चाँद चाहता था,कि धरती रुक जाए - rashtrmat.com

 चाँद चाहता था,कि धरती रुक जाए

तरुण भटनागर की कहानी में एक संदेश है। किसी समाज को खत्म करना है,तो उसकी सस्कृति को नष्ट कर दो। घोटुल प्रेमी आदिवासियों के हाथ में बंदूक देकर लोगों ने उनकी पहचान खत्म कर दी। इसीलिए चाँद कहता था धरती रुक जाए। नक्सलवाद खात्मे के कगार पर है। लेकिन मार्क्स वाद ने  आदिवासियों की जमीन पर विचारों का जो बारुद बिछाया है,उसके बीच चांद जो कहता है वो कितना सच होगा कोई नहीं जानता।

                                                                     कहानी

चाँद चाहता था,कि धरती रुक जाए

गांँव में अंधेरा था। बस्तर के नक्शे पर आज भी उस गांँव का नाम नहीं दिखता। वहांँ अंधेरा है। गांँव जंगल मंे था। जंगल गांँव में था। दोनों के अँंधेरे एक-दूसरे में थे। दोनों अपने अंँधेरों को बांँटते थे। वहाँं अंँधेरों की कोई लड़ाई नहीं थी। वह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। वहांँ अंँधेरे बाँंटने का शऊर था।

हम रात का आकाश ताकते। आकाश रौशनी लाता। चांँद के साथ बढ़ती और घटती रौशनी। पिता कहानी सुनाते, कि बहुत दूर एक लोक है। इसी धरती पर। वहांँ बिजली नाम की चीज है। दीवार पर एक छोटा सा खटका दबाओ और फिर चाँंद भी फीका पड़ जाए। रात दिन हो जाए। पिता की बात हमें गप्प लगती। गांँव में मेरा कोई सहपाठी नहीं मानता, कि ऐसा होता है, कि आकाश के अलावा भी कहीं से रौशनी आती है। कैसी निरी गप्प ।

ठण्ड में बाहर आग जलती। मांँ घर में ढिबरी जलाती। ढिबरी किसी बिन्दु की तरह दिखती। घना अंधेरा उसे बिन्दु बना देता। आग अंधेरे में घुलती जाती। रात को बाहर बैठा मैं आग का अंँधेरा होना बहुत गौर से देखता।

जंगल में अंधेरा बहुत पहले से था। जंगल के अंधेरे का कहीं कोई इतिहास नहीं। कहते हैं संसार में अंधेरे की शुरुआत बस्तर के जंगलों से हुई। अबूझमाड़ में एक अनाम जगह है,जहांँ जंगल के लोगों के अलावा कभी कोई जा नहीं पाया। बस वहीं से अंधेरा फूटा था। फिर वह फैलता गया। कहते हैं रात के काले आकाश से लेकर आज के वैज्ञानिक जिस ब्लैक होल की बात करते हैं वह वहीं से आया है। यकीन करें बस्तर के जंगल न होते तो यह दुनिया हमेशा के लिए अंधेरों से वंचित हो जाती।

किस्सा यूंँ है, कि यहीं से जंगल के लोगों का पहला देवता आया। उसका नाम आंगा देव था। उसकी पीठ पर सारे संसार का अँंधेरा रह आया है। एक बार मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था, कि मैं उसे गौर से देखूंँ। मुझे उससे दूर तक फैलती अंँधेरे की लकीरें दिखाई देंगी।

कहते हैं आंगा देव हर छोटी से छोटी रौशनी को देख सकता है। सुई की नोंक से भी छोटी और एक तुच्छ तारे से भी कम शक्ति वाली रौशनी भी उसकी नजरों से नहीं चूकती। कहते हैं हर पाप के साथ एक रौशनी होती है। हर दुष्कर्म के साथ एक प्रकाश चलता रहता है। आंगा देव सब देख लेता है। जंगल के लोग अंधेरे को पूजते हैं। उसको शराब का तर्पण करते हैं। बलि चढ़ाते हैं। उन्हें नहीं पता कि वे संसार में एकमात्र ऐसे लोग हैं, जो अँंधेरे को भगवान जानते हैं। जंगल का आदमी बताता है,कि जब दुनिया में कुछ भी नहीं था तब एक चीज़ थी। उसका नाम अँंधेरा था। अंँधेरा उससे भी गहरे अंँधेरे से निकला था और यह जंगल के लोग ही जान पाये कि यही अंँधेरा घनीभूत होता गया और आज की दुनिया बनी। कहते हैं आंगा देव न होता तो काला रंँग न होता । पता नहीं कैसे तो वह जान गया था, कि भविष्य में उदास आँखों,पतले साँंवले चेहरे वाला एक कवि होगा और उसे लिखनी होगी एक कविता ‘अंधेरे में’। उसे पता था,लाखों साल बाद संजय लीला भंसाली को बनानी होगी ‘ब्लैक’। उसे नहीं पता कि अगर वह न होता, तो ना होती छाया, न शीतल छाया, न रात…..। माड़िया ज़बान में अंँधेरे के लिए असँंख्य शब्द हैं।

