हमारे समय की हकीकत है बज़्म-ए-हयात - rashtrmat.com

हमारे समय की हकीकत है बज़्म-ए-हयात

पत्रकार रमेश कुमार‘रिपु’ की ग़ज़लों में अपने समय के हकीकत की वजह से तकरार और इसरार दोनों है। इनका अंदाजे-बयां अलग हटकर है। चूंकि पत्रकार हैं,इसलिए सांप सीढ़ी वाली सियासत   और आम आदमी की छटपटाहट से परिचित हैं। डाॅ बृजेश त्रिपाठी ने गहराई से किताब को पढ़कर किताब की समीक्षा की है।

स मकालीन कविता सा तेवर और अंदाज है,रमेश कुमार ‘रिपु’ के दूसरे ग़ज़ल संग्रह बज्म-ए-हयात में ।जो कि एक वर्ष बाद आया।शीर्षक का यदि शाब्दिक अर्थ देखें तो वह जीवन के मंच से ताल्लुक रखता है। पेशे से पत्रकार रमेश कुमार‘रिपु’ की ग़ज़लों में अपने समय के हकीकत की वजह से तकरार और इसरार दोनों है। इनका अंदाजे-बयां अलग हटकर है।  चूंकि पत्रकार हैं,सांप सीढ़ी वाली सियासत का अंदाज और आम आदमी की छटपटाहट को देखकर तल्ख अंदाज़ में वे कहते हैं-

