अपराधबोध का प्रेत - rashtrmat.com

अपराधबोध का प्रेत

                                       अपराधबोध का प्रेत

कहानी

तेजेन्द्र शर्मा भावनाओं का रस उढ़ेल कर दिल की कहानियाँ लिखते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियाँ लुभाती है। कैंसर से जूझ रही पत्नी को अंतिम क्षणों में पति की सेवा और उसके प्यार की खुशबू उसे एहसास कराती हैं कि उसकी चिंता करने वाला कोई है। लेकिन एक बात पर उसे एहसास होता है कि वो जो सोच रही है वो अर्द्ध सत्य है।पत्नी के जवाब से पति मन से हिल जाता है। आखिर पति ने ऐसा क्या कह दिया और सोच लिया कि वो ‘अपराध बोध’ से घिर जाता है।आप को यह कहानी अंदर तक झकझोर देगी। पढ़ कर देखिये-

उसने यह बात सोची ही कैसे?
क्या ऐसे कुत्सित विचार का दिमाग में आना ही उसे अपराधी नहीं बना देता? रक्त बोतल में से बूँद-बूँद टपककर अब भी नली में से होता हुआ सुरभि की शिराओं में जज़्ब हुए जा रहा था। उसके चेहरे पर लगा हुआ ऑक्सीजन नकाब निरंतर ऑक्सीजन उसके शरीर में पहुँचा रहा था..यही ऑक्सीजन सुरभि की साँसों को किसी भी तरह थामे हुई थी, परंतु नरेन! नरेन को लग रहा था जैसे कोई अज्ञात शक्ति उसका गला दबाए जा रही है…उसकी आवाज़ उसके तालू के साथ चिपककर रह गई है। उसकी जीभ आवाज़ क़ो बाहर निकलने ही नहीं देना चाहती। आख़िर ऐसा गिरा हुआ वीभत्स विचार उसके मन में आया कैसे! उसके पास तो जीवित रहने का कोई भी कारण नहीं बचा है।
”नरेन, आज तुम्हारे लिए मूली के परांठे बनाकर लाई हूँ।” सुरभि ने अपनी आवाज़ की खुशबू बिखेरी।
”तुम टिफ़िन में थोडा ज़्यादा खाना लाया करो ना। मैं तो तुम्हारा सारा टिफ़िन खा जाता हूँ। और तुम्हें बाज़ारी छोले-भटूरे खाने पडते हैं।”
”जानते हो, तुम खाते हो तो मुझे कितना सुख मिलता है। अगर ज़्यादा लाऊँगी तो माँ पूछेगी नहीं कि किसके लिए ले जाती हूँ। मुझसे झूठ नहीं बोला जाता।”
”इतना प्यार करती हो मुझे?”

मैंने कहा ना, मुझसे झूठ नहीं बोला जाता।” सुरभि की खिलखिलाहट भरी हँसी पूरी फ़िजाँ में फैल गई थी।
सुरभि ने आँखें खोलीं। नरेन को अभी भी पहचान पा रही थी। उसे पेशाब करने की ज़रूरत महसूस हुई थी। अपराधबोध से ग्रस्त नरेन ने जल्दी से कमोड लगाया, पेशाब करवाया और रूई से सफ़ाई कर दी।
सुरभि की बीमार आँखों में से आँसू की एक बूँद निकली और उसके तकिये में समा गई। वैसे तो उसके शरीर में कैंसर ने पाँच साल पहले ही जडें जमा ली थीं, पर पिछले दो वर्ष ने उसका संबंध बिस्तर से और भी प्रगाढ क़र दिया था। करवट बदलते हुए भी हड्डियों के भुरभुराकर टूटने का डर रहता था। सीधे लेटे रहने से पीठ में वैसे भी दर्द होता रहता था। बोन मैटास्टेसिस! सुनने में कितना रोमैंटिक-सा नाम लगता है..कितनी भयानक बीमारी!
”तुम्हें माँ ने बुलाया है।”
”तुम तो कह रही थीं कि ममी हस्पताल में हैं।”
”हाँ, पेट में बहुत बड़ा टयूमर हो गया था। काफ़ी बड़ा आपरेशन हुआ है। मैंने एक दिन हस्पताल में ही तुम्हारे बारे में बात कर दी। पहले तो बहुत नाराज़ हुईं, फिर बोलीं कि उसे ले आना,मैं भी देखूँ कि वो चीज़ क्या है,जो मेरी बेटी को इतना पसंद आ गया है।”
”एक बात तो है सुरभि, अगर माँ जी ने मुझे पसंद कर लिया, तो तुम्हें छोले-भटूरे खाने से मुक्ति मिल जाएगी।”
”भला, वोह कैसे?”
”लल्लू लाल! फ़िर तो उन्हें बता सकोगी कि टिफ़िन में एक्स्ट्रा खाना किसके लिए ले जाना है।” हँसी के साथ सुरभि के सुंदर दाँतों की कतार जैसे किसी टूथपेस्ट का विज्ञापन लगने लगती थी।