आंगा देव कभी रौशनी ढूंँढ़ने निकलता है। हर पाप के साथ लुकती-छिपती, दुनिया को भरमाती रौशनी। हर तरह की रौशनी, जिसने संसार को दुःख दिए। वह अपने आप चलता। कुछ लोग उसे कंधे पर उठाते हैं और वह चल पड़ता है। किसी बहुत छोटी सी रौशनी को वह अचानक ढूंँढ़ लेता है। जब वह गुजरता है रोडें सूनी हो जाती हैं। बस्तियांँ वीरान। असंँख्य रौशनियों को छिपाये घरों के दरवाजे बन्द हो जाते हैं। आंगा देव अचानक किसी दरवाजे के सामने रुकता है। कोई दरवाजा खोलता है। भीतर से वह बाहर आता है। वह अपना पाप स्वीकार कर लेता है। सारी दुनिया से माफी माँंग लेता है। अंधेरा जीतता है। रौशनी की दुनिया बेनकाब हो जाती है।

जंगल हमेशा से खड़ा था। छाती फुलाए। उसके भीतर उसका अंधेरा था। अंँधेरे वाले संसार का पहला देवता भी। अंधेरे वाले जंगल को किसी से डर नहीं लगता था।

वह बुजुर्ग आदमी बहुत गहरे जंगल में रहता था। वह एक बड़े घोटुल की देखभाल करता था।

घोटुल में दूर-दूर के लड़के-लड़कियांँ रहते थे। जंगल की अनाम पगडंडियों के रास्ते आये लड़के-लड़कियाँ। वे शाम को एक अजीब से देवता की पूजा करते । उसका नाम लिंगो था। फिर रात को घोटुल के सामने आग जलाई जाती। ऊँची विशाल आग। लड़़के-लड़कियाँ छककर महुआ की रासी या लांदा पीते। नशे में सब कुछ खो देने की हद तक। देर रात तक आग के चारों ओर वे सब नाचते। लड़के अपने सिर पर जंगली भैंसे के सींग लगाते। चेहरे पर नदियों के किनारों से बटोरी गई कौड़ियों की माला डालते। कोई मादर बजाता, कोई भोंगा, कोई रामबाजा, कोई जमीन पर पैर से थाप देता, कोई तरह-तरह की आवाज़ करता, कोई ताली बजाता, बाकी जोर जोर से गाते। लड़का-लड़़की एक-दूसरे के कमर में हाथ डालकर लम्बी लाइन बनाते। आग के चारों ओर वह लाइन गोल गोल घूमती। लड़़का-लड़की के पाँव एक साथ उठते, एक साथ गिरते। पहले यह सब धीरे-धीरे होता, और फिर धीरे-धीरे तेज होता जाता। आग की रोशनी में सारा जंगल चमक उठता। एक-दूसरे के कमर में हाथ डाले। मद में डूबे एक दूसरे के जिस्मों को थामे। इस तरह बेपरवाह नाचते जैसे कोई मशीन चल रही हो। जो बिना थके, बिना रुके बरसों तक ऐसे ही चलती रहेगी।

एक मोटयारिन (घोटुल की लड़की) दूर जंगल से आई है। जब वह बड़ी हुई तो जंगल के लड़के उससे बाल संँवारने की मनुहार करते। वह उन लड़कों के बाल संँवारती। युवा लड़के लंबे बाल रखते। उनके लंबे बालों को वह करीने से काढ़ती। पानी से उसे चिकना और सपाट करती। जिस लड़के से उसे इश्क़ हो जाता उससे वह लकड़ी का कंँघा माँगती। गाँव की परंपरा है, प्यार की बरसों पुरानी परंपरा कि कंँघी लड़का लाकर देगा। उसे महुआ कि मुलायम लकड़ी का कँघा पसंँद था। आशिक के कमर में हाथ डाल उसकी आँखों के पार देखते हुए उसे बस यह ही चाहिए होता था। महुए की लकड़ी का कंघा। लड़का जंगल-जंगल घूमता। महुए की मुलायम लकड़ी ढूँढ़ता। कुल्हाड़ी से काटकर उसे लाता। इत्मिनान से कुल्हाड़ी की तेज धार से छीलकर लकड़ी को पतला करता। उसे काटता। दाँते बनाता, बेहद करीने से, मगन, आँखें गड़ाये….। कभी सोचता कि कँंघे पर क्या निशान बनाये। कोई फूल, कोई पंछी, कोई जानवर या ऐसा ही कुछ और….कुल्हाड़ी की नोक से कँंघे के ऊपरी सिरे को कुरेद-कुरेदकर कोई प्रतीक बनाता….। यह प्रतीक बताता है कि किस लड़के ने यह कंँघा मोटियारिन को दिया। मोटियारिन की जुलपिन (लड़कियों के बालों का सपाट हिस्सा जिसमें हेयर पिन लगाया जाता है) में चार कंँघे धंँसे हैं, हर कंँघे की एक कहानी है।

