विकास के नाम पर केवल काँखने – कराहने और मुँह पटकने का कोई औचित्य नहीं हो सकता? उस विकास को देखने के रूप अलग- अलग होते हैं? हमारे जीवन में समय, समाज और राजनैतिक परिप्रेक्ष्यों में। तकनीक ने हमारे जीवन मूल्य और संवेदनाओं को पूरी तरह सोख लिया है या नीबू की भाँति निचोड़ लिया है।
सेवाराम त्रिपाठी –
सुना करता था कि तकनीक ही सब कुछ नहीं होती। मानवीय विकास मूल्य और जीवन यथार्थ के साथ नैतिक रूप हमें नियंत्रित करते हैं।हमने तकनीकी रूप से बहुत विकास कर लिया है और करते ही जा रहे हैं। हमनें न जाने कितनी चीज़ें अपने लिए घेर ली हैं।सुख सुविधाओं के अंबार लगा लिए हैं लेकिन उसी अनुपात में जीवन के प्रति हमारी संवेदना, रिश्तों की अवधारणायें उलट पलट गई हैं और नैतिकता का लगातार क्षरण होता हुआ भी दिखाई पड़ता है जो बेहद चिंतनीय है।रिश्ते एकबारगी स्वार्थों की रेस में आ चुके हैं।
मछलियों को लगता
नरेश सक्सेना की काव्य पंक्तियों पर ध्यान दें – “मछलियों को लगता था/कि जैसे वे तड़पती हैं पानी के लिए /पानी भी उनके लिए /वैसा ही तड़पता होगा/ लेकिन जब खींचा जाता है जाल/ तो पानी मछलियों को छोड़कर /जाल के छेदों से निकल भागता है /पानी मछलियों का देश है/ लेकिन मछलियां अपने देश के बारे में /कुछ नहीं जानतीं/” हम सभी तकनीक में उलझते जा रहे हैं। यह उलझाव हमें दिग्भ्रमित करता जा रहा हैं।तकनीकी विकास प्रक्रिया के भ्रम भी कुछ इसी प्रकार के हैं और हमारी नागरिक संवेदना और अस्मिता के भी। ये भ्रम कोई छोटे मोटे भ्रम नहीं है। सत्ताएं इस झूठ और भ्रम को निरंतर पालतीं पोषती और नियंत्रित करती रहती हैं और इस प्रकार हमारा जीवन निरंतर बंजर और बाँझ होता चला जाता है।
एक भीषण युद्ध चल रहा
हम जब अपने जीवन के अतीत को देखते हैं और उसका कभी – कभार विश्लेषण करते हैं तो लगता है कि स्मृतियों में बसी कोई फ़िल्म देख रहे हैं ।अतीत का वह निर्ब्याज जीवन हमें लुभाता भी है और हमें आईना भी दिखाता है। बदलाव यह आया है कि अब जीवन में सहजता सरलता महसूस नहीं होती । इसका आवरण बहुत कड़ा हो गया है.जिसे भेदना भी दुष्कर है.हमारे जीवन यथार्थ के और विकास के रूट नंगेपन और भांति – भांति के संदेहों से भर चुके हैं। जीवन यथार्थ की अस्मिता कितना लुट पिट गई है और कितना लुट रहा है हमारा विवेक संवेदना और अस्मिता। फिर भी विकास का जबरिया छत्र ताना जा रहा है।हम दिन – रात लहूलुहान हो रहें हैं। एक भीषण युद्ध चल रहा है हमारे भीतर और बाहर. जीवन की जद्दोजहद और ख़ोज में हमारी असलियत लहूलुहान होती जा रही है।विकास की दादुर ध्वनि विस्तारक संयंत्रों के द्वारा बहुत तीव्र गति से सभी ओर सुनाई पड़ रही है और मानवीय मूल्यों ,सरोकारों ,उम्मीदों ,लक्ष्यों के लिए एक विशेष प्रकार की रिक्ति का अतिरिक्त ताना – बाना बना हुआ भी देखा सुना जा सकता है। दिक्कत तब होती है जब विकास प्रक्रिया के चौखटे में विनाश लीलाओं का तांडव नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। और उसके गुणगान के भारी भरकम उद्योग चलते हैं विशेष परियोजनाओं की तरह।
