डॉ.सविता वर्मा ‘ग़ज़ल’ की ‘वह शहीद हो गया’कहानी सिर्फ़ एक घटना नहीं है।यह एक अम्मा के सब्र की इंतिहा,और इस मुल्क की क़ीमत है। यहाँ माँएँ बेटे नहीं खोतीं,यहाँ देश बेटे उधार ले लेता है। और जब एक औरत रोते हुए बोली,“अम्मा…तेरा बेटा आ रहा है,मगर तिरंगे में लिपटा हुआ। उस दिन समझ आया,कि यह मुल्क सरहदों से नहीं,माँओं के सब्र से बचा है।उस दिन समझ आया,कि यह मुल्क नक़्शों से नहीं टिकता,यह तो उन औरतों के कंधों पर खड़ा है,जो एक नहीं,दो-दो बार विधवा होती हैं।यहाँ माँएँ बेटों को जन्म नहीं देतीं सिर्फ़,यहाँ माँएँ बेटों को शहादत तक पालती हैं।
वो शहीद हो गया \ कहानी
सुबह- सुबह के सूरज की अल्हड़ किरणें घर के छोटे से जँगले के किवाड़ की झीरी में से घर के भीतर आने को बेताब हो रही थीं। क्यों कि घर की ढेहरी,दरवाजे़ और घर में रहने वालों की पीड़ा से भलीभांति परिचित थीं। आखिर सूरज की किरणें घर के अंदर दाखिल हो ही गयीं। इस भरोसे के साथ घर के अंदर आयी कि हर ग़मजदा आँखों के साथ,घर की उदासी की सीलन को कुछ पल के लिए ही सही..कम करने की जतन करेंगी।
अम्मा एक छोटी बस्ती में रहती थी, अपने छोटे से घर में अपनी बहू कम्मो और अपने पोते के साथ। पोते की मासूम और भोली सूरत और उसकी बाल लीलाएं भी अम्मा की दर्द और पीड़ा को कम करने में असफल थी।
कहते है न कि कुछ ज़ख्म ऐसे होते है जिन्हें भरने में समय भी असफल होता है क्योंकि कभी न भरने वाली पीड़ा जोक के जैसी अम्मा के जीवन को चिपट कर भीतर ही भीतर खाए जाती थी।
बस ,सबको बेफिक्री तो इस बात की थी कि अम्मां और उनकी बहू को भर पेट इज्जत की रोटी मिल जाती थी और तन ढकने भर कपड़ा नसीब हो ही जाता था।एक बेटा था जो देश की रक्षा के लिए शहीद हो गया था।
हर महीने पेंशन मिलते हो अपनी अम्मा के अकाउंट में पैसे आ जाते थे,अम्मा को पैसे की कोई खुशी ना होती थी बल्कि उसकी आँखें भर आती थी,जिन्हें वो अपनी बहू से छुपाकर अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछ लिया करती थी।
आखिर समय का चक्र उल्टा जो घूम रहा था।जो दर्द अम्मा ने सहा जवानी में वही दर्द आज उसको लाडली बहू कम्मो भी झेल रही है।परन्तु समय ने कम्मो को गंभीर बना दिया था जो रोती नहीं थी कभी,उसकी आंखों के आंसू सूख गए थे मानों।
आज भी जब अम्मा के अतीत में झांकती हूं तो कलेजा फटने को हो आता है।जब अम्मा बड़ी खुश रहा करती थी। मुहल्ले भर के सुख दुख की साझीदार हुआ करती थी अम्मा।देखते ही देखते सबकुछ बिखरता सा चला गया।अम्मा के पति परलोक सिधारते ही।
इस ज़ख्म को तो समय ने भर ही दिया था क्योंकि अब अम्मा का बेटा भी बड़ा हो गया था।
ईश्वर की कृपा से सुंदर,सुघड़ संस्कारी बहू थी जो आँगन में जब इधर-उधर चलती थी तो लगता था मानों साक्षात माँ लक्ष्मी हो।बहू के पाँवों की पायल चलते-फिरते छनक-छनक कर घर के सूनेपन को हराने में आखिर सफल हो ही जाती थी।
उसकी चुड़ियों की खनखन सुनकर तो अम्मा अपनी कलाई का सुनापन भूल जाया करती थी।
अम्मा भी बहुत खुश थी ऐसी लक्ष्मी स्वरूपा बहू कम्मो को पाकर और हो भी क्यों ना बहू हर समय अम्मा की सेवा करने के लिए अम्मा के इर्द गिर्द ही तो घूमती फिरती रहती थी।क्योंकि वैसे भी दोनों सास- बहू ही तो थी पूरे घर भर में।
अम्मा का पति तो जवानी में ही छोड़कर चला गया था अम्मा को। जैसे-तैसे अम्मा ने दिन रात मेहनत करके अपने इकलौते बेटे को पढा-लिखाकर इतना कामयाब तो कर ही दिया था कि उसकी सरकारी नौकरी भी लग गई थी।