इतनी लंबी बीमारी भी सुरभि के दाँतों को बीमार नहीं कर पाई। अभी दो महीने पहले तक तो सुरभि घर में बैठकर फ़ोन पर बात भी कर लेती थी। फ़ोन पर उसकी आवाज़ सुनकर कोई मानने को तैयार ही नहीं होता था,कि सुरभि सचमुच बीमार है। पिछले तीन सप्ताह से तो बस. . .हस्पताल का बिस्तर, रक्त की बोतल और ऑक्सीजन का सिलंडर!
”बेटा जी, काम कहाँ करते हो?”
”बस जी, यह जो पंखा ऊपर चल रहा है ना,उसी कंपनी में सेल्ज़ आफ़ीसर हूँ।”
”तनख्वाह कितनी मिल जाती होगी?”
”साढे आठ सौ रुपये। माँ जी ऊपर की कोई आमदनी नहीं है। हाथ में बस आठ सौ पचास रुपये ही आते हैं। वैसे सरू का कहना है कि इतने पैसों में घर चला लेगी।”
माँ जी के माथे पर बल दिखाई दिए, ”सिगरेट, शराब की कोई आदत है क्या?”
”माँ जी, आज तक तो दोनों चीज़ें नहीं पीं, भविष्य की तो रामजी ही जानें।”
”सुरभि बता रही थी कि माँ-बाप के अकेले बेटे हो!”
”जी हाँ, एक बहन है, बड़ी। शादी हो चुकी है उनकी। दो बेटे भी हैं।”
माँ जी के चेहरे से नरेन कुछ भी समझ नहीं पा रहा था कि वह साक्षात्कार में सफल रहा या उसे रिजेक्ट कर दिया गया। पर कुछ दिनों बाद सुरभि के टिफ़िन में उसका खाना भी आने लगा था।

सुरभि ने फुसफुसाहट भरी आवाज़ में कुछ कहा। नरेन का अपराधबोध और गहरा हो गया। जिस गले से दाग़ और ग़ालिब की ग़ज़लें माधुर्य पाती थीं, उसी गले से आज फुसफुसाहट भी मुश्किल से निकल पा रही थी। फ़िल्मी गीतों को लेकर भी नरेन और सुरभि में नोकझोंक चलती रहती थी। नरेन की पसंदीदा जोडी थी शैलेंद्र और शंकर जयकिशन जबकि सुरभि को शकील की शायरी अच्छी लगती थी, ”शृंगार रस का उपयोग जिस तरह शकील करते हैं, किसी और फ़िल्मी शायर के बस की बात नहीं उस पर नौशाद का संगीत मेड फ़ॉर ईच अदर जोडी।”
”जयपुर भी कोई हनीमून पर जाने की जगह है?”
”वहाँ से माऊंट आबू भी तो जाएँगे।”
”पर जयपुर क्यों?”
”सरू, ना जाने क्यों, आमेर के किले में जाकर ऐसा लगता है, जैसे मैं वहाँ पहले भी आ चुका हूँ, तुम भी मेरे साथ वहाँ चलकर वह किला देखना। लोग तो इंग्लैंड और अमरीका से आते हैं वह महल देखने।”
”उनका हनीमून नहीं होता। हनीमून के लिए तो हर कोई हिल स्टेशन पर ही जाता है।”
”तो पहले माऊंट आबू चले चलते हैं। वापसी में जयपुर चले जाएँगे।”
”नहीं, पहले जयपुर ही चलेंगे।”

