऊषा की ओर होता और वह हँसकर चाय बनाने चली जाती। भोजन का समय होता तो दिनेश के साथ कोई न कोई तो दुकान की सीढ़ियाँ चढ़ता दिखाई जरूर दे जाता, इसलिए वह खाना बनाते समय इतनी गुंजाइश अवश्य रखती थी कि दो लोग आ जाएँ तो भोजन कम न पड़े। जिस दिन घर में कोई अतिथि नहीं आता तो दिनेश बहुत उदास हो जाते और कहने लगते,
‘‘आज का दिन कितना मनहूस गया न? आज कोई चाय पीने वाला भी नहीं आया।’’ और ऊषा हँसकर कहती,
‘‘घर में गाय बंधी है न। उसे खिला आइए।’’ परन्तु अब तो यह सब सपने जैसी बातें हो गईं।
चार साल हो गये थे दिनेश को गये हुए। सेब का सीज़न हर साल की तरह फिर आ गया था। ऊषा अपने नियम के अनुसार सुबह सवेरे मजदूरों के साथ बगीचे में चली जाती और वहीं उनके साथ बैठकर कुछ खा-पी लेती। पहले की तरह ही सेब तोड़ना, ग्रेड करके उन्हें पैक करना और पेटियों में भरना, सारे काम में मजदूरों का साथ देना पहले भी रहता था और आज भी। परन्तु अन्तर सिर्फ इतना था कि पहले दिनेश के साथ बैठकर उल्लास भरे माहौल में काम करना होता था और अब बस मजदूर और उनके साथ ऊषा। वह सोचती, चलो! दिल बहलाने के लिए इतना ही सही।
सच, कितना मनहूस दिन था वह? हर साल की तरह उस बार भी सेब की अखिरी खेप लेकर चण्डीगढ़ गये थे दिनेश। लौटते हुए गाड़ी कोहरे की चपेट में आ गई थी और ऊषा की दुनिया उजड़ गई। बस, इतनी ही तो कहानी थी।
एक झटके के साथ उठ खड़ी हुई ऊषा। रात पता नहीं कितनी बीत गई थी। उसका गला सूख रहा था पर बत्ती जलाने को मन ही नहीं किया। खिड़की से आती रोशनी के सहारे उठकर पानी पिया और फिर आकर लेट गई। थोड़ी ही देर बाद वह फिर अपने सेब के बाग में थी।
उस दिन गाड़ी लेकर गए दिनेश लौटकर नहीं आए, बाकी तो सभी कुछ वैसा ही था। दोनों गाड़ियाँ उसी के नाम थीं, बैंक खाते भी उसके नाम थे तो उसे उनका व्यवहार भी निभाना ही था और यही उसके बेटे-बहू को चुभता था। वह समझ रही थी कि लड़ाई की असल वजह यही थी, इस पर भी वह अपनी पकड़ नहीं छोड़ पा रही थी। वह यह भी जानती थी कि अगर उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी तो उसकी हालत क्या होगी।
चाहे-अनचाहे कभी कभार नौकरों को कुछ काम कह देती और वही उसके लिए दुखदायी बन जाता। नौकरों के भी दो गुट बन गये थे। बूढ़ा ड्राइवर उसके साथ हमदर्दी रखता था जबकि नया लड़का जसबीर बेटे के खेमे में था और अक्सर ही उसकी अवज्ञा कर देता था जो उसे बहुत कष्ट देता। धीरे-धीरे उसने जसबीर से बात करना बंद कर दिया।
जिस साल उसने घर छोड़ा था, उस समय तक इस फसल का सारा सेब मण्डी जा चुका था। बस गोल्डन के कुछ पेड़ बचे थे। सुनहरे रंग के ये फल लाल सेब के मुकाबले अधिक स्वादिष्ट और टिकाऊ होने के कारण घरेलू उपयोग के लिए रखे जाते थे। ये पकते भी देर से थे इसलिए अंत में ही तोड़े जाते। इन्हें मण्डी भेजा ही नहीं जाता था क्योंकि उनके दाम मण्डी में बहुत कम मिलते थे। कुछ फल वहीं बिक जाता और कुछ अपने खाने के लिए रख लिया जाता जो सर्दी के कारण खराब नहीं होता और मार्च तक चल जाता था।