जंगल आंँखें फाड़ पागलों की तरह नाचती उन देहों को घूरता। बेखून देखता। एक साथ उठते और जमीन पर धमकते सैंकडों पैरों से धरती कई किलो मीटर तक कांँपती जाती। मादर पर पड़ती सख्त लकड़ी की चोट और जमीन पर से उड़ते धूल के गुबार उठाते दसियों मजबूत पैर……..धरती हर थाप पर बेतरह कांँपती। धरती का भयानक कंपन जंगल के हजारों हज़ार पेड़ों को कपकंपा देता। डालियाँं,पत्तियांँ कँंपकपाती। पेड़ों पर सोते पंँछी अचानक उड़ जाते। चांँद फटी-फटी आँंखों से संसार के गहनतम अंधेरे का वह मादक और पागलपन की हद तक उत्तेजित कर देने वाला दृश्य देखता। उसे लम्बे उलझे पसीने से भींग कर कंधों और गरदनों पर टकराती और पसीने की बूंँदेें झटकारती बेखौफ और नशे में चूर बालों की लटें दीखतीं। चारों ओर फैलती, झटकती, अटकती, चूती बेतरतीब आवारा काली धूल भरी लटें। नशे में चूर बेपरवाह नशीली आँखों को देख तारे शर्मा जाते। चांँद आज ढलकना नहीं चाहता। वह चाहता है कि धरती रुक जाये और वह वहीं टंँगा-टंगा इस मांँसल मादकता का भोग करता रहे।

ताल, आवाज़ और नशा बढ़ता जाता। जांँघों तक धूल से सने मजबूत काले पैर जमीन को रौंद डालते। धूल के गुबार अंधेरों को चीरते चारों ओर फैलते, झाड़ियों पर, पेड़ों पर, आकाश पर। जिस्म के हर नंगे हिस्से पर धूल की परत पर परत चढ़ती जाती, पसीने में घुलकर बहती, ज़मीन पर चूती। एक ही गीतमय आवाज़ को बार बार बेतरह दुहराते सैंकड़ों कंठ..। छाती हिला देने वाली मादर की बेलौस थाप और थर्राती भोंगे की आवाज़ पर सुदबुध खो चुके जवान जिस्म मशीन होकर लगातार नाचते जाते, अंतहीन और उत्तेजक। आग की लौ में चमचमाती काली मजबूत देहों का एक सैलाब सा गुजरता जाता। रेले की हुँकार भरे शब्दों में पिरे माडिया गीतों के साथ जो मादर की धमक पर कँंपकँंपाते से गूँजते पूरे आकाश में। आग की दहक में देहों की सटीक खूबसूरत लाइनें, गोलाइयांँ चमकतीं, झटके के साथ गोल गोल घूमती,एक साथ आगे पीछे डोलतीं पूरे बल के साथ, एक साथ सिर सामने आते, एक साथ छातियाँ और फिर एक साथ पैर, गहन नशे और बेपरवाही में चूर। चारों ओर पसीने, धुएँ और शराब की गंध फैलती। पसीने की गंध बहुत गहरे जंगल तक जाती। जंगली भैंसे और कुछ खूंँखार जंगली जानवर उस गंध को सूंँघते वहां खिंचे चले आते। पेड़ों के पीछे डर कर छिपकर वे इस कामोत्तेजक नृत्य को घूरते। मिट्टी और अंधेरे की देह। सूत दर सूत तराशी गई देह। जिसका जरा सा भी मांँस इधर से उधर होकर दैवीय रेखाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता ।

बुज़ुर्ग के पास एक बाहरी आदमी बैठा है। सबसे उत्सुक बाहरी आदमी,जो जंगल आया है। जो जंगल की ज़बान समझता है। एक अजीब सा वाकया हुआ, जिसे बुज़ुर्ग और वह बाहरी आदमी भर जानते है। उसके बाद से बुज़ुर्ग उस बाहरी आदमी से डरता है। बाहरी आदमी उनकी दुनिया की आवाज़ को बूझता है। बुज़ुर्ग उसकी बात नहीं समझ पाता।

