वक्त की करवट - rashtrmat.com

वक्त की करवट

  नविता जौहरी की लघुकथा नए दौर की कथा है। वे अपनी लघुकथा के जरिए हमारे समय की एक नई सभ्यता की तस्वीर बनाती हैं। मनुष्य की संवेदनशीलता के साथ साथ उसके अंदर छिपे मुखौटे वाले चेहरे से भी परिचय कराती हैं। आप भी पढ़िये उनकी लघुकथा और महसूस करिये आज के सच को..

                               वक्त की करवट
“अजी सुनती हो! जानती हो आज दुकान पर कौन आए थे?
“कौन आए थे बताओ? ”
“अरे वही इंदिरा कॉलोनी वाले मेहरा साहब अरे वह कैसे इतने सालों में तो कभी भी कॉलोनी में दुकान होते हुए भी तुम्हारी दुकान पर नहीं आए !”
” हाँ वही मेहरा साहब हमेशा दुकान के सामने से निकल जाते थे कि हम तो ऑनलाइन सामान खरीदेंगे। किसी से कहते सुना था कि इस दुकान में स्टैंडर्ड का सामान नहीं है।मेरा मन बहुत दुखी हुआ था सुनकर।
मेरे मन में आया कह दूँ अभी बिजी हूँ लंच का टाइम हो रहा है या अभी वो सामान उपलब्ध नहीं है ।”
“फिर क्या किया आपने? ”
“मैंने सोचा कि मुसीबत के समय उनकी सहायता करना हमारा फर्ज है ।
वक्त करवट जरूर लेता है यह तो वह जान ही गए होंगे।”

कठिन परीक्षा
आज फिर सुरभि चिंकी को डाँट रही थी । चिंकी अपनी पढ़ाई छोड़कर दादी बाबा के साथ बातें बना रही थी ।यूँ तो वो तीसरी कक्षा में ही थी किंतु सुरभि उसकी पढ़ाई को लेकर बहुत गंभीर थी ।
“देखिए ना मम्मी जी, चिंकी फिर पढ़ाई छोड़ कर यहाँ बैठी है। कल परीक्षा है ।”चलो चिंकी रूम में “!
और चिंकी उदास चेहरा लिए चल दी। सुरभि उसके पीछे पीछे रूम में पहुँची और दरवाजा फेर दिया । लेकिन कमरे से आती आवाज़ पर दरवाजा कोई पहरा नहीं लगा पाया।
“देखो सुमित माँ बाबूजी जब भी यहाँ आते हैं ,चिंकी अपनी पढ़ाई नहीं कर पाती ।”
“लिसिन सुरभि तुमने माँ-बाबूजी से अलग घर में रहने का फैसला लिया ,मैंने मान लिया ,लेकिन उनका भी तो मन होता है हम लोगों से मिलने का ! तुम उस पर भी पाबंदी लगाना चाहती हो ? ”
“मैं मना नहीं कर रही, पर कम से कम परीक्षा के समय तो ना आएँ ! ”
“तुम भी ना ! ”
“अब मुझे डिस्टर्ब मत करो ।”
तारा जी ने ये वार्तालाप सुनकर निर्णय ले लिया ।
‘हम कल सुबह ही घर वापस चलेंगे, हमारी वजह से सुरभि बहुत ज्यादा परेशान हो जाती है ।”
“जैसा तुम कहो ।”
निशांत जी ने मायूस होकर कहा । तारा जी के मन मस्तिष्क में एक ही प्रश्न कौंध रहा था, यह कठिन परीक्षा किसकी है ? चिंकी की या हमारे मोह ममता के भावों पर अंकुश लगा पाने की क्षमता की ।

हाथों की लकीरें
“हैलो सुनिधि !क्या हाल हैं?”
“अरे श्रेहा! हाँ मैं तुम्हें कॉल करने ही वाली थी ,फ्री होकर। मैं बढ़िया हूँ। तुम बताओ क्या चल रहा है ?”
“मैंने तुम्हें आज कुछ पिक्स भेजी थी व्हाट्सएप पर ।तुमने देखीं?
आज हमारी फाउंडेशन की तरफ से एक चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित हुई थी , उसी में बिज़ी थी। कई बच्चों की पेंटिंग्स तो देखने लायक थीं। तुम शौकीन हो इसलिए पिक्स भेज दीं। विनर बच्ची की पेंटिंग देखी ?”
“गजब है श्रेहा! इस बच्ची के पास तो गॉड गिफ्टेड टैलेंट है। देख कर दिल खुश हो गया । भगवान किसी किसी के हाथ में ऐसी लकीरें देकर भेजते हैं कि करिश्मा कर दिखाते हैं।”
“तुम हाथों में किस्मत की लकीरों की बात कर रही हो सुनिधि ! तुम्हे ये जानकर और भी हैरत होगी कि वो बच्ची तनीषा पैर से पेंटिंग करती है। उसके दोनों हाथ कुछ साल पहले एक्सीडेंट में कट चुके हैं ।”
अब फोन पर दोनों ओर सन्नाटा था।

असली रंग
” बेटा मेरा जी घबरा रहा है मैंने कहा था अस्पताल लेकर न चल,पर तू नहीं माना।जल्दी वापिस घर ले चल।”
माँ आप चिंता ना करो बस एक दिन की ही तो बात है ,सारे टेस्ट हो जाएँ तो हम लोग बेफक्र हो जाएँगे ।अगर घर जाकर फिर से आपकी तबीयत कल जैसी हो गई तो हम कैसे संभालेंगे!यहाँ के डॉक्टर बहुत अच्छे हैं।देखा आपने कितनी अच्छी तरह देखभाल करते हैं।
“मिस्टर रमेश !”
“जी डॉक्टर साहब ।
“आप की माता जी की दो टेस्ट रिपोर्ट आ गई हैं, थोड़ी दिक्कत है पर ज्यादा चिंता की कोई बात नहीं है । एम आर आई की रिपोर्ट ठीक नहीं है कुछ टैस्ट और कराने होंगे। फिर देखते हैं।”
“जी डॉक्टर साहब।
डॉक्टर साहब अभी-अभी मेरी नज़र माँ की उंगलियों पर पड़ी देखिये ये नीली पड़ रही हैं।”
” अरे कैसे हो रहा है !नर्स जल्दी से ड्रिप लगाओ। मिस्टर रमेश तुरंत न्यूरोसर्जन को बुलाना पड़ेगा । कार्डियोलाजिस्ट से भी संपर्क करेंगे। फीस उनकी थोड़ी ज़्यादा है लेकिन बहुत फेमस हैं।”
डॉक्टर साहब अब तक डेड़ लाख खर्च हो चुके हैं, अगर फीस थोड़ी —-”
” अरे पैसे मरीज की जान से ज्यादा कीमती थोड़े ही हैं ! चलो सिस्टर आपरेशन थियेटर में पहुँचना है।”
“बेटा क्या हुआ ? मुझे पानी तो पिला दे!”
ये लो। अरे गिर गया !कोई बात नहीं ।”रमेश ने माँ का एप्रिन साफ करते हुए कहा।
“अरे यह क्या मेरी उंगली नीली कैसे !”
रमेश को माजरा समझते देर न लगी और अब अस्पताल वालों का असली रंग भी दिखाई दे गया था।

नविता जौहरी