हमारे वतन में यारों,जब भूखमरी आबाद है
गांधीवाद की बात, मुल्क में बे-बुनियाद है
सियासी लिबास उतार दें,तब आप समझेंगे
ये चश्में-अश्क नहीं,जख़्मे दिल के मवाद हैं
ये अशयार बताते है कि उनके सामाजिक सारोकार स्पष्ट हैं।यहां सियासत और सत्ता की तल्ख सच्चाई है। ‘रिपु’ की ग़ज़लें एक ऐसे वातावरण की संरचना करती हैं जहां, सहाफ़त,समंदर,नारेबाजी,विकास,मज़हब,सियासी,पर्यावरण,परिदें,मौत,जिन्दगी,कश्मीर, हिन्दुस्तान,सफ़र,पांव,बरगद,मनरेगा,सरपंच,पटवारी,आदि ऐसे बिम्ब हैं जो सब निचोड़ कर रख देते हैं। हमारे समय की हकीकत है बज्मे-हयात। इनकी अभिव्यक्ति का यह संसार पाठक को अपनी ओर खींचता है।
संसद की मजबूरी,ये कह भी नहीं सकती
कुर्सी के लिए कौन, दंगे फ़साद कराता है
अपनी दादागिरी,यूं सरे बाज़ार दिखाता है
है नहीं उंगलियां, मगर उंगली दिखाता है
पत्रकारिता से गहरा संबंध होने के बावजूद बज्म-ए-हयात के माध्यम से वर्तमान समय के संकट, विद्रूपताएं, समय के सवाल और राजनीतिक विसंगतियों के अनेक चित्र उकेरे हैं। साहसी इस अर्थ में कि सत्ता की विद्रूपताओं और विसंगतियों को इंगित करना और आम आदमी के पक्ष में खड़ा होना समय के किसी भी कालखण्ड में साहस का काम होता है।
सियासत के लबों पर, नारों की मुस्कान
रोटी के लिए,अनशन पर बैठा हिन्दुस्तान
गुंडे मवाली की बातों में खत्म हुई संसद
घोटाले की सड़कों पे, फिसला संविधान
इतिहास पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि सिर्फ साहित्यकार ही नहीं,अपितु पत्रकारों के रचनात्मक लेखन ने भी साहित्य जगत की श्री वृद्धि में भी अहम भूमिका निभाए हैं। इस संग्रह को पढ़ते हुए ग़ज़ल की नई तहजीब और नए अंदाज में प्रस्तुतीकरण अपनी ओर बरबस ही ध्यान आकृष्ट करता है।साहित्य कठिन से सरल की ओर अभिव्यक्ति का प्रवाह है।यह एक सरल प्रस्ताव है,जिसे सिद्ध करना आसान है,और जिसका खंडन करना भी आसान है। इस संकलन में सियासत पर अधिक अशआर लिखे गए हैं। आम आदमी के प्रेम और ज़िन्दगी में भी सियासत की छाया है।-
कागज की नाव नदी में चला के देखो
पहली मुहब्बत है,तो अजमा के देखे
अच्छे दिनों का खिलौना,तुम्हें मिला है
खामोश क्यों हो,अब इसे बजा के देखो
वर्तमान समय राजनीति की तस्वीर बदल गयी है।यह वजह है कि सियासी औजार के रूप में भ्रष्टाचार,अनाचार,चोरी, लूट, हत्या, दुष्कर्म और भयादोहन ब्लैकमेलिंग आदि अधिक हो रहे हैं।समाज में दंगे फसाद,नफरत की राजनीति झूठ झांसों का तिलिस्म फैलाया जा रहा है।जनप्रतिनिधि बनने के लिए हत्या,लूट,जालसाजी के केस दर्ज होने पर ही टिकट और वोट मिलते हैं,इस विसंगति पर कटाक्ष करते हुए ‘रिपु’ लिखते हैं कि-
अस्मत लुटेरों को बचाने का, हुक्म हुआ
चोर, उचक्के, बदमाश भाते हैं सरकार को
कातिल भी हैं,दुःशासन भी हैं,संसद कक्ष में
कोई द्रोपदी आए, श्राप दे इस सरकार को
राजनीतिक संदर्भ में शायर की चेतना अन्य ग़ज़लकारों से कुछ अलग जान पड़ती है।एक रचनाकार के रूप में पत्रकार समाज के प्रति अधिक संवेदनशील होता है।इसलिए ‘रिपु’ बखूबी जानते हैं कि सत्ता का वास्तविक चाल,चरित्र और चेहरा क्या है या उसके काम करने का तरीका क्या है।यदि सियासत अपना काम ईमानदारी से करती तो शायद लेखक को उसे आईना दिखाने की जरूरत न पड़ती।सत्ता को आईना दिखाना बहुत ही हिम्मत का काम है। जिस लेखक में व्यक्तिगत ईमानदारी का तत्व विद्यमान नहीं है उसका लेखन महज दिखावा है।सियासत की ईमानदारी पर प्रश्नांकन करते हुए कहते हैं-
सहाफत रखैल हो गई अब सियासत की
आठवें कालम में है ख़बर आदमियत की
जो ग़ज़ल वोदका पी चुकी है, उससे पूछो
रोटी के लिए सरकार से,कब बगावत की।
बात-बात पर एक दूसरे का विरोध करने वाली संसद अपने फायदों के मुद्दों पर एकमत हो जाती है। तंत्र के इस दोहरे चरित्र को बेनकाब करते हुए व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखते हैं-
सांसदों के पगार पे हुई संजीदा गुफ़्तगू
और मँहगाई, गरीबों के नाम लिख दिया
सहाफी के अंदाज़ पे खफ़ा है सियासी
धोखेबाज़ हंै ये बात सरेआम लिख दिया
एक वह भी वक्त था जब आदमी इंसानियत के खातिर अपने आपको कुर्बान कर देते थे आज अपने स्वार्थ के लिए वो बदल गया है।द्वेष कुटिलता और स्वार्थपरता उसके चरित्र में अंदर तक समाहित हो गया है।जिन्दगी की तल्ख सच्चाइयां हैं और कहने का सलीका तीखा है। मसलन –
उनका दावा है,मुल्क में गरीबी कम हो गई
हकीकत ये है कि, जिंदगी मातम हो गई
सरपंच के घर में, मनरेगा की लाज लुटी
हरिजन टोले में, विकास बेलबाटम हो गई
फाके में दिन गुजरे बीपीएल में नाम नहीं।
हरिया मरा, नेता की आँखें नम हो गई
इक्कीसवी शताब्दी तक आते-आते गजल ने प्रेम और श्रृंगार के साथ ही साथ आम आदमी की वेदनाएं उसके दुरूख-दर्द सामाजिक विषमता, आपसी द्वेष और जीवन की त्रासदी को भी प्रमुखता से अपना विषय बनाया। नए ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल को परम्परागत रूप से बाहर निकालकर समसामायिक जीवन संदर्भों से जोड़ा है। विषम और विकृत व्यवस्था पर ‘रिपु’ की ग़ज़लें सवाल उठाती हैं। और सामाजिक सरोकार को निभाते हुए उनकी ग़ज़लें सच्चे अर्थ में अपना धर्म निभाती हुई परिलक्षित होती हैं।
मुल्क में सत्ता की दादागिरी दिखाने वाले
हाथ की सफ़ाई से दंग हैं, चिल्लाने वाले
विपक्ष का नहीं,वो आम आदमी है साहेब
विकास का फटा पोस्टर, दिखाने वाले
सत्य को जानने के लिए गहराई में उतरना आवश्यक है क्योंकि सत्य कभी भी छिछला नहीं होता।‘रिपु‘ की ग़ज़लों में वर्तमान की हकीकत को हूबहू बयां करने का अदम्य सामर्थ है। मानवीय गुणों को पुर्नस्थापित करने की दिशा में जैसे संजीदा और जिम्मेदार रचनाकारों को पढ़ना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि आने वाले समय की सार्थकता तथा निरर्थकता को तय करने और भविष्य को सुंदर बेहतर और सार्थक बनाने में ऐसा साहित्य ही कारगर है।एक उदाहरण देखें-
उस राह पर चलें,जहाँ दो दिल जुड़ जाते हैं
वो बातें न करें, जिससे रिश्ते बिगड़ जाते हैं

