सुन्दरता मनुष्य की कमजोरी है । मगर यह स्त्री की मजबूरी है क्योंकि सुन्दरता ही उसकी योग्यता का पैमाना माना जाता है । आप धर्मग्रन्थ देख लीजिए जिनमें देवियाँ सब खूबसूरत हैं और जो बदसूरत हैं वे राक्षसनियाँ हैं। यही सिलसिला आज तक समाज का पैमाना है। जिसे कुदरत से भरपूर रूप नहीं मिला उसको अवमानना सहनी पड़ती है ।
मैत्रेयी पुष्पा का सौन्दर्य-बोध/ विचार
शशिबिन्दु नारायण मिश्र
हिन्दी की प्रतिष्ठित रचनाकार मैत्रेयी पुष्पा जी का एक विचार पढ़ा। मैत्रेयी जी से मेरी कोई मुलाकात नहीं है। उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास ‘चाक’ लगभग 25-26 साल पहले पढ़ा था। चाक में वर्णित प्रमुख पात्र श्रीधर मास्टर और स्त्री पात्र सारंग को लेकर उपन्यास का कथा-रस बड़ा रोचक बन पड़ा है।
‘चाक’ में वर्णित कुछ प्रसंगों पर मूर्धन्य समालोचक आचार्य रामचन्द्र तिवारी से व्यक्तिगत रूप से मिलकर मैने उस प्रसंग की चर्चा की थी, जिन पर मेरी असहमति थी। उन्होंने बताया था कि मैत्रेयी जी को पत्र भी लिखा था, जैसा कि तिवारी जी ने मुझे बताया था। 13 फरवरी 2026 को मैत्रेयी पुष्पा जी का कृत्रिम सौन्दर्य को लेकर एक विचार पढ़ा- हालाँकि मैत्रेयी पुष्पा स्वयं स्त्री हैं, वे विदुषी कथा लेखिका हैं, स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य की चर्चित लेखिकाओं में उनका नाम अग्रणी है। उनके विचार स्वयं उन्हीं के शब्दों में पढ़िए –
“मुझे फेशियल मेकअप पसंद नहीं हैं । जब भी ऐसी स्थिति बनी है , मैंने तुरंत चेहरा धोया है । पता नहीं स्त्रियाँ एक या आधे दिन के लिये चेहरे की रंगत को क्यों बदलवाना चाहती हैं ? एक दिन के बाद ही तो असलियत का पर्दा फाश हो जाता है । सुन्दरता मनुष्य की कमजोरी है । मगर यह स्त्री की मजबूरी है क्योंकि सुन्दरता ही उसकी योग्यता का पैमाना माना जाता है । आप धर्मग्रन्थ देख लीजिए जिनमें देवियाँ सब खूबसूरत हैं और जो बदसूरत हैं वे राक्षसनियाँ हैं। यही सिलसिला आज तक समाज का पैमाना है। जिसे कुदरत से भरपूर रूप नहीं मिला उसको अवमानना सहनी पड़ती है । ब्यूटी कम्पटीशन स्त्री के जीवन में अभिशाप है।”
मेरे विचार– मैत्रेयी जी जब यह कह रही हैं तो वह स्त्री हैं और सामान्य स्त्री नहीं हैं। उनकी अवस्था 82 वर्ष के आसपास है और उनके पास जीवन का विशद अनुभव भी है। मैत्रेयी जी बहुत ही गम्भीरता और तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात कह रही हैं। मैत्रेयी जी का विचार आज का सामाजिक यथार्थ है। मेरी धर्मपत्नी ने भी मैत्रेयी जी के विचारों का समर्थन किया है। सौन्दर्य प्रकृति का मानव के लिए दिया गया अद्भुत उपहार है। सहज सौन्दर्य हर किसी को प्रभावित करता है,जिसे हम प्राकृतिक सौन्दर्य भी कहते हैं। सहज सौन्दर्य का केवल मानवजाति से ही सम्बन्ध है, ऐसा कत्तई नहीं है। सुन्दरता को लेकर मानवेतर प्राणी भी कुछ न कुछ महसूस करते