नरेन की हर बात रख लेती है सुरभि। कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि सुरभि ने अपनी कोई बात नरेन पर लादी हो। जयपुर में ही एक ब्रिटिश जोड़ा भी अपने हनीमून पर आया हुआ था। उसी होटल में ठहरा था जहाँ नरेन और सुरभि रुके थे। देखते ही अंग्रेज़ युवती के मुँह से निकला था, ”मेड फ़ॉर ईच अदर कपल!”
नर्स आई है। साँवले रंग की, मध्यम काठी, नीली पोशाक। आमतौर पर नर्सें सफ़ेद पोशाक पहनती हैं। संभवतः अस्पताल वाले सफ़ेद रंग को शोक का प्रतीक मानते हैं। या फिर कोई और भी कारण हो सकता है। पर इस अस्पताल में नर्सें नीले रंग के कपड़े पहनती हैं। नरेन उसे देखे जा रहा था. . .उसका मन हुआ कि आगे बढ़कर नर्स के होठों पर एक चुंबन अंकित कर दे। दूसरा कुत्सित विचार. . .अभी तो पहले विचार के अपराधबोध से ही बाहर नहीं निकल पाया था। आज उसका मन बेलगाम क्यों हुए जा रहा है।

नरेन के विचारों से अनभिज्ञ, नर्स ने सुरभि की नब्ज़ देखी, फ़ाइल में लिखा। खून का टपकना चेक किया। सुरभि की आँख खुली। ”हैलो, कैसा है अबी? रात को नींद ठीक से आया?” सुरभि के बीमार चेहरे पर भी मुस्कान की एक लकीर दिखाई दी। उसकी आँखें कह रही थीं अब तो बस अंतिम निद्रा की प्रतीक्षा है, सुरभि को ऑक्सीजन और खून की बोतल ने अहसास करवा दिया था कि मामला चला-चली का ही है, कल रात ही नरेन के कानों में फुसफुसाई थी, ”कार के ट्रांस्फर पेपरों पर मेरे साईन करवा लो।” घर की चीज़ों का हमेशा से ही बहुत ख़याल रखती है।
”यह दराज क्यों खुला छोड दिया। अलमारी भी हमेशा खुली छोड देते हो। कभी भी अपनी रखी हुई चीज़ें तुम्हें बिना ढूँढ़ मचाए मिलती हैं! मैं नहीं रहूँगी ना तब मेरी याद आएगी तुम्हें। बैठक में यह शोपीस सजाने का क्या मतलब है!”

सुरभि को घर एकदम तरतीब से सजा हुआ अच्छा लगता है। बहुत बार नरेन को कह चुकी है कि फ़िजूल के रद्दी कागज़ों को फैंक बाहर करे। पर नरेन के लिए ज़िंदगी को सिलसिलेवार तरतीब से सजाना संभव ही नहीं है। उसे तो यह भी समझ नहीं आता कि उसका कौन-सा कागज़ रद्दी है और कौन-सा काम का। वैसे पत्रिकाओं के संपादकों की राय में तो नरेन का सारा लेखन ही रद्दी है..इसीलिए तो उसकी सभी रचनाएँ या तो लौट आती हैं या फिर रद्दी की टोकरी में चली जाती हैं। कितने वर्षों से लिख रहा है नरेन। कहीं किसी भी पत्रिका में एक भी तो रचना नहीं छपी। यह अलग बात है कि वह अपने आप को कवि भी समझता है और कहानीकार भी।
”ज़रा थोड़ी देर के वास्ते बाहर जाने का। हम पेशेंट को सपंज देइंगा।” नर्स की आवाज़ नरेन को चौंका गई। सुरभि को उठकर बाथरूम में गए तो एक महीने से ऊपर हो चुका है। सपंज से ही काम चल रहा है। सुरभि को डेटॉल की महक अच्छी नहीं लगती, नर्स को यह मालूम है। सपंज के लिए पानी में यूडेकोलोन डाल रही है। सुरभि नरेन को कुछ कहना चाहती है। नरेन अपना कान सुरभि के होठों के पास ले जाता है। चुंबन का हल्का-सा स्वर उसके कानों में पहुँच जाता है। सुरभि की आँखें फिर गीली हैं, नरेन का अपराधबोध और गहरा गया है।


