राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। बालाघाट में सरेंडर करने वाली नक्सली सुनीता ओयाम की जिन्दगी हैरान करती है। रहस्य और रोमांचक है ही। अब वो लाल गलियारे को अलविदा कहकर सामाजिक सरोकार से जुड़ गयी। कोई भी जब सुनता है महज 20 साल की उम्र में सुनीता नक्सली बन गयी है।वो हैरान हो जाता है।

नजरें फटी की फटी रह गई
पिछले दिनों 2 अक्टूबर की रात 8 बजे पुलिस की प्रेस कान्फ्रेंस में सुनीता अपने हाथांे में इंसास राइफल लिये पहुंची तो सबकी नजरें फटी की फटी रह गई। सब उसे देखकर हैरान रह गए कि दुबली-पतली वो लड़की कद 5 फीट भी नहीं आंखों में मासूमियत और चेहरे पर डर आखिर यह नक्सलवाद के दलदल में कैसे आ गई। कल तक सुनीता तीन राज्यों की मोस्ट वांटेड नक्सली थी। जिस पर 14 लाख रुपए का इनाम था।
कभी स्कूल नहीं गयी सुनीता
हैरत की बात यह है कि वह कभी स्कूल भी नहीं गई। उसका बचपन उस माड़ के जंगलों में बीता जिसे नक्सलवाद का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। शुरूआती दिनों में वह एमएमसी जोन यानी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ प्रभारी और सेंट्रल कमेटी के मेंबर रामदेर की गार्ड बन गई। उसके बाद उसे एसीएम का पद मिला और वह मलाजखंड.दर्रेकसा दलम की एसीएम बनाई गई। जिसके हाथ में इंसास रायफल थमा दी गई।

पिता से मिलकर रो पड़ी
चार नंवबर को सुनिता के परिजन उससे मिलने 700 किमी का सफर तय करके बीजापुर से बालाघाट पहुंचे। जब सुनीता को बताया गया कि उसके माता-पिता आये हंै तो वह अपनों से मिलने बेताब हो गई। सुनिता अपने माता पिता को देख कर भावुक होकर रो पड़ी और गले लग गयी। पिता बिसरू ओयाम ने बताया कि तीन साल पहले नक्सली बेटी सुनिता को जबरन उठा ले गए थे। वहीं कुछ समय बाद सुनीता की छोटी बहन को भी ले जाना चाहते थे, लेकिन हिम्मत बांधकर परिवार से साफ इंकार कर दिया।
जंगल की जिन्दगी को अलविदा
नक्सल के चंगुल फंसी सुनिता से बिछड़ने का दर्द परिवार को तिल तिल डस रहा था। क्योकि उन्हें बड़ी बेटी से मिलने नहीं दिया गया। नक्सल संगठनों में तीन सालों तक काम करने के बाद सुनीता ने अब जंगल की जिंदगी को अलविदा कह दिया है और वह मुख्य धारा में लौट आई है।

सरेंडर का फैसला की
पुलिस ने बताया कि वह हाल के दिनों में रामदेर के ग्रुप के 11 सदस्यों के साथ बालाघाट आई थी। लेकिन सुनिता के लिये जंगल की जिदंगी दिन ब दिन कठोर होती जा रही थी। सूत्रों की माने तो उसके रिश्तों को लेकर नक्सल समूह में उसकी बदनामी हो रही थी। ऐसे में सुनीता ने सरेंडर करने का निर्णय लिया।

कई लोग नक्सल संगठन में हैं
जब वह कैंप पहुंची तो उसके हाथ में एक कागज था,जिसमें अपना नाम व जिले का नाम लिखा था। शुरूआती पूछताछ में उसने अपने गांव और माता- पिता के बारे में बताया। जिसके बाद बालाघाट पुलिस ने बीजापुर पुलिस से संपर्क किया। थाना प्रभारी ने गांव के सरपंच से बात कराई। बीजापुर पुलिस के मार्फत जब सुनिता के माता-पिता की बात बालाघाट पुलिस से हुई तो सुनिता भावुक होकर रोने लगी। लेकिन अब वह माता-पिता समेत अपनों से मिलकर बेहद खुश है। सुनिता के माॅ-बाप ने बताया कि गांव के कई लोग अभी भी नक्सल संगठन में सक्रिय हैं, उन्होने अपील की है कि सब लोग गांव लौट आये।