हैं, ऐसा देखा गया है, इसे प्राणिविज्ञानी अधिक समझते हैं और प्रकृति का मानवीकरण करने वाले बड़े साहित्यकार सहज सौन्दर्य का कैसा अनुभव करते हैं,यह हम-सब पढ़ते और सुनते ही रहे हैं। संसार का हर श्रेष्ठ साहित्य इससे अटा पड़ा है। बहुत सारे पुरुष रचनाकार स्त्री मनोविज्ञान ठीक-ठीक समझते हैं, भक्तिकाल में कबीर को तो नहीं कह सकते,पर तुलसीदास और सूरदास की रचनाएँ इसका प्रमाण हैं, आधुनिक हिन्दी में भी अनेक बड़े रचनाकार हैं। स्त्री मनोविज्ञान समझे बिना कोई पुरुष रचनाकार और पुरुष मनोविज्ञान समझे बिना कोई स्त्री रचनाकार कालजयी रचना नहीं रच सकते, बड़े रचनाकार नहीं हो सकते। ईमानदारी से कहूँ मैं स्त्री मनोविज्ञान अभी ठीक ढंग से नहीं समझ पाता , लेकिन हिन्दी की वरिष्ठतम रचनाकार आदरणीया मैत्रेयी पुष्पा जी की टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया में मैं केवल इतना भर कहना चाहता हूँ कि पुरुष अथवा स्त्री के मन पर विपरीत लिंगी का पहला आकर्षण अथवा प्रभाव सौन्दर्य का ही पड़ता है, शब्दों का, व्यवहार का, गुणों का उसके बाद। पुरुषों की इस सहज कमजोरी का कुछ स्त्रियाँ लाभ भी उठाती हैं,पर सभी नहीं । बावजूद इसके अपने सौन्दर्य की वृद्धि की (केवल शरीर ही नहीं) ख्वाहिश अप्राकृतिक तो नहीं कही जा सकती है।

स्त्री हो अथवा पुरुष कभी-कभी जब सजने-सँवरने का अतिरेक होने लगता है तो सहज सौन्दर्य भी विकृत लगने लगता है और भी फूहड़ लगने लगता है। अपने शरीर को सुव्यवस्थित (Well maintained) रखना कोई बुरी बात नहीं है। ढलती उम्र में भी हम युवा दिखें और इसके लिए प्रयास करें, इसमें भला बुराई क्या है ? लेकिन इतना तो ध्यान रहे कि अपने को सुव्यवस्थित रखने के चक्कर में कहीं हम स्वयं नकारात्मक तो नहीं बन रहे हैं, दूसरों की दृष्टि में कहीं जोकर तो नहीं बन रहे हैं। आपने देखा होगा कि उम्र की ढलान पर जवाँ दिखने के चक्कर में हर दूसरे-तीसरे दिन बालों में डाई लगाना और नित्यप्रति क्लीन शेव करना हर किसी की बाह्य सुन्दरता में वृद्धि न कर चेहरे का अपकर्षण करता है और कुछ के चेहरे पर सौन्दर्य वृद्धि भी होती है। ठीक उसी प्रकार कुछ स्त्रियों को देखा जाता है कि वे अतिरिक्त रूप से गोरा दिखने के चक्कर में चेहरे पर इतना फेशियल मेकअप कराती हैं कि चेहरा बदरंग हो उठता है क्योंकि गले पर, हथेली के पृष्ठ भाग पर या कलाई और उसके ऊपर का बाँह का हिस्सा तो फेशियल मेकअप हुआ नहीं रहता है। जिसकी ओर मैत्रेयी पुष्पा जी का इशारा है।