 नरेन ने उसे कई बार समझाने की कोशिश भी की कि उसका काम एक छाती से भी चल जाएगा। उसे लगता था शायद सुरभि से अधिक वह अपने आप को समझा रहा है। कई बार सोचा कि सुरभि की बीमारी पर एक कहानी ही लिख डाले, समझ नहीं पाया शुरू कहाँ से करे। अपने लेखन को लेकर तो उसे कई बातें समझ नहीं आती थीं। उसकी कोई भी रचना छप क्यों नहीं पाती यह सवाल हमेशा उसके सामने मुँह बाए खड़ा रहता है।
समझ तो यह भी नहीं पाता था कि सुरभि के अंतिम समय में वह अकेला ही उसके पास क्यों बैठा है। सुरभि का तो व्यक्तित्व इतना आकर्षक है कि अस्पताल में उसे देखने के लिए मित्रों का तांता लगा रहता है। पर मित्र तो हमेशा बाहर वाले ही कहलाते हैं ना! फिर अंदर वाले, सुरभि के माता-पिता, भाई, बहनें, ससुरालवाले सब कहाँ हैं?
”मैंने अपनी माँ से बात की थी।”
”इसमें कौन-सा बड़ा तीर मार लिया आपने। हर बेटी अपनी माँ से बात करती है।”
”मेरी बात को यों मज़ाक में ना उड़ाओ। वैसे तो मुझे अपनी माँ से यही उम्मीद होनी चाहिए थी। फ़िर भी इतना कोरापन! वह ऐसा कह देंगी इसकी भी आशा नहीं थी।” सुरभि की आँखें बात करते-करते गीली हो गई थीं।
”ऐ..! ऐसी भी क्या बात हो गई जो हमारी सरू को इस कदर गीला कर गई?”
”मैंने पूछा था कि पता नहीं मैं कितने दिन और ज़िंदा रहूँगी। मेरे मरने के बाद मेरे बड़े भैया अगर मेरे बच्चों को रख लें। मैंने तो यह भी कहा था कि तुम सारा खर्चा दोगे, पर. . .”
”क्यों, क्या-क्या कहा उन्होंने?”

‘उन्होंने मेरी उम्मीद की किश्ती को तैरने से पहले ही डुबा दिया। कहती हैं, देख भई गुडडी, तेरे बच्चे अलग तरह से पले हैं। उनको हम अपने पास नहीं रख सकते। अपनी मरती हुई बेटी का झूठा दिल रखने को भी उन्होंने यह नहीं कहा कि मेरी मौत के बाद मेरे बच्चों को सँभाल लेंगी।”
”हम कितने किस्मत वाले हैं सुरभि,कि हमारे रिश्तेदार हमसे झूठ नहीं बोलते।”
पर सुरभि की बीमारी भी तो झूठ नहीं..उससे अधिक कठोर सत्य तो दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। डॉ. कुरकुरे ने तो घोषणा कर ही दी थी।” मि. नरेन, मेरा ख़याल है आप टाटा हस्पताल जाकर मौरफ़ीन ले आएँ। युअर वाईफ़ नीडज दैट!”
”डाक्टर साहिब इसका क्या मतलब है? कितने दिन की मोहलत देते हैं आप?”
”बस एक महीना भर समझ लीजिए, आप।”