अगर अभी नहीं संभले तो एक दिन वे सब तुम्हें जंगल से खदेड़ देंगे। देखना तुम। जंगल की सीमा तक तो वे आ ही चुके हैं।’

‘‘वह क्यों खदेडे़गा..? हमने उसका क्या बिगाड़ा..?’ बुजुर्ग किसी बच्चे सी मासूमियत के साथ पूछता है।

‘‘दुनिया बहुत क्रूर है। तुम लोगों को नहीं मालूम। जंगल से बाहर निकलो तो कुछ पता भी चले।’’

बाहरी आदमी पिछले बीस सालों से यही सब इन लोगों को समझा रहा है। पर लोग समझ नहीं पा रहे हैं। उसकी बात एक अजीब सी बात पर पहंुँच कर खत्म होती है ।

‘‘हम सब एक साथ चलेंगे,लाल किले पर यह लाल झण्डा फहराने,तुम लोगों का तब साथ होना बहुत जरुरी होगा।’’

बुज़ुर्ग मन ही मन सोचता है,वह क्यों जाए? जाने कहांँ है,लाल किला और पता नहीं क्यों वहांँ पर यह लाल कपड़ा फहराना है.। वह उस लाल कपड़े और उसमें लिपटे उस हथियार को देखता है, जिसे वह बाहरी आदमी गन कहता है। जंगल के लोग उसे आग वाला धनुष कहते हैं। एक बार वह बुज़ुर्ग को साथ ले गया था, बहुत गहरे जंगल। उसके साथ बहुत अंदर का एक दूसरा जंगली आदमी भी था, जिसके लिए लाल किला और लाल कपड़ा बेहद बेतुकी चीज थी। वह उसे बुज़ुर्ग से भी ज्यादा बेतुका मानता था। उस दिन उस बाहरी आदमी को उस दूसरे जंगली आदमी पर इतना गुस्सा आया,कि उसने उसे गोली मार दी। बुज़ुर्ग के सामने वह खून से लथपथ गिर पड़ा। बुज़ुर्ग वहांँ से भाग आया। तबसे बुज़ुर्ग उसकी हांँ में हांँ मिलाने लगा है।

बुज़ुर्ग उसकी बात समझ नहीं पाता। जब वह उसे बताता है,कि एक देश है। उस देश का नाम भारत है। तुम्हारा जंगल भी उसी देश में आता है। उस देश में दो तरह के लोग हैं। अमीर लोग और गरीब लोग। अमीर लोग गरीबों का शोषण करते हैं। तुम लोग भी गरीब हो। तुम्हारा भी शोषण होगा। बुज़ुर्ग को गरीब शब्द का मतलब नहीं पता। वह इस शब्द को ठीक-ठीक नहीं समझ पाता। क्या जंगल से कभी खाने को कुछ ना मिल पाना गरीबी है..? जरूरी नहीं, कि मकान हो, बताओ भला मकान किसके पास है, फिर रहने को कितनी जगह चाहिए,…..कितना तो अजीब शब्द है गरीब..। बुज़ुर्ग को सही-सही पता है,कि बाहर की दुनिया को जो चाहिए उसमें से कुछ भी उनके पास नहीं,फिर वे उन्हें क्यों परेशान करेंगे? बाहरी आदमी कहता,कि वे तुम्हारा पूरा जंगल काट लेंगे….वह अंतहीन जंगलों को घूरता। उसे यकीन न होता। उसके जैसे सैंकड़ों लोग हैं बस्तर के जंगलों में जिन्हें अब तक गरीबी का मतलब समझ नहीं आया। उसने एक बार एक दूसरी मोटियारिन को टोका था, जब वह ब्लाउज़ पहनकर आई थी। दूसरी लड़कियाँ उसे देखकर हँस रही थीं। उसके वक्ष ब्लाउज़ से ढंके थे। वह खुद भी शरमा रही थी। आज तक ब्लाउज़ नहीं पहना। आज पहनी है, तो खुद पर शर्म आना लाज़मी है। अगर गरीबी का यह मतलब है, कि कपड़े ना हों तो इससे क्या अंतर पड़ता है? ना हों तो ना हों! बिना कपड़ों के कौन सा कष्ट…। बुज़ुर्ग को एक किस्म का दंभ है, कि जंगल की नग्नता बाहरी दुनिया के कपड़ों से बेहतर है, फिर क्यों खुद को गरीब कहा जाए।

‘‘हम सिर्फ इसलिए तो गरीब नहीं कि हम कपड़े नहीं पहनते।’’

वह पूछ लेता है। उसे उस बाहरी आदमी से डर लगता है। उसके हाथ में आग फेंकने वाला धनुष है, पर फिर भी वह पूछ लेता है। जंगल के एक दूसरे आदमी ने उसे बताया है, कि इन लोगों को माओवादी कहते हैं। कितना अजीब शब्द है यह ‘‘माओवादी।’’ ऐसे शब्द जंगल में कहाँ।