मतलब जब हम अपनी योग्यता का पैमाना केवल ‘क्लीन शेव’ और ‘फेशियल मेकअप’ तक सीमित कर रहे हैं तो अपने सहज सौन्दर्य को भी विकृत कर रहे हैं। आखिर में गोरा अथवा साँवला अथवा काला रंग और मूँछें भी तो प्रकृति का अनमोल उपहार हैं। यही वह अवसर होता है जब आन्तरिक सौन्दर्य अथवा आन्तरिक हाव-भाव के निरन्तर परिष्कार की जरूरत पड़ती है, जिसका सम्बन्ध शील, करुणा और कर्त्तव्य से होता है।धीरे-धीरे वह जीवन का वास्तविक सौन्दर्य बन जाता है, जीवन के बाद भी। यही कारण है कि हमारे राम और कृष्ण अनन्त काल तक अनन्त सौन्दर्य वाले हो गये। जो कि केवल हम भारतीयों के लिए ही नहीं अपितु सकल मानवता के लिए पाथेय के रूप में सदैव प्रस्तुत हैं। महाभारत में एक प्रसंग आता है मथुरा के राजा कंस की टेढ़ी बुद्धि वाली एक कुरूपा दासी थी कुब्जा,जो कंस के शरीर पर चंदन और सुगंधित द्रव्यों का लेप किया करती थी। टेढ़ी बुद्धि की थी, कुरूपा थी और काम भी निम्न दर्जें का था। कुब्जा एक दिन सुबह-सुबह अपने काम पर जा रही थी कि अचानक रास्ते में वासुदेव श्रीकृष्ण मिल गये, पुकारा -सुन्दरी ! , कुब्जा सुन्दरी तो थी नहीं कि उधर ध्यान देती। सोचा कि यह परम सुन्दर किसी और सुन्दरी को पुकार रहा होगा। कृष्ण ने एक बार, दो बार, तीन बार पुकारा -सुन्दरी!, तिबारा कुब्जा के कानों में सुन्दरी शब्द पड़ने पर उसने पलट कर देखा तो सम्बोधन उसके लिए ही था। लोकोत्तर देहयष्टि में मुस्कराता हुआ अलौकिक मुखमण्डल पुकार रहा था -सुन्दरी -सुन्दरी! , कुब्जा निहाल हो उठी थी और हतप्रभ हो प्रत्युत्तर में बोल पड़ी थी -“बोलो परम सुन्दर !” कुब्जा कुरुपा थी,पर कृष्ण को सुन्दर दिखती है। इस आधार पर तो असली सौन्दर्य देखने वाले की दृष्टि में हैं न कि किसी वस्तु या व्यक्ति में।
हरि और उनकी कथा को अनन्त माना गया है, मुझे लगता है कि वैसे ही प्रेम और सौन्दर्य भी अनन्त हैं। तभी तो महाकवि माघ कह उठते हैं – “क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताया:।” कवि की यह सौन्दर्य दृष्टि सहज है, माघ का यह कथन प्राकृतिक सौन्दर्य को लेकर है। प्राकृतिक सौन्दर्य हो अथवा कृत्रिम सौन्दर्य उसके मूल्यांकन में अपनी ही सौन्दर्य-दृष्टि काम करती है। जब भी,जहाँ भी वास्तविक और जीवन्त सौन्दर्य की बात आती है तो महाकवि माघ द्वारा रमणीयता को परिभाषित उक्त कथन को हर कोई उद्धृत करता है, यहाँ तक कि भाषा की आधुनिकता,नवीनता और सौन्दर्य को लेकर माघ के कथन को प्रोफ़ेसर जी० सुन्दर रेड्डी ने भी। प्रख्यात कथा लेखिका शिवानी जब अपने कथा लेखन में स्त्री पात्रों के सुर्ख़ गाल और रूप-यौवन का चित्रण कर रही होती हैं तो उसके साथ-साथ स्त्री के आंतरिक भाव त्याग- समर्पण- मातृत्व, हाव-भाव का बारीकी से उल्लेख अवश्य करती हैं, जिससे बाह्याभ्यन्तर सौन्दर्य में सन्तुलन बना रहता है और पाठक-दर्शक विकारग्रस्त नहीं होता है।
रचनात्मकता – जीवन्तता के बिना सुन्दरता का भला क्या अर्थ ? जो भी सृजनशील और जीवन्त है, वह कल्याणकारी भी होगा, इसलिए वह सुन्दर होगा ही। बाह्य रूप में कुरुप लगने वाले सुकरात, चाणक्य आदि जैसों ने तो दुनिया को कुछ अधिक ही सुन्दर बनाया है।

–शशिबिन्दु नारायण मिश्र
MO-9453609462
रानापार, बिशुनपुरा, गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
