डियर किलर’ की कहानियां सिर्फ जुर्म की बानगी मात्र नहीं है। इन कहानियों के पीछे अपराध का भूगोल भी है। अपराधी का चरित्र है। अपराधी का चिंतन है। हैरानी वाली बात यह है,कि हर कहानी में अपराधी का नज़रिया अलहदा है। पकड़े जाने पर अपने अपराध पर उसका चिंतन किसी को भी हैरान कर सकता है। सभी कहानियों में रोमांच है। रहस्य है। और जुर्म का मनोवैज्ञनिक तरीके से पत्रकार रमेश कुमार ‘रिपु’ ने जांच किया है।
प्यार और जुर्म के शब्दकोश बदलते रहते हैं । दुनिया में हर अपराध के पीछे कोई न कोई वजह होती है। कई बार बिना वजह के भी अनजाने में जुर्म व्यक्ति कर बैठता है। जबकि उसका इरादा किसी को नुकसान पहुंचाने का नहीं होता है। ऐसे लोग पेशेवर अपराधी नहीं होते है। लेकिन पढ़े लिखे लोगों के अपराध करने का तरीका किसी को भी हैरान कर सकता है।ऐसी ही कहानियां है ‘डियर किलर’ में। सभी नौ कहानियां हैरत अंगेज वाली हैं।रहस्य, रोमांच और थ्रीलर का कॉकटेल हैं डियर किलर.
‘डियर किलर’ की भाषा शैली,संवाद और उसके कथानक से यह कहा जा सकता है,कि इसे लुगदी साहित्य नहीं कहा जा सकता। एक दौर ऐसा भी था, जब इस तरह की कहानियों के पाठक करोड़ों में हुआ करता थे। जेम्स हेड़ली चेइज और जेम्स बांड खूब पढ़े जाते थे। हिन्दी पाठकों के लिए सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपराध से जुड़ी सनसनी खेज कथानक लेकर आए। उनके उपन्यास को पाठकों ने पसंद किया। और वो हिन्दी पाठकों के लिए जेम्स बांड,जेम्स हेड़ली और शरलाॅक होम्स बन गए। वेद प्रकाश शर्मा का थ्रिलर उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ की आठ करोड़ प्रतियां आज तक बिक गयी है। गुलशन नंदा का ‘झील के उस पार‘ की पांच लाख प्रतियां बिकी। वहीं सुरेन्द्र मोहन पाठक का उपन्यास 65 लाख की डकैती’ की 30 लाख प्रतियां बिकने की बात बताई जाती है। ऐसे में इनके लेखन को लुगदी साहित्य कहना जायज नहीं है। साहित्य समाज का दर्पण है,तो इनके उपन्यास भी इसी समाज के कथानक हैं।
‘डियर किलर’ जुर्म और प्यार की नयी भाषा वाली कहानी है। सभी कहानियां समाज की गंभीर समस्याओं को रेखांकित करती हैं। आज के दौर में महिलाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या है उनकी देह पर हमला। यह हमला घर के अंदर और बाहर दोनों जगह है। दैहिक हमला महिलाओं को अंदर से केवल तोड़ता ही नहीं,बल्कि उन्हें समाज के दैहिक शिकारियों का निवाला बना देता है। गांव की ऐसी पीड़ित महिलाओं को महिला नक्सली अपने तरीके से मदद के लिए हाथ बढ़ाती हैं। उसे भी बंदूक उठा लेने की सलाह देती हैं। ऐसी महिलाओं की कोई मदद के लिए आगे आता भी है,तो उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर। उसे सेक्स वर्कर बना देने वालों को वह जानता भी नहीं। लेकिन सेक्स वर्कर से शादी करने के बाद वह तीन महिलाओं का कत्ल कर देता है। ‘एक गलती’उस पन्ने को पलटती है,जिसमें अपराधी को लगता है, कि उस तक पुलिस कभी नहीं पहुंच सकती। पुलिस जब उस तक पहुंचती है,तो वह कत्ल की वजह बताता है। साथ ही यह भी बताता है,कि वह पांच नहीं छह कत्ल करना चाहता था। छठवां कत्ल वह अपनी पत्नी का करता। वजह सुनकर पुलिस हैरान हो जाती है।
‘डियर किलर’ की कहानियां सिर्फ जुर्म की बानगी मात्र नहीं है। इन कहानियों के पीछे अपराध का भूगोल भी है। अपराधी का चरित्र है। अपराधी का चिंतन है। हैरानी वाली बात यह है,कि हर कहानी में अपराधी का नज़रिया अलहदा है। पकड़े जाने पर अपने अपराध पर उसका चिंतन किसी को भी हैरान कर सकता है। सभी कहानियों में रोमांच है। रहस्य है। और जुर्म का मनोवैज्ञनिक तरीके से पत्रकार रमेश कुमार ‘रिपु’ ने जांच किया है। अपराधी यही सोचता है कि आखिर उससे गलती कहां हो गयी। आखिर वो क्या नहीं करता, तो सलाखों के पीछे नहीं जाता। सवाल यह है,कि क्या अपराध करके भी बचा जा सकता है?‘परफेक्ट मर्डर’ कहानी यही बताती है। ‘डियर किलर’ की कहानी के किरदार कहीं बाहर के नहीं है। हमारे आस पास के हैं। किसी भी शहर के हो सकते हैं।