नीबू की भाँति निचोड़ लिया
विकास को देखने दिखाने के पैमाने तय नहीं हैं। मेधा पाटकर के संघर्ष को समझा जा सकता है। वो किसी भी सूरत में विकास विरोधी नहीं हैं बल्कि वो तो संतुलित विकास की चाहत रखती हैं।विकास को विनाश में नहीं बदलना चाहिए। यह एक जीवंत हक़ीक़त है।विकास प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण हो और न्यायसंगत भी। उसका हेतु मात्र लाभ लोभ पर केंद्रित नहीं हो। उनके भीतर विकास के साथ छिपी विस्थापन की पीड़ा भी शामिल है। बिगड़ते पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी है और चिंता भी।तकनीकी विकास तो किया गया लेकिन मानवीय विश्वासों, जीवन मूल्यों का निरंतर विनाश किया जाता रहा। विकास को विनाश के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।मनुष्य की सुख सुविधाओं और जीवन यथार्थ का हमनें अपहरण कर लिया और वास्तविकताओं से पीठ फेर ली।क्या तकनीकी विकास के लिए मूल्यों और निष्ठाओं की और सरोकारों की कोई ज़रूरत नही है? इनकी रट लीला में विध्वंस का आगाज़ होना ही पर्याप्त है।तकनीकी विकास की परिधि को स्पष्ट होना चाहिए। मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का सार्वजनिक वध करके किस प्रकार का तकनीकी विकास चाहा जा रहा है । इसकी परिधि का भी हमें एहसास नहीं है।तकनीकी विकास के चोंचलों में सभी कुछ अगड़म – बगड़म घटाया जा सकता है और घटाया भी जा रहा है ।एक सरकारी और दिखावटी विकास होता है। उसमें यथार्थ कुछ नहीं होता।केवल मन के इलाकों के मुलम्मों के सिवा। वो हाथी के दांत हैं खाने के अलग और दिखाने के और। विकास के नाम पर केवल काँखने – कराहने और मुँह पटकने का कोई औचित्य नहीं हो सकता? उस विकास को देखने के रूप अलग- अलग होते हैं? हमारे जीवन में समय, समाज और राजनैतिक परिप्रेक्ष्यों में। तकनीक ने हमारे जीवन मूल्य और संवेदनाओं को पूरी तरह सोख लिया है या नीबू की भाँति निचोड़ लिया है।

सत्ता केवल राजनैतिक होती
हमारे जीवन के चारों ओर ही नहीं बल्कि सभी ओर विसंगतियों , अंतर्विरोधों ,पाखंडों, विकृतियों का मेला लगा है या उसकी दहाड़ सुनाई पड़ती है।होता केवल शून्य बटे सन्नाटा है।और कुछ सत्ताएं और अन्य तंत्रों के लोग उसी को बार – बार परोस देने में जुटे हैं। कोई भरम नहीं होना चाहिए कि सत्ता केवल राजनैतिक होती। वह सामाजिक, धार्मिक- उन्माद और तानाशाही मनोविज्ञान में भी मार्केटिंग करते हुए देखी जा सकती है।इसी में सामाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक स्थितियों के बड़े – बड़े रूपाकार सक्रिय रहते हैं । नागरिकों को इसी विकास प्रक्रिया की दौड़ में ज़िंदगी के अनंत सपनें दिखाए जाते हैं । इसी गुंजलक में लेखक भी भूल – भुलैयां में फंस जाता है। लेखक आसमान से टपकी हुई कोई चीज़ नहीं है। जैसा समाज और संपूर्ण परिवेश होगा। वह उसी प्रकार ही सामान्यतः विकसित होगा।यदि लेखक सतत सावधान और सतर्क है तभी वह इस भयावह जाल को तोड़ पाता है अन्यथा वह भी घनचक्कर में फंस जाता है।
