खौफ का दौर खत्म,पक्की छत ने बदल दी स्कूल की तस्वीर - rashtrmat.com

खौफ का दौर खत्म,पक्की छत ने बदल दी स्कूल की तस्वीर

राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)।आदिवासी अंचलों की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से बदहाल थी। टपकती छतों दरकती दीवारों और असुरक्षित भवनों के बीच विद्यार्थी पढ़ रहे थे। स्कूल भवन जर्जर थे। हमेशा एक खौफ बना रहता था कि कहीं छत न गिर जाए। अभिभावकों के मन में हमेशा डर बना रहता था। लेकिन अब जर्जर स्कूल की तस्वीर बदल गयी है। न मन से खौफ हटा बल्कि अब विद्यार्थियों के सपनों को नयी उड़ान मिलने की उम्मीदों को पंख मिल गए हैं।


खौफ में रहते थे अभिभावक
आदिवासी अंचलों की जर्जर स्कूल इमारतों में टपकते पानी, गिरते प्लास्टर और खौफ के साये में पढ़ने को मजबूर बच्चों के दिन अब बदलने लगे हैं। वर्षों से बदहाली झेल रहे इन स्कूलों की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया है कलेक्टर मृणाल मीना ने। जिनकी पहल अब जमीनी हकीकत तब्दील होती दिख रही है। आदिवासी बाहुल्य बैहर और बिरसा जनपद के स्कूलों की हालत इतनी खस्ताहाल थी कि बरसात में कक्षाओं के भीतर बाल्टियां रखकर पढ़ाई कराई जाती थी। दीवारों की दरारें, उखड़ा फर्श, टूटे दरवाजे.खिड़कियां और टीन की तपती छत,इन हालातों ने बच्चों की शिक्षा को संकट में डाल रखा था। अभिभावक हर दिन किसी अनहोनी की आशंका में जीते थे।
बीस जर्जर स्कूलों की तस्वीर बदली
प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के तहत बैहर और बिरसा के 20 जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत को प्रशासकीय स्वीकृति मिलते ही काम तेजी से शुरू हो गया है। बिरसा के 10 स्कूलों के लिए 12ण्50 लाख रुपये और बैहर के 10 स्कूलों के लिए 12ण्46 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। प्रति स्कूल लगभग सवा लाख रुपये की लागत से छत, दीवार, फर्श और मूलभूत ढांचे को दुरुस्त किया जा रहा है। अब कह सकते है कि कभी डर और टपकते पानी के बीच सिमटी पढ़ाई अब पक्की छतों के नीचे नए सपनों को जन्म देगी और यही प्रशासनिक संवेदनशीलता की सबसे बड़ी जीत मानी जा रही है।