शिव की तरह विष पीकर संघ राष्ट्र की करता है रक्षाः प्रदीप - rashtrmat.com

शिव की तरह विष पीकर संघ राष्ट्र की करता है रक्षाः प्रदीप

राष्ट्रमत न्यूज,भोपाल(ब्यूरो)। भोपाल में कथा वाचक प्रदीप मिश्रा ने संघ की तुलना भगवान शिाव से की। मोहन भागवत के सामने बोले कि शिव की तरह विष पीकर राष्ट्र की रक्षा करता है संघ है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज का स्वभाव रहा है। समाज में सज्जन शक्ति का जागरण, आचरण में पंच परिवर्तन और निरंतर सद्भावना संवाद आज की अनिवार्य आवश्यकता है।कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा-शिव भी विष पीते हैं और राष्ट्र की रक्षा करते हैं। संघ भी विष पीकर राष्ट्र की रक्षा करने में लगा हुआ है। किस तरह से आने वाली पीढ़ी को बनाया जाए।

संघ भी विष पीकर

दो सत्रों में बैठकें आयोजित की गई। प्रथम सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण के साथ हुआ। मंच पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा और मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय उपस्थित रहे। मध्यभारत प्रान्त के 16 जिलों से समाज के विभिन्न वर्गों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने बैठक में सहभागिता की।कार्यक्रम में कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा-शिव भी विष पीते हैं और राष्ट्र की रक्षा करते हैं। संघ भी विष पीकर राष्ट्र की रक्षा करने में लगा हुआ है। किस तरह से आने वाली पीढ़ी को बनाया जाए।

 समाज से राष्ट्र तक का भाव

पहले सत्र में पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने आशीर्वचन में कहा कि सभी समाज अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन यह प्रश्न भी आवश्यक है कि हमने राष्ट्र के लिए क्या किया और राष्ट्र को क्या दिया। उन्होंने कहा कि संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता है। जैसे शिव ने समस्त सृष्टि के लिए विष पिया, वैसे ही संघ प्रतिदिन आरोपों का विष पीकर भी संयम और राष्ट्रहित में कार्य करता है।

साधना से ही राष्ट्र का निर्माण

बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि समाज शब्द का अर्थ ही समान गंतव्य की ओर बढ़ने वाला समूह है। भारतीय समाज की कल्पना सदैव ऐसी रही है। जिसमें जीवन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से सुखी हो। हमारे ऋषि-मुनियों ने यह समझा कि अस्तित्व एक है, केवल देखने की दृष्टि अलग-अलग है। उनकी तपस्या और साधना से ही राष्ट्र का निर्माण हुआ और वही हमारी सांस्कृतिक नींव है।