वह आदमी एक गीत गाता है और उनकी आवाज़ में उस गीत का मतलब बताता है,‘‘हम होंगे कामयाब,एक दिन,मन में है विश्वास…।’’वह पूछना चाहता है,कौन सी कामयाबी,कौन सा दिन और कौन सा विश्वास….। पर वह चुप्पी लगा जाता है। उस आदमी को घूरता है। कितने तो अजीब हैं, इस आदमी के कायदे ।

पर उस दिन उस आदमी की बात सुनकर वह डर गया।

‘‘घोटुल का बंद होना जरूरी है।’’

‘‘मतलब ।’’

‘‘घोटुल तुमको तुम्हारी जड़ से जोडे़ रखता है..। जड़ मतलब नर्क। तुम्हारा नर्क…..।’’

‘‘यह पाप हो जायेगा ।’’

‘‘यही तो तुम लोग नहीं समझते हो। जब यह बन्द होगा तभी तुम समझ पाओगे कि गरीबी और शोषण क्या है ?’’

‘‘गरीबी..!’’

‘‘हांँ गरीबी। घोटुल के बन्द होने से ही यह शब्द तुम समझ पाओगे । तुम्हारा नर्क तुम्हें यह शब्द नहीं समझने देता है..!’’

‘‘नर्क कुछ नहीं होता ।’’

‘‘होता है। जरूर होता है। तुम्हारी दुनिया नर्क है..। घोर नर्क….क्यों कि, क्यों की इसमें विचार के पनपने की कोई गुंजाइश नहीं।’’

बाहरी आदमी ने घृणा से लिंगो के देवस्थान और उस बुजुर्ग को देखा। उसके चेहरे पर थकान के ऊपर तैरता गुस्सा था। बुज़ुर्ग डर गया। उसने डरते, झिझकते हुए पूछा। वह न पूछता अगर मामला घोटुल का ना होता ।

‘‘विचार ?’’

‘‘विचार एक पहेली। कितनी अजूबी और बेठौरी आवाज़ है विचार..! विचार एक उलझा हुआ डर..! विचार,कितना तो अबूझ,बूझ सके तो बूझ। विचार जिसे जानने के लिए कितना हताश और उतावला घोटुल का बुज़ुर्ग ।

‘‘तुम……( उसने एक भद्दी सी गाली दी), शताब्दियों से एक सा काम करते आए हो, तुम क्या समझोगे विचार..। जब कुछ नया करने का जतन ही नहीं, सलीका ही नहीं तो तुम…( उसने फिर एक भद्दी सी गाली दी) खाक समझोगे इसे…?’’

‘‘फिर भी, बताते तो ठीक रहता।’’

उसने घृणा और क्रोध से उसे देखा। फिर कुछ सोचा। उसे खुद पर कोफ़्त हुई, जाने वह किसे और क्या तो समझा रहा है। पिछले कितने तो दशकों से समझा रहा है। हर बार हार उसकी ही होती है।

‘‘हर चीज़ की जड़ है पैसा। तुम्हारी….( इस बार वह भद्दी सी गाली देते देते रुक गया), दुनिया में संपत्ति तो है नहीं। बिना संपत्ति के विचार आये भी तो कहांँ से..?’’

अब बुज़ुर्ग विचार से पहले संपत्ति को समझना चाहता था। पर चुप रहा। उस बाहरी आदमी ने जैसे जान लिया कि वह क्या समझना चाहता है।

‘‘संपत्ति यानी जो चीज़ जरूरत से थोड़ा ज्यादा हो.। थोड़ी सी भी। पर तुम लोग तो पेट भर गया, तो बचा मांँस फेंक दोगे। जंगल से कुछ बटोरा जितनी जरूरत हुई प्रयोग किया और बाकी फेंक दिया..। अरे जब तक बची हुई फालतू की चीजों को इकट्ठा नहीं करोगे, तुम्हारे पास संपत्ति कैसे आयेगी..? पूरा ( उसने फिर से ‘माँ’ से शुरू होने वाली एक भद्दी सी गाली दी ) लफड़ा ही यही है । संपत्ति ना हो तो क्या हो मुद्दे का और अगर मुद्दा ना हो तो क्या हो विचार का और विचार ना हो तो क्या हो लाल किले पर झण्डे का….?’

 

‘‘अगर हमारे पास भी पैसा हो जाये, तो संपत्ति हो जाएगी क्या ?’’