गड़गड़ाहट शेष रह जाती
व्यंग्य मात्र लिखने की चीज़ नहीं है बल्कि वह साहस – संकल्प और हौसले की चीज़ है । ईमानदारी निष्पक्षता नैतिकता और यथार्थ का मरकज होता है।जिसने अपना ज़मीर बेंच खाया वो गया काम से।जीभ के चालू भूगोल से कुछ नहीं होने का। केवल गड़गड़ाहट शेष रह जाती है और व्यंग्यकार का सब कुछ चकनाचूर हो जाता है।व्यंग्य लेखन की दुनिया में जो डरा वो मरा । यहाँ चोंचलेबाजी नहीं चल सकती। यहाँ तत्काल चित्त फद्द होता है अथवा वो मठों और गढ़ों के परकोटों में घूमता रहता है और तरह- तरह की आरतियां, पूजा – अर्चना और भजन – कीर्तन लीलाओं में मगन रहता है। अजब तेरी कारीगरी रे सरकार । जो आदमी के बदले रंग हज़ार। जो साहसी और संकल्पवान नहीं है उसका क्या लिखना और क्या न लिखना?वह धाराधार पानी के प्रवाह में चारा उजार की तरह बह जाता है। कहाँ पार लगेगा। इसका कोई ठिकाना नहीं।
नून तेल की चमचमाहट
तकनीक से व्यंग्य का इस्तेमाल कर लो।उसका शरीर बना लो। भाषा की ध्वजा पताकाएं उड़ा दो।उसको वेशभूषा पहना दो लेकिन उसमें जान कैसे डाल सकते हो? उसके प्राणों को कैसे प्रतिष्ठित कर पाओगे?बिना ज़मीर के बिना जन -संबद्धता के बिना मानदंड के तकनीक आधारित व्यंग्यनुमा चीज़ें लिखते रहो।लिख- लिख कर ढेर तो लग जाएगा लेकिन उसके यथार्थ को कैसे प्रतिष्ठित किया जा सकेगा। अयोध्या के राम मंदिर निर्माण में बेहतर से बेहतर तकनीक का इस्तेमाल किया गया लेकिन लाभ लोभ के मानकों ने उसकी वास्तविकता खोल कर रख दिया। जीवन ,मूल्यों संवेदनाओं, और नैतिकताओं और आचरण से बढ़कर कोई चीज़ नहीं हुआ करती। निष्ठा ,ईमानदारी, निष्पक्षता, सरोकारों और मनुष्यता से बढ़कर कोई मात्र तकनीक के आधार पर सुरक्षित नहीं रह सकता।अन्यथा पुल निर्माण या सेतु या फ्लाई ओवर सब ढह जाएंगे या पवित्र से पवित्र स्थानों के ख़ज़ाने निःशेष हो जाएंगे। यूँ ही नहीं कहा गया – ‘ इफ कैरेक्टर इज लॉस इवरी थिंग इज लॉस’। राष्ट्रभक्ति भी शर्म में डूब जाती है। लेखक या मनुष्य ही तकनीक का निर्माता है।यदि वह पक्षधर नहीं है सरोकारी नहीं है और मनुष्यता से बढ़कर सुपर बाज़ारी हो गया है तो ज़िंदगी के यथार्थ और सच निरंतर मोम की तरह पिघलते चले जाएंगे और अंत में वह ठूंठ हो जाएगा।व्यंग्य लेखन में तकनीक का इस्तेमाल हो। होना भी चाहिए। किसने रोक रखा है।तकनीकी विकास और मुद्दों पर लिखा जाए।विसंगतियों और अंतर्विरोधों पर भी लेकिन होशो – हवास के द्वारा या ज़मीर के द्वारा। अन्यथा तकनीक की अंधी – आँधी में सब कुछ बह जाएगा। केवल बिना नून तेल की चमचमाहट ही बचेगी लेकिन एक दिन वो भी ठिकाने लग जाएगी।

सेवाराम त्रिपाठी
MO-7987921206