सारे सेब तोड़ लिए गये थे और बस इस साल का आखिरी काम बचा था। उस दिन बाग का सारा गोल्डन सेब तोड़कर पेड़ों को खाली किया जा रहा था। गाँव की कुछ मजदूर स्त्रियाँ तोड़े हुए फलों के किल्टे लाकर गोदाम में ढेर लगा रही थीं और भीतर बैठा ग्रेडर उन्हें छाँटकर दागदार फल अलग कर रहा था ताकि बाकी के फल खराब न हो जाएँ। इसी समय कुछ फौजी आ गये थे सेब लेने, वे तीन लोग थे। कैम्प नजदीक होने से फौजी अक्सर आ ही जाते थे और दाम चुकाकर बागों से ही अपनी पसन्द का सेब पेटियों में भरवाकर ले जाते थे। ऊषा गोदाम के दरवाजे के निकट ही बाहर रखी तैयार पेटियों पर नम्बर लगा रही थी।
‘‘कहिए!’’ उसने फौजी वर्दी में तीन युवा लड़कों को अपनी ओर आते देखकर कहा।
‘‘दीदी! हमें आठ पेटी सेब चाहिए।’’
‘‘भैया अब तो गोल्डन ही बचा है, रेड रॉयल तो सब मंडी चला गया।’’ उसने कहा तो एक फौजी बोला हमें गोल्डन ही चाहिए।’’ ऊषा कुछ कहती कि तभी उसे वैभव आता दिखाई दिया तो वह गोदाम के भीतर चली गई। उसे भय था कि वह इन अजनबियों के सामने ही कहीं उसका अपमान न कर दे। आगन्तुक फौजियों से सेब का मोलभाव होने के बाद वैभव ऊषा को अपने सामने पेटियाँ भरवाने को कहकर फिर बाग में चला गया।


अभी सुबह के आठ ही बजे थे, ग्रेडर को उनके लिए पेटियाँ भरने को कहकर ऊषा भी नाश्ता करने गई तो अपनी आदत के अनुसार रसाई में जाकर उसने चाय बनाई और तीन कप छोटे नौकर के हाथ तीनों आगंतुकों के लिए गोदाम में भेज दी। फिर नाश्ता करके वह भी गोदाम में चली गई। फौजी लोग जीप लेकर आए थे और अपने सामने पेटियाँ भरवा रहे थे।
फल छांटते और पेटियाँ भरते दोपहर हो गई। भोजन का समय हो गया था और ऊषा ने आदत के अनुसार उन अतिथियों को भी भोजन के लिए कह दिया। मजदूरों के लिए भी खाना बनता ही था सो तीन लोग और खा गये तो कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं था। सारा काम निबटते-निबटते दोपहर हो गई थी। तीनों फौजी भोजन के लिए धन्यवाद देते हुए सेब की पेटियाँ जीप में लादकर विदा हो गए।
ग्रेडर और मजदूर पूरी लगन से काम कर रहे थे। सब को पता था कि सेब सीज़न में समय की कोई सीमा नहीं होती। काम निपटाकर ही ग्रेडर भी दूसरी जगह जाते। सब जानते थे कि यही दो-चार दिन हैं कमाने के, फसल के बाद कौन पूछेगा उन्हें।
इसी समय घर के सामने बस रुकी तो ऊषा ने देखा उसकी मित्र रेणुका बस से उतर रही थी। यह कब आ गई? यह तो आजकल शिमला के रिपन अस्पताल में थी।
रात को रेणुका ने उसे बताया कि दो दिन की छुट्टी का सदुपयोग करने के लिए वह ऊषा को मिलने आ गई थी पर ऊषा तो रेणुका को देखकर डर गई। पता नहीं बेटा बहू क्या कहेंगे, यह तो भला हो कि उस समय वैभव का मूड अच्छा था, उसने कुछ नहीं कहा।
ऊषा और रेणुका रात का खाना खाकर अपने कमरे में आ गई थीं। अभी वे बिस्तर खोलतीं कि वैभव कमर पर हाथ रखे कमरे में आ धमका। उसे इस तरह आते देखकर ऊषा बुरी तरह डर गई। वह रेणुका के सामने झगड़ा नहीं करना चाहती थी। समझ गई कि फिर कुछ हुआ है, अब झगड़ा होना ही होना है। तभी उसने कमरे के दरवाजे में खड़ी बहू को देखा तो उसका खून ही सूख गया, कभी वह रेणुका को देखती और कभी वैभव को। फिर उसने डरते-डरते ही पूछा,
‘‘क्या हुआ बेटा?’’