बुज़ुर्ग ने चहकते हुए कहा,‘‘ बस्तर के जंगल का आदमी नोट नहीं लेता। नोट बारिश में भीग जाता है। नोट को दीमक खा जाती है। वह सिक्कों की माँग करता है। सिक्के खराब नहींे होते। वे खनकते हैं। लुढ़ककर गोल-गोल चलते हैं। चट्टानों पर गिरते हैं तो खनखना-खनखना कर कितनो को लुभाते हैं। जो बात सिक्कों में है,वह नोट में नहीं। जंगल का आदमी बाँस का एक खोखल रखता है। खोखल उसकी झोपड़ी में लटकता रहता है। उस खोखल में सिक्के होते हैं। पैसों की जरूरत मुट्ठी भर नमक और कुप्पी भर मिट्टी के तेल से ज्यादा नहीं। चंद सिक्कों में यह सब आ ही जाता है।’’

‘‘हम भी पैसा जमा करेंगे। यकीन करें।’’ बुज़ुर्ग ने धीरे से कहा।

बाहरी आदमी को बुज़ुर्ग पर जोर का क्रोध आया। उसने खुद को संयत करते हुए उसे धमकाते हुए कहा,‘‘अच्छा छोड़ो यह सब बकवास बातें। घोटुल बन्द करने की तैय्याारी करो,समझे….।’’

उसने, बुज़ुर्ग को हिकारत से घूरा ।

बुज़ुर्ग उसे भोकवे की तरह ताकता। वह बाहरी आदमी लाल-पीला होता। बैठे ठाले बिना कुछ बोले लाल पीला होता रहता और अचानक अपनी बंदूक उठा लेता। बुज़ुर्ग डर जाता। घोटुल के कुछ जवान लड़कों को उसने बंदूक थमाई। चलाना सिखाया। लड़कों को बंदूक चलाने में मजा आया। पेड़ से फल गिरा लो, चिड़िया मार लो, शिकार को पलक झपकते चित्त कर दो। बंदूक बड़ी मस्त चीज है। पर बुज़ुर्ग को अंदेशा था,कि बंदूक किसी और चीज के लिए लाई गई है, वरना उस दिन उस आदमी को यह बाहरी आदमी गोली क्यों मारता। एक दिन डरते- डरते बुज़र्ग ने उससे पूछ ही लिया।

‘‘किसको मारना है ?’’

उसको इस तरह से पूछना बड़ा अजीब लगा। उसने उसे एक-दो बार माओवादी भी कहा। पर उसके माओवादी कहने पर वह चिढ़ गया। जब मारने की कोई वजह न हो, तो यह कितना अजीब होता है यह पूछना कि किसे मारना है..? कितना-कितना तो आत्मग्लान। कितना तो पीड़ित।

‘‘अबे मारना नहीं है..! क्राँति..। क्रांँति…!’’

क्राँति फिर एक अबूझ शब्द। कितनी बार सुना पर जैसे हर बार नया, कितना अर्थविहीन । पता नहीं इसके मायने जंगल का बुज़र्ग कभी समझे भी या नहीं। वह सोचता, बाहर की दुनिया के शब्द कितने-कितने तो अबूझ हैं। उनकी आवाजें कितनी-कितनी तो अस्पष्ट। बुज़र्ग को बाहर की दुनिया पर दया आ गई। उसे लगता कि न जाने बाहर की दुनिया की आदमी, औरतें और बच्चे ऐसी बुझौव्वल भाषा में कैसे बात करते होंगे। बुज़र्ग को लगता है जैसे क्राँति कोई जन्तु है, जिसे बंदूक से मारना होगा..! जाने वह कैसा होगा..?

बाहरी आदमी पर दशकों से उतरती हताशा अब गुस्सा होकर तारी हो रही है। उसे एकबारगी लगता रहता है, कि जंगल का अब कुछ हो नहीं सकता। अगले दिन सुबह बाहरी आदमी ने हंँगामा कर दिया। बुजु़र्ग चुपचाप बैठा रहा। वह लगातार घोटुल के लड़कों और लड़़कियों को धमकी भरे अंदाज में समझाता रहा। बकता रहा। अंत्तिम बात बस एक ही थी, कि घोटुल बंँद हो जाना चाहिए।

लड़के चले गये। जब लौटे उनके हाथ में वे चार बंदूकें थीं,जो उस आदमी ने उन्हें दी थीं। आदमी खड़ा था। वे चारों आदमी के पास आये और उसके सामने वे बंदूकें जमीन पर पटक दीं। आदमी उन सभी पर लाल-पीला होता वहांँ से चला गया। कह गया जब अबकी बार आयेगा उसके साथ और भी साथी होंगे और तब कोई भी हथियार नहीं पटकेगा। तब सबको मानना पडे़गा कि घोटुल निरर्थक है। घोटुल को बन्द करना समतामूलक समाज के लिए निहायत ही जरुरी है ।