पहले पहल तो अम्मा रोने लगी थी कि पति तो चला ही गया देश के लिए और अब बेटा भी देश की सेवा के खातिर मुझे छोड़कर चला जायेगा।दिन रात अम्मा इसी चिंता में दुबली होने लगी ।
बस! एक दिन अम्मा बैठी थी इसी सोच में कि वो आखिर ऐसा क्या करे कि जो बेटे के नौकरी पर जाने के बाद उसका मन भी लग जाए और घर में भी उदासी अपने पांव ना पसार सके।
तभी अचानक से किसी ने अम्मा को आवाज लगाई।
“जोगिंदर की अम्मा अरी घर पर ही है क्या”
आवाज जानी पहचानी सी लग रही थी ।
अम्मा अपने विचारों की दुनिया से झट से बाहर आई और उठकर किवाड़ खोलते हुए बड़बड़ाई।
“अरे कौन होगा..?
तभी किवाड़ खुलते ही अपने सामने अपने मामा के साले के बेटे धर्मपाल को देखकर अम्मा बच्चों के जैसी खुश होते हुए कहने लगी।
“अरे धर्मा तू ?.. तू यहां कैसे और इतने सालों बाद तुझे मेरी याद कैसे आ ग़ई”?
धर्मा ने अम्मा के बराबर से निकलर आंगन में पड़े तख्त पर बैठते हुए अम्मा की तरफ देखकर हंसते हुए कहा।
“अरे सांस तो लेने दे चौधरन ” कहकर धर्मा जोर से हंस पड़ा अब अम्मा ने उसके पास बैठते हुए हैरानी से अपनी आँखें फैलाते हुए उसकी तरफ देखकर कहा।
“चौधरन ? तू नशे में तो ना कहीं रे धर्मा? ”
“अरे कैसी बात करती है तू जोगिंदर की अम्मा?देख ज्यादा घुमा फिराकर तो मुझे बात करनी नहीं आती है तो सीधा सीधा बोल देता हूं मैं तेरे बेटे जोगिंदर का ब्याह अपनी बेटी कम्मो से करवाना चाहता हूं।”
धर्मा ने बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात का दी।
बस फिर तो अम्मा बिना उसकी बात का उत्तर दिए सीधी रसोई घर में गई और एक कटोरे में गुड रखकर ले आई।
“ले मुंह मीठा कर ले तूने तो अचानक से आकर मेरी सारी दुविधा ही दूर कर दी र धर्मा”..
मैं तो आधी हो गई सोच- सोच के जब से जोगिंदर की नौकरी की बात सुनी।बस!अब तू तो घर जाके बारात के स्वागत की तैयारी कर धर्मा ।”
अम्मा दो चार रिश्तेदारों को ले जाकर जोगिंदर के फेर- फेर कर कम्मो को बहू बनाकर घर ले आयी ।

अब तो जोगिंदर को तीन महीने बाद ड्यूटी पर जाना था।बहू के घर में आगमन से तो मानों खुशियों की बरसात ही होने लगी थी।कुल मिलाकर दिन अच्छे बीत रहे थे।
तब अम्मा की खुशी का और भी ठिकाना न रहा जब उसे पता चला कि उसकी बहू कम्मो मां बनने वाली है।
अब तो अम्मा उसे पलकों पे बिठाकर रखती थी।अचानक से जोगिंदर को भी बुलावा आ गया और वो हंसी खुशी जल्दी ही नन्हें मेहमान के आने से पहले ही आने के वादे के साथ देश की रक्षा के लिए चला गया।कम्मो को कभी खाने-पीने की कोई कमी नहीं रखती थी अम्मा किन्तु इधर कुछ दिनों से अम्मा की तबियत भी ठीक ना थी।बस इसी कारण वें अक्सर अपनी पड़ोसन रोशनी को ही बुला लिया करती थी रात में बहू के पास सोने के लिये।
आज दिन में अम्मा की हालत भी ठीक थी और वो जब रोशनी को बुलाकर लायी थी तो घर आते ही ब्याही गाने लगी थी यूँ ही बैठकर।
“जच्चा झुक-झुक देखे पलना।
तू चाँद जैसा किस पे हुआ मेरे ललना”
अचानक ही अम्मा खड़ी होकर नाचने लगी और गीत गाने लगी।
“सासू मांगे हैं नेग पलंग की बिछाई ।
सासू मांगे हैं नेग पलंग की बिछाई।
कमरे में से जच्चा कहे ,पिया मेरे परदेश माई।”
तभी अम्मा को ऐसे गाते नाचते
देखा रोशनी ने..तो वो देखती ही रह गई।
” अरे वाह जोगिंदर की अम्मा तू तो अभी से ब्याही गाने लगी।?”