‘‘क्या हुआ, जैसे आपको पता ही नहीं।’’
‘‘सच में मुझे नहीं पता कि क्या हुआ है।’’
‘‘ये फौजी क्या आपके मायके के रिश्तेदार थे?’’
‘‘ये कैसे बात कर रहे हो वैभव तुम माँ से?’’ रेणुका सकपकाकर बोली।
‘‘आप चुप रहो मौसी, आपको नहीं पता कुछ भी।’’ वैभव ने आँखें तरेरीं तो ऊषा ने उसे आँखों ही में चुप रहने का इशारा किया। रेणुका चुपचाप कभी ऊषा को और कभी वैभव को देख रही थी।
‘‘क्यों…कुछ गलत किया है क्या उन्होंने? मेरे ख्याल में ऊपर घर तक तो वे मेरे साथ ही आए थे और खाना खाकर बाहर ही से चले गये थे।’’
‘‘पर वे आए ही क्यों थे? क्या जरूरत थी उनको खाने के लिए कहने की आपको? आप अपनी हरकतों से बाज तो नहीं आ सकते न?’’
‘‘बहू है न नौकरानी बनाने वाली।’’ बहू ने आग में घी डाला, जबकि दाल-चावल मजदूर स्त्रियों ने ही बनाये थे।
‘‘देखो बेटा! यह तो इस घर का शुरू का दस्तूर है। तुम्हारे बाबू जी किसी को दरवाजे से भूखा नहीं जाने देते थे। सो मुझे भी लगा, इतने मजदूरों के लिए खाना बना है दो लोग दरवाजे से भूखे जाएँ यह तो घर वालों के लिए भी अच्छा नहीं होगा न, बस इसीलिए कह दिया उनको। खाने का समय था, घर पर कोई भूखा बैठा हो तो हमारे गले से कैसे उतरेगा?’’
‘‘आज तो जो हुआ सो हुआ, पर कान खोलकर सुन लो आप, आइन्दा यह सब नहीं चलेगा। यह शहर की पढ़ी-लिखी बहू आपके लिए रसोई में नहीं घुसी रह सकती।’’
‘‘पर बेटा खाना तो सेवती वगैरह बना रही हैं और काम खत्म हो गया तो अब किसके लिए बनेगा खाना और कौन आ रहा है रोज तुम्हारे घर खाने?’’
‘‘आप गलती तो मान ही नहीं सकते न अपनी? कह दिया न, कल से कोई लंगर नहीं चलेगा, बंद कर दो अपना यह नाटक। समझ में आ गया हो तो ठीक है, नहीं तो….’’ और वह बात अधूरी छोड़कर बाहर निकल गया।
अपमानित ऊषा सोच रही थी, मजदूर तो अपना खाना खुद ही बना रहे थे बहू ने कुछ भी नहीं बनाया। सब के खाने के बाद भी बहुत सा दाल-भात बच गया था जो मजदूरों ने शाम को खाया था, फिर…? रेणुका क्या सोचेगी, जिसने दिनेश को दोनों हाथों से लुटाते देखा है?? वह यह भी सोच रही थी कि बड़े शहर में पढ़ना ही क्या पढ़ना होता है? अनपढ़ तो वह भी नहीं थी।
उधर रेणुका आवाक खड़ी यह सोच रही थी कि यह वैभव इतना असभ्य कैसे हो गया? इस घर के संस्कारों की तो पूरे इलाके में दुहाई दी जाती थी और आज यह? घर का माहौल देखकर रेणुका को समझते देर नहीं लगी कि उसकी सहेली पर क्या बीत रही होगी। उसने रात को कुरेद-कुरेदकर ऊषा से सब कुछ उगलवा लिया। वह जान गई थी कि अब तो किसी के भी सामने कुछ भी कह देना वैभव की आदत ही बन गई थी और अब तो वह हाथ भी उठाने लगा था।
अगली सुबह वापस लौटते हुए रेणुका ऊषा को एक तरह से जबरदस्ती ही अपने साथ ले गई। अपने बचपन की प्रिय सहेली को ऐसे कैसे घुटन भरे माहौल में अकेला छोड़ देती वह? किसी से पूछने की भी उसने जरूरत नहीं समझी। जो होगा देखा जाएगा और शिमला जाकर दोनों ही महिला आयोग की अध्यक्ष से मिलने जा पहुँचीं। थी तो वह भी इनकी बचपन की सखी ही इसलिए रेणुका ने बेझिझक उसके सामने ऊषा का पिटारा खोल दिया।