वह देर रात थी। लड़का-लड़की थककर घोटुल में सो गये थे। घोटुल में एक ही कमरा है। एक विशाल कमरा। वे सब वहीं फर्श पर सो जाते हैं। सारे लड़के,सारी लड़कियांँ। किसी की कोई जगह तय नहीं। वह फर्श सबका है। वह बिस्तर साँझा है। उनकी सांँसों और छाती से चिपककर धड़कने वाला बिस्तर। दायरा विहीन बिस्तर।

आग बुझ जाती है। चांँद लुढ़क जाता है। सारा जंगल संँसार के गहनतम अंधेरे से ढँक जाता है। घोटुल के उस कमरे में फिर रौशनी का एक बिन्दु भी कभी घुस नहीं सकता। बुझी आग के पास एक लड़़की उस बुजुर्ग के सामने बैठी है। उसे कई दिनों से खून नहीं आया है। उस लड़की को तय करना है, कि वह किससे गर्भवती हुई है।

पूर्णिमा आयेगी। पूरी रौशनी की रात। आंगा देव उस रात संँसार के सबसे बड़े पाप को बेनकाब करेंगे और लड़की एक लड़के का नाम तय कर लेगी। लड़की उलझी हुई है। वह तय नहीं कर पा रही है, कि वह किस लड़के का नाम ले। लड़की खुश है। उसके भीतर एक ऊँची लहर बार-बार किनारे पर गिरकर फैन बिखरा रही है। वह सोचती है,वह उन लड़कों को गौर से देखेगी,किसी भी समय। कितना तो समय है। कितनी-कितनी तो बेफिक्रियाँ। जब वे नदी में निर्वस्त्र नहा रहे होंगे, रात को बेतरह मशीन होकर नाच रहे होंगे,जंगल से कोई शिकार अपने कंँधे पर लटकाये सीटी मारते, चीखते-चिल्लाते आ रहे होंगे, लिंगो के सामने एक झटके में किसी बड़े से जानवर की गर्दन उसके धड़ से अलग कर टपकते खून को मिट्टी की हाँंडी में इकट्ठा कर रहे होंगे……तब वह उन सबको ठीक से देखेगी। जी भर कर घूरेगी और अगली पूर्णिमा को जब सब आग के चारों ओर इकट्ठा होंगे वह घोषणा कर देगी कि उसे कौन चाहिए और इस तरह वह हमेशा के लिए उसका हो जायेगा। बेदावा उसका। वह उसे अपने साथ ले जाएगी। अभी समय है। वह तय करेगी।

उसे नाज़ है वह लड़की है। उसे नाज़ है,कि सिर्फ वही तय कर सकती है। उसके भीतर से एक हूक उठेगी और वह नाम, वह देह, वह आत्मा उसकी हो जाएगी। उसे उसकी होना पड़ेगा। लड़की का तय किया जंगल का उसूल।

जंगल के कायदे लड़की की बानगी। लड़की की बात, जंगल-जंगल रास्ता। लड़की की नींद, जंगल का मनचाहा सपना। जंगल-जंगल की लड़की का गीत ।

जंगल   में कुछ वर्जनाएँ कभी नहीं बनेंगी। वे जंगल की वर्जना भी तो नहीं। वहांँ कुछ भी नहीं टूटता। प्यार बेतरह समुद्री ज्वार होकर फैलता रहता है। जंगल की मादकता और भड़कता प्यार महासागर का प्यार है, जहांँ तट रेखा नहीं बन पाई है।

 बाहरी आदमी लौटा। अबकी बार वे सात लोग थे। सबके हाथ में हथियार थे। उन्होंने बुजुर्ग को कहा, कि उसे समझना होगा और अगर वह समझ नहीं पाता है,तो भी समझ ले कि समझना ही है,समझ के अलावा अब कोई और समझ नहीं। वे सीधे-सीधे लड़के लड़कियों से बात नहीं करेंगे..। बुजु़र्ग बात करे..। कायदा भी यही है।

ज्ंागल में उन लोगों को कितने ही साल बीत गये हैं। दशकों। अब वे चाहते हैं,कि बिना किसी खून खराबे के लोग मान जाएँ। उन्हें मानना ही होगा आखिरकार वे उनके ही लोग हैं। संसार के सारे मजदूर, किसान और आदिवासी किसी और के नहीं हो सकते ।