दाम्पत्य जीवन में दरार आने की सबसे बड़ी वजह है,पति और पत्नी का दिल मांगे मोर में खटास पड़ना। ऐसे में पति और पत्नी अपनी चाहत के लिए दूसरा रास्ता चुन लेते हैं।‘फायर’ की नायिका अपनी सहेली की सलाह पर जिगोले से संबंध बना लेती है। बाद में पता चलता है, कि वो उसका देवर लगता है। मेट्रो सिटी की महिलाओं का दिल मांगे मोर की ललक यही सोचती है,हम खुश नहीं रहेंगे तो संस्कार का आचार डाल कर क्या करेंगे? जिगोले और वेटर के बीच हाथापाई में जिगोले को गोली लग जाती है। गोली किसने मारी। इसकी तहकीकात पुलिस भी नहीं कर पाती। लेकिन वह यह समझती है कि वेटर ने गोली नहीं मारी है। फोरेसिक एक्सपर्ट पता करता है, कि गोली कैसे लगी। जबकि गोली चलाने वाला भी नहीं जानता कि उसके हवाई फायर से किसी की जान चली गयी। गोली कैसे होटल के कमरे में वेटर को लगी,वो कहानी से पता चलता है।
‘मचलती लहर’ थ्रिलर कहानी है। इस कहानी की भाषा में गजब की मादकता है। इसी तरह ‘फिर रोए रंग’ शीर्षक ही अपने आप में कई सवाल करता है। लेखक ने इस कहानी को पूरी शिद्दत के साथ साहित्यिक लहजे में लिखा है। कहानी में गांव का प्रेम है जो मुंबई तक चला आता है। कहानी में गांव की भोली भाली सुन्दर भूमि को फिल्म अभिनेत्री बनवा देने का सब्ज बाग दिखाकर गांव का लोफर लड़का मोहित उसे मुंबई ले आता है। उसकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए उसे न्यूड माॅडल बना देता है। और उसके पैसे से ऐश करता है। संयोग्य से न्यूड माॅडल का सामना अपने प्रेमी राजकुमार से होता है। जो बड़ा चित्रकार बनने जे.जे फाइन आटर्स काॅलेज मुंबई में पढ़ने आया है। पैसे की तंगी में वह न्यूड माॅडल की तस्वीरें बनाने लगता है। दोनों के बीच हुए संवाद के बाद लड़का अपनी प्रेमिका को न्यूड माॅडल में रूप में पाकर बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसकी हत्या कर देता है। फिर कहता है,तुम पूछी थी ना रंग कब रोते हैं। और वह विस्तार से बताता है,रंग कब रोते हैं। दोनों के संवाद में प्रेम का अद्भुत दर्शन है।
‘डियर किलर’ और ‘किलर इश्क’ इन दोनों कहानियों में औरत के हैरत अंगेज करनामे है । इन कहानियों को पढ़कर भविष्य में कोई अपराधकर कर बैठे तो हैरानी नहीं होगी। इसलिए कि पुलिस नहीं बता बाती है कि अपराधी कौन है। ‘वो फोन काॅल’ से यह कह सकते हैं,कि अपराधी कितना भी शातिर है वो जब भी पुलिस के हाथ लगता है तो अपनी गलती से लगता है।
इस किताब की भाषा शैली लुगदी साहित्य से हटकर है। हर पन्ने की भाषा में रवानी है। लोच है। आकषर्ण है। यह कह सकता हॅूू कि नयी पीढ़ी के दिल में इस कहानी की भाषा घर बना लेगी। इसके संवाद गजब के हैं। इश्क के नए रंगरूटों की भाषा में झकास है। तुम तो सुहागरात की एराॅटिक चीज हो। प्रेम जब छूता है तो अंदर ही अंदर नदी की तरह बहने लगती हूँ। मेरी नाभि के नीचे की दीवार मे कितनी दरारें पड़ गयी है..उसका हिसाब लगाओगे तो पूरी जिन्दगी कम पड़ जाएगी। उसे सभी शिकारी औरत कहते हैं। क्यों कि वो शादी शुदा मर्दो का शिकार करती है। क्या तुम्हारा मन नहीं करता,मेरी देह की नदी में डुबकी लगाने को। मुहब्बत में कुछ सांसे जिंदा लाश हो जाती है। ऐसी लाशों की गिनती कभी इंसानों में नहीं होती। हमारी जैसी लड़कियों दो तीन बार न्यूड होने के बाद उनकी आँखों से शर्म का पानी मर जाता है। और न्यूड माॅडलों की तस्वीर बनाने वाले आर्टिस्ट की आँखों से कामूकता का पानी सूख जाता है।
‘डियर किलर’ की कहानियों को पढ़कर मैं यह कह सकता हॅूं कि यह किताब जुर्म करने की रणनीति बताती है। साथ ही अपराधी के जुर्म का पर्दाफाश भी करती है। भूलवश मर्डर में किसी का सहयोगी बन भी गए तो सबसे पहले अपने बचाव का प्रयास करें। हो सकता है, कभी इस कहानी को पढ़कर कोई जुर्म कर बैठे और पकड़े जाने पर पुलिस को बताए कि जुर्म करने का तरीका ‘डियर किलर’ से सीखा है।
डियर किलर – रमेश कुमार ‘रिपु’
कीमत – 290 रुपए
प्रकाशक – अद्विक प्रकाशन नई दिल्ली

-रेहान आबिद अली