दोनों सहेलियों को रुचि लेते देख ऊषा दोनों हाथों को मुँह पर रख फूट-फूट कर रो पड़ी। उसके भीतर का दुख अचानक फूटकर बाहर निकल आया था। अभी तक उसने अपनी किसी भी सहेली से अपना दर्द सांझा नहीं किया था। क्योंकि उसके ऐसे संस्कार ही नहीं थे। उसे यह सब अपमान जैसा लगता था। उसने सुहासिनी के चेहरे पर आने वाले उतार-चढ़ाव को भी कहाँ देखा। वह तो लाज के मारे धरती में गड़ी जा रही थी। जबकि रेणुका चाहती थी कि सुहासिनी उनकी मित्र है तो कुछ अच्छी और सही राय देकर उसकी सहायता करे।
सारा माजरा सुनकर सुहासिनी कुर्सी घुमाती हुई बोली, ‘‘कैसे संस्कार दिये हैं तुमने बेटे को? मैं तो हैरान हूँ, पर आखिर गाँव में रहकर और तुम करती भी क्या? दुर्भाग्य से ऐसा ही तुम्हें आदमी भी मिल गया गँवार…।’’
‘‘बस सुहासिनी!’’ अभी सुहासिनी ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि अचानक ऊषा झटके से उठ खड़ी हुई और रेणुका को भी बाजू से पकड़कर उठा लिया, ‘‘अब एक शब्द भी नहीं, मेरे आदमी जैसा आदमी तुम्हें मिला होता तो आज तुम्हें जिन्दगी के अर्थ पता होते। रही मेरे दिए संस्कारों की बात, तो थोड़ा रुको। अभी एक ही बेटे की शादी कर लो, तब पूछूंगी कि संस्कार किसे कहते हैं। चलो रेणुका, इसे राजनीति करनी आ गई है। देखते हैं कैसे संस्कार देगी बेटे को।’’
‘‘सुहासिनी! यह तुम क्या कह रही हो? होश में तो हो न??’’ रेणुका बिफरने लगी थी, ‘‘क्या तुम यह भी भूल गईं कि हम तीनों बचपन की सहेलियाँ हैं, वैसे इस तरह से तो किसी दुश्मन से भी बात नहीं की जाती जैसे तुम ऊषा से कर रही हो। हद है तुम्हारी तो!….’’ वह कुछ और भी कहती शायद पर ऊषा ने उसे बाजू से पकड़कर उठाते हुए कहा,
‘‘नहीं रेणुका, कुछ मत कहो! मैं ही भूल गई थी कि अब यह राजनीति में आ गई है और राजनीति जो अपने बाप को भी नहीं छोड़ती, यह बेचारी क्या जाने दोस्ती क्या होती है। हमें इस पर दया करनी चाहिए।’’ ऊषा का बोलते हुए दम फूलने लगा था। तनिक रुक कर वह फिर कहने लगी, इसे क्या पता कि मेरे देवता जैसे पति तो गरीब मजदूरों के साथ भी जी-जनाब कहकर बात करते थे, और हमारे घर के संस्कारों की दुहाई तो दस कोस तक दी जाती थी, पर जो लड़कियाँ बाहर से घर में आती हैं उनके संस्कारों का हम क्या कर सकते हैं। इसे यह तो अच्छी तरह से पता है कि मेरे पति की पहुँच उन नेताओं तक थी जिनके सामने यह आज भी हाथ जोड़कर मिमियाती रहती है। इस बेचारी को तो यह भी पता नहीं कि जिस भ्रष्ट नेता के तलुए चाटकर यह यहाँ तक पहुँची है, वह दिनेश के सम्पर्क में भी था। चलो, यहाँ से अब, कहीं मैं इसकी सारी पोलें न खोलने लगूँ।’’ और वह रेणुका का हाथ पकड़कर उसे वहाँ से घसीटकर बाहर ले आई।