नरेन ने अचानक अपनी सैकंड-हैंड मारुति के ब्रेक पूरे ज़ोर से दबा दिए थे। अगर पीछे आने वाला रिक्शा चालक चौकन्ना न होता तो दुर्घटना घट ही जाती। ”सॉरी डॉक्टर!” नरेन का बदन काँप रहा था।
”आई कैन अंडरस्टैंड, रिलेक्स!”
कैसा आराम! सुरभि के शरीर की सारी हड्डियों को कर्क रोग खोखला कर गया था। सरू के बूटे की तरह लंबी सुरभि अब अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो सकती थी। नरेन सुरभि की आँखों में मौत का लंबा साया हर रोज़ देखा करता था। उसकी आँखें आज भी इसी प्रतीक्षा में हैं कि शायद उसकी माँ उसके अंतिम क्षणों में किसी भी तरह उसके पास आ जाए। इंसान की हर इच्छा कहाँ पूरी हो सकती है। सुरभि की आत्मा को कहीं भटकना ना पड़े, अपनी माँ को खोजती ना रहे।

नरेन में भी वह अपने पिता को खोजा करती है। नरेन की बहुत-सी आदतें सुरभि के पिता से मिलती-जुलती हैं। नरेन का विनोदी स्वभाव, गुस्सा,प्यार, तुनकमिजाज़ी, मिठाई का शौक, बच्चों की पढाई में रुचि, और सबसे अधिक ज़िंदादिली..यह सब उसे अपने पिता की याद दिला जाते हैं। अब ना जाने कौन-सी बातें नरेन के दिमाग़ की डायरी में सुरभि की यादें ताज़ा करती रहेंगी।
”सरू, तुम डायरी भी लिखती हो?”
”नहीं, बस यों ही।”
”अरे! मुझे तो इतने वर्षों में पता ही नहीं चला।”
”तुम्हें अपनी कविताएँ और कहानियाँ लिखने से फुरसत ही कहाँ मिलती है, जो तुम किसी दूसरे की लिखी चीज़ें पढ़ो।”
”मेरा लेखन तो बस एक मृग-मरीचिका ही है, सुरभी। मेरी कामना जितनी अधिक प्रबल होती है कि मेरा लेखन प्रकाशित हो, छपाई मुझसे उतनी ही दूर होती चली जाती है। यह बात मुझे अंदर ही अंदर आहत करती रहती है, सर्पदंश से अधिक विषदायक है यह सच्चाई कि मेरा लेखन छपने के लायक नहीं है।”
”ऐसा क्यों सोचते हो जी? और फिर छपास की भूख भी कोई भूख हुई, नहीं मुझे देखिए, जब हायर सेकंडरी में थी, तब से लिख रही हूँ। कम से कम तीन किताबों के लायक कहानियाँ तो लिख ही चुकी हूँ। आप को आज तक पता भी चला? मेरे मन में छपने की भूख है ही नहीं। बस लिखती हूँ, आत्मसंतोष मिल जाता है। कहानी फ़ाइल में रख देती हूँ। मैं तो उन्हें दोबारा साफ़ सुथरा करके लिखने की भी नहीं सोचती। यदि किसी काम से मन को सुकून मिल जाए, तो इससे बडी उपलब्धि क्या होगी?”
”मैं तुम्हारी तरह महान नहीं हूँ, सुरभि। मैं देखता हूँ, इतनी ख़राब-ख़राब कविताएँ अख़बारों में, पत्रिकाओं में छप जाती हैं। फिर मेरी ही रचनाओं की ऐसी परिणति क्यों।”

महान सुरभि की परिणति भी कितनी दर्दनाक है! उसे भूख लगी है। कुछ भी खा नहीं पा रही, उल्टी हो जाती है। अरुण दूध की बोतल ले आया है, बच्चों को दूध पिलाने वाली बोतल, उसमें थोड़ा दूध डालकर पिलाने की कोशिश में है नरेन। अपराधबोध का प्रेत फिर से तंग करने लगा है। इस दूध पीती बच्ची के बारे में उसने ऐसा सोचा ही कैसे?
अरुण को कितना स्नेह देती है सुरभि। ”इस महानगर में आपके बाद यदि मुझे किसी पर विश्वास है तो अरुण पर! वैसे आपको अरुण से कुछ सीखना चाहिए। दुनियादारी के मामले में अरुण जितना सफ़ल हो पाना कठिन ही है।”
अरुण भी रोज़ अस्पताल आता है। दो रातें तो अस्पताल में सोया। नरेन को आराम देना भी तो आवश्यक है। मन ही मन द्वंद्व जारी है, नरेन सोच रहा है, अरुण को बता देने से क्या अपराधबोध कम हो जाएगा?