“नजर मत ना लगाइए रोशनी ,खुशी के दिन तो अब ही आये हैं जीवन में।”

परन्तु ये खुशी भी ज्यादा दिन की नहीं थी समय के गर्भ में क्या छुपा है ये तो कोई नहीं जानता सिवाय भगवान के।अचानक बहू के कूलने की आवाज़ रोशनी के कानों में पड़ी उसकी नींद खुल गयी और उसने देखा बहू तो प्रसव पीड़ा के मारे बेहाल हुई जा रही हैं वो झट से अम्मा के पास गई
“अम्मा तनिक देखो तो बहू मारे दर्द के मछली के जैसी तड़प रही है…. ओ अम्मा कित्ती गहरी नींद
में सोई है…” ।
अम्मा को जगाने गयी रोशनी अम्मा के ना जागने की वजह से खुद में बड़बड़ाती हुई अम्मा की चारपाई के पास जाकर खुद में ही बड़बड़ाने लगी” लगता है अम्मा गधे-घोड़े सब बेचकर सोई है।”
रोशनी की आवाज सुनकर अम्मा हड़बड़ा कर उठ गई ।
“अम्मा बहू दर्द से तड़प रही है और तू है कि कोई खबर हो नहीं इसी गहरी नींद में कोई सोता है भला?”
“अरे सवेरे सवेरे मरा बहुत बुरा सपना दिखा रहा था तो आंख न खुली”
सवेरा अपना पूरा आकार ले चुका था रोशनी ने झट से दूसरे पड़ोसी के घर का दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया।सारी बात जानकर एक के बाद एक गांव वाले इकठ्ठे हो गये।तभी एक पड़ोसी अपने रेडे पर बहू को लिटाकर रोशनी को साथ ले पास के सरकारी अस्पताल में लेकर चला गया।
अम्मा भी बहू के साथ अस्पताल जाने की जिद करने लगी।तभी अम्मा को पड़ोस के ही एक परिवार ने घर में बैठाकर बताया कि तेरा जोगिंदर आने वाला है तो तू कैसे जा सकती है अस्पताल जोगिंदर की अम्मा और फिर वहां तो है ना दो तीन जाने बहू की देखभाल को।
अम्मा खुश होते कहने लगी “चलो अच्छा मेरा जोगिंदर भी आते हो अपने बच्चे को गोद में लेकर खिला लेगा।”
तभी पड़ोसन की रुलाई फूट पड़ी और वो रोते हुए बोली।धीरज ना खोइए जोगिंदर की अम्मा जो कह रहे हैं ध्यान से सुन ।तेरा जोगिंदर आ तो रहा है पर वो ..वो तिरंगे झंडे में लिपटा हुआ आ रहा है।
वो शहीद हो गया जोगिंदर की अम्मा तेरा बेटा शहीद हो गया।
पड़ोसन के इतना बोलते ही वक़्त वहीं ठहर गया।उस माँ ने सीना पीटा नहीं,ज़मीन पर गिरकर रोई नहीं,बस इतना कहा,“ठीक है…उसे धीरे उतारना,वह बहुत दूर से आया है।”
उस औरत का दर्द चीख़ नहीं बना,वह चुपचाप खड़ी रही क्योंकि उसने एक बार नहीं,दो बार देश को अपना सुहाग सौंपा था। उस दिन समझ आया कि यह मुल्क सरहदों से नहीं,माँओं के सब्र से बचा है।उस दिन समझ आया,कि यह मुल्क नक़्शों से नहीं टिकता,यह तो उन औरतों के कंधों पर खड़ा है,जो एक नहीं,दो-दो बार विधवा होती हैं।यहाँ माँएँ बेटों को जन्म नहीं देतीं सिर्फ़,यहाँ माँएँ बेटों को शहादत तक पालती हैं।

डॉ.सविता वर्मा ‘ग़ज़ल’
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