रेणुका तो बस हक्का-बक्का हुई, कभी सुहासिनी को और कभी ऊषा को देखती हुई ऊषा के साथ बाहर आ रही थी। ‘‘चलो, अब गुफा कैफे में चलकर कुछ खा लेते हैं।’’ ऊषा ने कहा तो रेणुका वर्तमान में लौट आई। माल पर पहुँचकर दोनों ने गुफ़ा कैफ़े में हल्का नाश्ता किया और पूरी शाम माल पर घूमकर खुद को हल्का करती रहीं। रेणुका ने सुहासिनी की कोई बात करनी भी चाही तो ऊषा ने उसे वहीं रोक दिया, ‘‘इतनी बढ़िया शाम क्यों बरबाद करने लगी हो तुम, अरे…अरे वो देखो बन्दर…उन श्रीमान जी का चश्मा ले गया।’’ रेणुका ने चौंक कर देखा, कहीं कुछ भी नहीं था।
‘‘तू नहीं बदलेगी न! रही वैसी की वैसी।’’ और रेखुका ने भी फिर इस विषय में कोई बात नहीं की।
‘‘ऊषा! अब क्या करने का इरादा है तुम्हारा?’’ रात को जब दोनों बिस्तर पर आईं तो रेणुका ने पूछ लिया।
‘‘तेरे सेब के बाग देखूंगी न, तुझे एक अच्छा ग्रेडर मिल जाएगा। तूने तो बच्चों को अच्छे संस्कार दिये ही होंगे।’’ कहकर ऊषा हँस दी।
‘‘हर बात को मज़ाक में मत उड़ाया कर ऊषा। यह बहुत गम्भीर मामला है।’’ रेणुका की आँखों में चिन्ता की लकीरें साफ़ देखी जा सकती थीं।
‘‘हाँ रेणुका! मैं घर छोड़ने के समय से इसी पर सोच रही हूँ। फिर भी दिमाग को ठंडा रखकर ही तो कुछ हल निकलेगा, रोकर तो नहीं।’’
‘‘क्या मतलब? घर छोड़कर?? क्या अब घर नहीं जाएगी?’’
‘‘नहीं। मैंने जरूरी कागजात साथ रख लिए थे। कल से मेरे लिए किराए का कमरा देखना शुरू कर दे और कल हम एक सिलाई मशीन भी खरीदेंगे। तुझे पता है न, मैं कपड़े अच्छे सी लेती हूँ।’’ ऊषा ने भी अब अपना इरादा स्पष्ट कर दिया। दरअसल ऊषा ने तो उसी समय वापस घर न लौटने की कसम खा ली थी। अब उस कीचड़ में उसे पाँव भी नहीं रखना था।
रेणुका को उसका निर्णय सही लगा। आखिर उसका हुनर किस दिन काम आएगा? कभी यूँ ही शौक-शौक में उसने सिलाई सीख ली थी और घर के कपड़े सिलने लगी थी। अब भी तो अपनी जरूरत का कपड़ा वह घर में ही सिलती थी। अब देखना है कि कामयाबी कैसे मिलेगी। दूसरे दिन से ही उन दोनों सहेलियों ने किराए के घर और दुकान की खोज शुरू कर दी थी।
रेणुका ने ऊषा के लिए दिन-रात एक कर दिया था। आखिर उनकी मेहनत रंग लाई। कुछ दिन में ही उसकी सिलाई की दुकान चल निकली थी। अच्छे घरों से काम आने पर आय भी ठीक ही हो जाती थी। आज वह शिमला में एक छोटा-सा प्लॉट भी खरीद चुकी थी, पर यह दुकान और कमरा वह छोड़ना नहीं चाहती थी क्योंकि दूसरी जगह काम जमेगा ही इसका क्या भरोसा? काम में डूबकर वह सारी पीड़ायें भूल चुकी थी। रेणुका जब-तब उसके पास चली आती।
दुकान आते-जाते दोनों समय ऊषा जब भी सुहासिनी के बड़े-से घर के सामने से गुजरती तो उसे उसका वह दर्प भरा चेहरा याद आ जाता और वह खून के घूँट पीकर रह जाती। सुहासिनी को भी ऊषा के वहाँ होने का पता चल ही चुका था। ऊषा चाहती तो आज सुहासिनी को उसकी बात का जवाब देने उसके बंगले पर जा सकती थी, पर यहाँ भी उसके संस्कार ही उसके आड़े आ गये। नहीं कर पायेगी वह ऐसा, किसी के दिल को दुखाना उसके खुद के संस्कारों में नहीं था।

आशा शैली
सम्पादक शैलसूत्र
इन्दिरा नगर-2. लालकुआँ
जिला नैनीताल-262402

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