बुजु़र्ग डर गया। पहले उसने अकेले समझाया। लड़़के-लड़़कियों को पहले से कुछ-कुछ भान था। एक लडके ने एक दिन बुजु़र्ग को कहा था, कि अबकी बार उनको यहांँ आने नहीं देंगे। ज्यादा हुआ तो मार डालेंगे। बुजु़र्ग ने उसे वह किस्सा बताया, कि किस तरह वह जंगली आदमी,उनकी बिरादरी के आदमी को मारा गया था और कौन जाने वह बाहरी आदमी ठीक ही कह रहा हो, कि वह अकेला नहीं है। जंगल मंे बहुत से लोग हैं, बुजु़र्ग को ही क्या उसे भी सबका ख्याल रखना होगा। यह खतरा नहीं लिया जा सकता है। बुजु़र्ग अकेला समझाता रहा पर लड़के लड़कियाँं मानने को तैय्यार नहीं थे। फिर उन सातों के साथ मिलकर समझाया गया। सब बुजु़र्ग और बंदूक थामे उन सातों को घूरते रहे ।

…..सबसे पहले घोटुल के एकमा़त्र प्रवेश रास्ते पर लकड़ी के लट्ठे खडे़ किये गये। वह बंँद हो गया। उसकी छानी हटाने में दो दिन लगे । बुजु़र्ग कहता था, कि यह सब करने की जरूरत नहीं लोग खुद ही मान जायेंगे। पर वे सातों कहते थे, कि यह काम लड़के लड़कियांँ खुद करें। ऐसा करने पर वे शायद उस बात को समझ पायें जो दशकों से वे उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे हैं।

बुजु़र्ग ने वादा किया, कि आग अब कभी नहीं जलेगी। रात को घोटुल के सामने अंधेरे, वीराने और सन्नाटे की जिम्मेदारी उसे लेनी पड़ी।

….फिर भी घोटुल एकदम से वीरान नहीं हो पाया था। वे लोग रात को वहांँ आ जाते। आग नहीं जलती थी। शराब के मिट्टी के पात्र तोड़ डाले गये थे । वाद्य यंत्र जला दिये गये थे। कुछ लोग बायसन के हार्न और कौड़ियांँ बचा लाये थे। उन्हें उन्होंने उन आदिम झोंपड़ियों में छुपा लिया था, जिसे बरसों पहले उन्होंने छोड़ा था..। घोटुल के बाद उन्हें वापस इन्हीं झोंपड़ियों में जाना था, जो बचपन के बाद उनके लिए निषिद्ध रह आई थीं ।

…. वे सोचते कि वे तो सिर्फ नाचना और गाना चाहते थे। वे कहना चाहते थे, कि जो रोज गाता हो, रोज पीता हो, रोज नाचता हो,….वह एकदम से नहीं छोड़ सकता..। नाचना रोज..। गाना रोज। हजारों हजार साल का रोज। वे नग्न थे, बेघर और कई कई बार भूखे भी….पर वे नाचते थे, गाते थे। भला वह चीज कैसे छूट जाये जो नग्नता और भूख से भी ज्यादा अहम हो। वे बस इतना ही कहना चाहते थे, कि उन्हें नहीं चाहिए तुम्हारा भरपेट खाना और कपड़े या यही कि जिसे तुम घर कहते या मानते हो…वे बस रात को मदमस्त नाचना चाहते हैं । पर वे सातों उनकी बात सुनने को तैय्यार नहीं थे। उनके अनुसार उनकी इस बात में एैब है। संसार की सबसे बड़ी आयरनी।

कहते हैं, बस्तर के कुछ युवा आज भी जाने किस उम्मीद में रात के जंगल में किसी रिक्त स्थान पर इकट्ठा होना चाहते हैं ? जाने क्यों चाँद आज भी मुंँह फेरने से पहले उस अंधेरी जगह को ताकता है ? जाने क्यों तो…..?

  घोटुल की जगह अब बंदूक थी। उन्माद और प्यार की जगह गुस्सा था। जंगल ने कभी किसी लड़की को रात को उस अंधेरी खाली जगह पर सिसकते सुना था। धड़कनों की जगह अब एक शुष्क सी आग थी। वे कई दिनों तक जलते रहे। फिर एक दिन। सबसे पहले एक युवा सामने आया। उसने बंदूक अपने हाथ में उठा ली और उस बाहरी आदमी से कहा,‘‘बताओ किसको मारना है ?’

‘‘पता नहीं, किसे मारना था उसे ?’’

उन्हें तय करना था, कि दुनिया में किसे वे अपना दुश्मन घोषित करें। किसे जानी दुश्मन..! किसकी खोपड़ी उड़ानी होगी और किसके सिर्फ़ हाथ और पैर काटने से ही काम चल जाएगा..। उन सातों ने उन्हें बताया कि किसे दुश्मन मानना है और किसे दोस्त। सातों खुश थे, कि अंततः वे उनकी बात समझ गए।

…..जंगल में घात लग चुकी है। जंगल की घात संसार की एकमात्र घात है,जो टूटती नहीं, जो बडे़ इत्मिनान से बीत जाने देती है शताब्दियांँ ।

तरूण भटनागर

MO-9425191559