अनुभूत सत्य को ही साहित्यकार अपने शब्दों में पिरोकर कहानी कविता, गजल, व्यंग्य आदि रचना के रूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है।ऐसी रचनाओं में रचनाकार का निजी दृष्टिकोंण सृजनात्मक कौशल विश्वास और वैचारिकता समाहित रहती है।साहित्य समाज सापेक्ष होता है इस कारण से उसकी सात्विकता को बनाए रखना साहित्यकार की अहम जिम्मेदारी है।अंधानुकरण और आधुनिकता की आँधी में हम अपने संस्कारों से जुदा होते जा रहे हैं यह भी ‘रिपु’ की चिंताओं में शुमार है।माँ के निश्छल और निरूस्वार्थ प्रेम को अपनी गजलों में रेखांकित करते हुए कहते हैं-
माँ की कथरी में हीटर सी गर्मी थी
सीमेंट के घर रजाई में भी काँपते
किताबों की इबारत में भूल गए हम
आम सी खट्टी और मीठी-मीठी बातें
साहित्य का आधार भी समाज होता है और लक्ष्य भी समाज होता है।समय के कालखण्ड में शोषणकर्ताओं के चेहरे बदलते हैं शोषण का अंदाज नहीं बदलता । वर्तमान समय में तरह-तरह के माफिया सक्रिय हैं।भूमाफिया रेत माफिया शिक्षा,माफिया आदि। ऐसा लगता है जैसे माफियागिरी भी कोई व्यवसाय हो गया है।इन्हीं भ्रष्टाचारी मगरमच्छों के खतरों का जिक्र मनोरंजक अंदाज में करते हुए लिखते हैं
समंदर की मछलियाँ नमकीन हो जाती हैं
जवानी में ग़ज़लें और हसीन हो जाती हैं।
पटवारी की रहमत का ये असर है मियाँ
हमारे नाम सरकारी जमीन हो जाती है
‘रिपु’ की गजलों की भाषा सरल, सपाट, सर्वग्राह्य और जटिलता, औपचारिकता, व्यावहारिक और कृत्रिमता से मुक्त तथा यथार्थ की भूमि पर प्रतिष्ठित है।वे देश की राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक और सांस्कृतिक अव्यवस्था से दुखी होते हैं।समाज में हो रहे अत्याचार, अनाचार, अन्याय, भ्रष्टाचार और अन्य विसंगतियाँ उनकी रचनाओं का प्रेरणा स्त्रोत हैं।फलस्वरूप उनकी भाषा में स्पष्टवादिता और तीखापन दिखाई देता है।‘रिपु’ की लेखन की संभावनाओं का आकाश विस्तीर्ण है।हर भारतवंशी की तरह शायर भी देश में अमन, चैन और समृद्धि चाहते हैं।दुआ कुबूल हो जाए यही हम सबकी चाहत है-
आओ दुआ करे,सियासी आदमी हो जाए
मुल्क की जमीं, थोड़ी हरी -भरी हो जाए
मुहब्बत का ताजमहल यादों का मकबरा है
तेरा  मेरा   प्यार, गंगा  गोदावरी  हो  जाए

– डाॅ बृजेश त्रिपाठी
महासचिव,
प्रगतिशील लेखक संघ,
इकाई.रीवा म0प्र.486001
मोबाइल.9827303880
ई.मेल- drbrijeshrewa/gmail.com