किरनपुर के देसी गुड़ की मिठास के आगे पकवान भी फीका लागे - rashtrmat.com

किरनपुर के देसी गुड़ की मिठास के आगे पकवान भी फीका लागे

राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। बालाघाट धान की खेती के लिए प्रदेश में मशहूर है। लेकिन किरनपुर के गांव के गुड़ के मामले में भी इसकी अपनी पहचान है। यहां के देसी गुड़ की मिठास का क्या कहना। खाने वाले कहते हैं इसकी मिठास के आगे पकवान भी फीका लागे है। इसलिए कि किसान कोल्हू के जरिये गन्ने से रस निकालेत है और पूरी देसी विधी से गुड़ बनाते हैं। एक बार में 40 किलो गुड़ बनता है।यहां कटंगी, वारासिवनी, लालबर्रा, लांजी और किरनापुर के किसान गन्ने की फसल का लाभ उठा रहे हैं।बरसों से लोगों की मांग है कि यहां एक शुगर मिल होना चाहिए। ताकि उसका सही लाभ यहां के गन्ना किसान उठा सकें।


देसी  मिठास वाला गुड़
आधुनिक समय में जहां गन्ने से चीनी और गुड़ बनाने के लिए मशीनों और फैक्ट्रियों का बोलबाला है। वहीं बालाघाट की किरनापुर तहसील के दर्जन भर गांव ऐसे हैं, जहां आज भी सदियों पुरानी परंपरा सांस ले रही है। यहां गन्ने का रस आधुनिक मशीनों से नहीं, बल्कि कोल्हू के बैलों से निकाला जाता है और उसी रस से शुद्ध, देसी और खुशबूदार गुड़ तैयार किया जाता है। खेत के बीच लगा कोल्हू उसके चारों ओर गोल गोल घूमते बैल, लकड़ी की जुआड़ी से जुड़ा घर्षण करता कोल्हू और पास खड़े किसान यह सब मिलकर मानो बीते जमाने की तस्वीर को जीवंत कर देते हैं।
कोल्हू से गन्ने का रस निकालते हैं
आमतौर पर कोल्हू का उपयोग तेल निकालने के लिए किया जाता है,लेकिन किरनापुर क्षेत्र के किसानों ने इसी कोल्हू से गन्ने का रस निकालते हैं। मुरकुड़ा गांव के गन्ना उत्पादक किसान बताते हैं कि कोल्हू के बीच में लकड़ी या लोहे का मजबूत ढांचा लगा होता है, जो एक जुआड़ी के माध्यम से बैलों के कंधों से जुड़ा रहता है। जैसे-जैसे बैल कोल्हू के चारों ओर घूमते हैं कोल्हू के गियर भी घूमते हैं। इस दौरान एक व्यक्ति गन्ने को गियर में डालता है। घूमते हुए गियर गन्ने को दबाते हैं और उसका रस निकलकर नीचे रखी बाल्टी में जमा हो जाता है। इसी रस को ड्रम में भरकर गुड़ बनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न तो बिजली की जरूरत होती है और न ही किसी आधुनिक मशीन की। केवल बैलों की मेहनत, किसान का अनुभव और परंपरा से मिली तकनीक ही इस काम की रीढ़ है।


पंरपरा चली आ रही
बालाघाट जिले की किरनापुर तहसील के मुरकुड़ा, बम्हनगांव, जामड़ी, टिमकीटोला, नक्सी, मुंडेसरा सहित दर्जन भर गांवों में आज भी यह परंपरा जीवित है। यहां लगभग हर गन्ना किसान के पास अपना कोल्हू है। पीढ़ी दर पीढ़ी किसान इसी तरीके से गन्ने का रस निकालते आए हैं और गुड़ बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं। किसानों का कहना है कि साल में एक बार गन्ने की फसल ली जाती है, लेकिन यही एक फसल पूरे परिवार के लिए रोजगार और आमदनी का साधन बन जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि पहले आसपास के सभी गांवों में इसी तरह गुड़ बनाया जाता था, लेकिन समय के साथ कई जगहों पर मशीनें आ गईं। बावजूद इसके किरनापुर के इन गांवों ने अपनी पहचान और परंपरा को आज भी संभालकर रखा है।
एक बार में 40 किलो गुड़
पारंपरिक विधि से गुड़ बनाने की प्रक्रिया मेहनत भरी जरूर है लेकिन इसका परिणाम बेहद मीठा होता है। किसान बताते हैं कि एक बार में 12 पेंडी गन्ने के गट्ठर लाए जाते हैं। एक पेंडी से लगभग एक बाल्टी गन्ने का रस निकलता है। इस रस को बड़े ड्रम में इकट्ठा किया जाता है और फिर कढ़ाई में उबालने के लिए डाला जाता है। करीब 4 से 5 घंटे तक कड़ी आग में रस को तपाया जाता है। इस दौरान ऊपर तैरने वाली अशुद्धियों को सावधानी से अलग किया जाता है। धीरे.धीरे रस गाढ़ा होकर गुड़ के पाक में बदल जाता है। जब सही गाढ़ापन आ जाता है तो सांचों की मदद से गुड़ को आकार दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया से एक बार में करीब 40 किलो तक शुद्ध गुड़ तैयार हो जाता है। खास बात यह है कि इस गुड़ में किसी भी तरह के केमिकल का उपयोग नहीं किया जाता।
6 से 8 हजार की आमदनी
पारंपरिक तरीके से बने इस देसी गुड़ की बाजार में अच्छी मांग है। किसान इसे नजदीकी बाजारों में बेचते हैं। खास डिमांड होने पर यह गुड़ महाराष्ट्र के गोंदिया और छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों तक भी पहुंचता है। गुड़ की गुणवत्ता के अनुसार इसकी कीमत तय होती है। सामान्य गुणवत्ता का गुड़ 60 रुपए प्रति किलो तक बिकता है,जबकि बेहतर क्वालिटी के गुड़ की कीमत 80 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है। इस तरह एक क्विंटल गुड़ पर किसानों को 6 हजार से 8 हजार रुपए तक की आमदनी हो जाती है।
पूरे परिवार को मिलता है रोजगार
गन्ने से गुड़ बनाने का यह काम केवल एक व्यक्ति का नहीं होताए बल्कि पूरा परिवार इसमें जुटता है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण परिवार के सभी सदस्य मिलकर मेहनत करते हैं। पुरुष गन्ना काटने और बैलों को कोल्हू के चारों ओर घुमाने का काम संभालते हैं। महिलाएं गन्ने से छिलका हटाती हैं और कोल्हू में गन्ना डालने का काम करती हैं। बच्चे कढ़ाई के नीचे आग जलाने और छोटी.मोटी मदद में जुट जाते हैं। इस तरह गुड़ बनाना पूरे परिवार के लिए रोजगार का साधन बन जाता है।
शुगर फैक्ट्री की मांग
स्थानीय निवासी सुबेदार तोमेश्वर राहंगडाले बताते हैं कि सालों पहले एक पूर्व मंत्री की भी यह इच्छा थी कि इलाके में शुगर फैक्ट्री लगे। किरनापुर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान गन्ने की खेती करते हैं। यदि यहां शुगर मिल की स्थापना होती है तो किसानों को गन्ने का बेहतर दाम मिलेगा और क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। आज भी ग्रामीणों की यही मांग है कि सरकार इस ओर ध्यान दे।