राष्ट्रमत न्यूज,बीजापुर(ब्यूरो)। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले का प्रसिद्ध जैतालूर मेला हर वर्ष की तरह इस बार भी श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित किया जा रहा है। यह पारंपरिक मेला 29, 30 और 31 दिसंबर को जैतालूर ग्राम में लगेगा, जहां माँ कोदई माता की पूजा-अर्चना के लिए दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचेंगे। जैतालूर मेला क्षेत्र की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार माँ कोदई माता को गांव और आसपास के इलाकों की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि माता की कृपा से क्षेत्र में सुख-शांति, अच्छी फसल और समृद्धि बनी रहती है। मेले के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार माता की विशेष पूजा, आरती और अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। श्रद्धालु नारियल, चुनरी और प्रसाद अर्पित कर माता से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक का मंच
तीन दिवसीय जैतालूर मेला केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल का भी बड़ा मंच बन जाता है। इस दौरान आदिवासी समाज की समृद्ध लोक-संस्कृति देखने को मिलती है। पारंपरिक लोकनृत्य, लोकगीत और परंपरागत वेशभूषा मेले की विशेष पहचान होती है। बुजुर्गों से लेकर युवा और बच्चे तक पूरे उत्साह के साथ इस आयोजन में भाग लेते हैं।
पारंपरिक स्वाद भी मेले की पहचान
जैतालूर मेला क्षेत्र के ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। मेले के अवसर पर गांवों के लोग लंबे समय बाद एक-दूसरे से मिलते हैं, सामाजिक रिश्तों को मजबूत करते हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों को आगे बढ़ाते हैं। यह मेला आपसी भाईचारे और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक भी माना जाता है। मेले के दौरान स्थानीय बाजार की रौनक भी देखते ही बनती है। ग्रामीण अपनी दैनिक जरूरतों से जुड़ी वस्तुओं की खरीदारी करते हैं, वहीं बच्चों के लिए मेले का माहौल खास आकर्षण का केंद्र रहता है। खाने-पीने की स्थानीय चीजें और पारंपरिक स्वाद भी मेले की पहचान में शामिल हैं।
सांस्कृतिक चेतना को भी नई ऊर्जा
कुल मिलाकर, 29, 30 और 31 दिसंबर को आयोजित होने वाला जैतालूर मेला माँ कोदई माता की भक्ति, क्षेत्रीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन है। यह मेला न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना को भी नई ऊर्जा प्रदान करता है।