राष्ट्रमत न्यूज,रीवा(ब्यूरो)। हाल ही में साहित्यकार, कवि विनोद कुमार शुक्ल, नासिर अहमद सिकंदर, अवधेश प्रीत और ज्ञानरंजन ने एक के बाद एक हमसे विदा ली है। इनको श्रद्धांजलि देने के लिए शिल्पी उपवन स्थित प्रो. सेवाराम त्रिपाठी के घर पर उनकी स्मृति में एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें दिवंगत साहित्यकारों को याद करते हुए उनको श्रद्धांजलि दी गई ।
ज्ञानरंजन बारीक विश्लेषण करते हैं
इस अवसर पर ज्ञानरंजन को याद करते हुए प्रो.सेवाराम त्रिपाठी ने कहा कि- ”ज्ञानरंजन की भाषा इतनी सधी हुई होती है कि हर शब्द और वाक्य का महत्व होता है । वे बारीक विश्लेषण करते हैं । वे अच्छे कथाकार और अच्छेे संपादक थे । रचनात्म्क कार्यक्रमों में उनकी अनुपस्थिति भी उपस्थिति का अहसास कराती थी ।” विनोद कुमार शुक्ला के विषय में प्रो0 त्रिपाठी ने कहा कि उनकी भाषा विन्यास और लहजा अलग था । उनके दो रूप थे एक कवि का एक कथाकार का । उनकी कविताओं को समझने के लिए बहुत धीरज चाहिए । विनोद कुमार शुक्ल वैचारिक रूप से मुखर नहीं रहकर अपनी रचनात्माकता की धुन में रहते थे । नासिर अहमद सिकंदर बहुत मुखर थे । कथाकार अवधेश प्रीत से अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए प्रो0 त्रिपाठी ने कहा कि कार्यक्रमों में मेरी उनसे मुलाकात हुई थी । वे संवेदनशील रचनाकार थे ।
मुझमें जो पढ़ने की आदत है
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कथाकार सुधीर कमल ने कहा कि- ”इस तरह की रचनात्मक संगोष्ठियाँ होती रहनी चाहिए, जिससे हमारा वातावरण जीवंत रहे ।” कथाकार विवेक द्विवेदी ने ज्ञानरंजन से जुड़े अनेक संस्मरण सुनाए तथा अवधेश प्रीत से हुए परिचय की चर्चा की । उन्होंने कहा कि मुझमें जो पढ़ने की आदत है, उसका श्रेय ज्ञानरंजन को जाता है । रीवा इकाई के अध्यक्ष कथाकार लालजी गौतम ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि- ”ज्ञानरंजन ने मात्र ढ़ाई दर्जन कहानियाँ ही लिखी हैं, जिनमें से घंटा, फेन्स के इधर और उधर तथा पिता कहानी मील का पत्थर साबित हुई है ।” फेन्स के इधर और उधर मध्यमवर्गीय जीवन की आत्म मुग्धाता जाहिर करती है ।
वाचन से विमर्श की शुरूआत हुई
कथाकार ओम प्रकाश मिश्रा के द्वारा दाम्पंत्य कहानी के वाचन से विमर्श की शुरूआत हुई । उन्होंने कहा कि ज्ञानरंजन के द्वारा पहल पत्रिका का संपादन किया जाना अप्रतिम है । इकाई के महासचिव बृजेश त्रिपाठी ने कहा कि लेखक की सफलता इस बात में है कि वह पाठक को कितना जोड़ सकता है । दाम्पत्य कहानी को सुनते समय पति-पत्नी के बीच के अंर्तसम्बन्धों का रेखांकन किया जाना ज्ञानरंजन के लेखन के शिल्प की विशेषता है । ज्ञानरंजन संपादकों के संपादक थे । उन्होंने समस्त लेखकों को श्रद्धांजलि अर्पित की । अन्त में इस गोष्ठी में उपस्थित सभी विद्वतजनों का आभार प्रदर्शन के साथ गोष्ठी का समापन किया गया ।