सुरभि बच्चों से मिलना चाहती है। अंतरा की दसवीं की परीक्षा चल रही है। अपूर्व तो छोटा है – अभी पाँचवीं में ही है। सुरभि की बेचैन निगाहें दीवार पर जैसे कुछ ढूँढ़ रही हैं। नरेन के माथे पर पसीना छलकने लगा है। कहीं सुरभि के जाने से पहले उसका ही दम ना निकल जाए। नर्स को बुलाता है नरेन, सुरभि का दर्द बढ़ता जा रहा है। नरेन का प्रेत और बड़ा होता जा रहा है। अरुण को फ़ोन करना है। बच्चों को अस्पताल ले आए। माँ से मिल लेंगे। अरुण के स्वर में झल्लाहट है, ”भाभी को अकेला क्यों छोडा? जल्दी वापस उनके पास जा, सारी उमर साहित्यिक गोष्ठियों के चक्कर में रहा और भाभी को कभी वक्त नहीं दिया और अब उनके आखरी वक्त में भी उनके पास नहीं बैठ रहा।”
”तुम्हारे पास घर के लिए बिल्कुल भी वक्त नहीं है। कैसा है यह इंसान! मर जाऊँगी ना तब ढूँढ़ते फिरना। हाथ मलते रह जाओगे” रोने लगती है। हिचकियाँ बँध जाती हैं। ”मेरे पास बैठा करो ना, तुम्हारे बिना बिस्तर काटने को दौड़ा है। मर जाऊँगी तो कर लेना साहित्य की सेवा।”
पहली बार सुरभि ने नरेन को तुम कहकर पुकारा था। वह तो आप और जी के बिना बात ही नहीं करती थी। टेमोक्सीफ़िन और जाने क्या-क्या दवाइयाँ खा रही है। रेडियेशन, कीमोथिरेपी, मौत का डर। नरेन को पकडक़र अपने पास बिठाए रखना चाहती है सुरभि। प्यार की पराकाष्ठा है सुरभि। नरेन समझ नहीं पाता, सुरभि बनकर सोच नहीं पाता। आसान काम है क्या..सुरभि बनकर सोचना आसान काम है क्या!
इतना लेखन करके एक रचना भी ना छपवाना, क्या आसान काम है? ऐसे मुश्किल काम सुरभि ही कर समती है। सुरभि अच्छी पत्नी भी है, अच्छी माँ भी है, अच्छी मित्र भी है, अच्छी लेखक भी है।

हाँ नरेन उसकी सारी फ़ाइलें चुपके से पढ़ गया था, उसे बिना बताए। कई रचनाएँ पढ़कर उसकी आँखों में भी आँसू आ गए थे। इतना दर्द, कहाँ से कोई इतना दर्द ला सकता है अपने लेखन में। और ऐसा लेखन छपवाना नहीं चाहती, पागल है…पागल ही तो है, वरना नरेन जैसे साधारण इंसान से विवाह क्यों करती। उसकी बेहूदगियाँ बरदाश्त करते सुरभि को वर्षों बीत गए हैं।
डॉ दलजीत सिंह तो सदा नरेन को ही दोषी ठहराते हैं। साफ़-साफ़ अपनी कडवाहट नरेन पर उँड़ेल देते हैं। सुरभि को रिसर्च करवा रहे थे, गाइड़ थे उसके। सुरभि को अपने कालेज में लेक्चररशिप भी दे रहे थे। पर अंतरा बस अढ़ाई वर्ष की थी उस समय। नरेन की सास या सुरभि की सास दोनों में से कोई भी अंतरा की देखभाल को तैयार नहीं हुआ। नरेन और सुरभि दोनों ही अंतरा को ‘क्रेश में रखने को राजी नहीं थे। अंततः सुरभि नौकरी नहीं कर पाई। डॉ दलजीत सिंह के अनुसार यही एक घटना सुरभि के कैंसर का कारण भी बनी। वह तो नरेन को सुरभि का कातिल कहने में भी नहीं चूकते।
अंतरा और अपूर्व को लेकर अरुण आ गया है। डबडबाई आँखें सफ़र की तैयारी बच्चों को प्यार। अंतरा का रोना…अपूर्व चुप, माँ को देखता जा रहा है। नरेन, सुरभि, रक्त की बोतल, ऑक्सीजन का सिलंडर, नकाब..कहीं सब सुरभि के आभूषण लग रहे, सुरभि इस समय भी कितनी सुंदर लग रही है। कीमोथिरेपी, टेमोक्सीफ़िन, सब फ़ेल। आँखें माँ को ढूँढ़ रही हैं, भाई की प्रतीक्षा में हैं।
”मेरी एक बात मानोगे?”
”तुम्हारी बात कब नहीं मानता!”
‘मेरे मरने के बाद दूसरी शादी मत करना। मेरे बच्चों का जीवन नरक बन जाएगा। तुम मजबूर हो जाओगे, दूसरी माँ बस दूसरी हो जाती है..माँ नहीं रह पाती।”
”कल तो तुम कह रही थीं कि तुम्हारे मरने के बाद दूसरी शादी ज़रूर कर लूँ, ताकि तुम्हारा महत्व जान सकूँ।”
”यही तो मेरी समस्या है, जीवन में पहली बार किसी मुद्दे पर एक राय नहीं हो पा रही।”
”तुम ठीक हो जाओगी। तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम फिर पहले की तरह चलने लगोगी।”
चलना तो दूर, अब तो बैठ भी नहीं पाती, बिस्तर…बिस्तर…बस बिस्तर। पिछले दो वर्ष से बाहर की दुनिया से अब उसका संपर्क बस टेलिविजन और टेलीफ़ोन के माध्यम से है।
”तुम सारा-सारा दिन फ़ोन से ही चिपके रहते हो। कभी हमें भी वक्त दिया करो।”
”. . .”
”चुप रहने से काम नहीं चलेगा, कभी सोचा है इन बच्चों को भी तुम्हारा वक्त चाहिए। मैं कितनी अकेली हो जाती हूँ, मेरे साथ करने के लिए तुम्हारे पास कोई बात नहीं, बाहर वालों के साथ घंटों बतिया सकते हो।”
अंतरा की परीक्षा है। उसे जल्दी घर लौटना है। अरुण बच्चों को छोड़कर फिर वापस आने को कह रहा है। तीनों के वापस जाते ही कमरे में सुरभि और नरेन अकेले रह जाएँगे। नरेन के अपराधबोध का प्रेत फिर सक्रिय हो आएगा। नरेन बेचैन, सुरभि की आँखें बंद हैं, शायद सो रही हैं। अगर सुरभि को कुछ हो गया तो यह प्रेत उसे कभी नहीं छोड़ेगा। उसे जकड़े रहेगा।

प्रेत का अस्तित्व नरेन को बेचैन किए जा रहा है। उसे इस अपराध के लिए सुरभि से माफ़ी माँगनी ही है। उसे सुरभि को विश्वास दिलाना होगा कि ऐसा कुत्सित विचार उसके मन में फिर कभी नहीं आएगा। ”मुझे माफ़ कर दो सुरभि मैं सोच रहा था तुम मर जाओगी तो तुम्हारी सारी कहानियाँ और कविताएँ अपने नाम से छपवाऊँगा। मुझे माफ़ कर दो।”
सुरभि का सिर लुढक़कर स्थिर हो गया है। अब उसे रक्त या ऑक्सीजन की कोई आवश्यकता नहीं थी।

तेजेन्द्र शर्मा \ MO- 447400313433