राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। डिजिटल इंडिया के दावों और स्मार्ट युग की चमक के बीच बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल गांव कुलपा,कावेली,चालीसबोड़ी और कसँगी आज भी मोबाइल नेटवर्क से वंचित हैं। हालत यह है कि लगभग 30 वर्षों से नेटवर्क समस्या जस की तस बनी हुई है। गांवों के लोग कई बार आंदोलन कर चुके,सैकड़ों दफा आवेदन दे चुके हैं लेकिन किसी भी कलेक्टर ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। जनप्रतिनिधियों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।
आपात स्थिति में बड़ी दिक्कत
गांवों में नेटवर्क की स्थिति इतनी बदतर है कि आपात स्थिति में भी फोन नहीं लगने पर स्थिति गंभीर हो जाती हैं। बीमार को अस्पताल ले जाना हो, वन्यजीवों की सूचना देनी हो या फिर प्रशासनिक मदद चाहिए।ग्रामीण आज भी पैदल चलकर ऊंची पहाड़ियों या दूसरे गांवों का रुख करने को मजबूर हैं।
आवेदन फाइलों में दफन
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार लिखित आवेदन, ज्ञापन और जनसुनवाई में शिकायतें कीं। यहां तक कि आंदोलन और प्रदर्शन भी किए गए लेकिन नतीजा शून्य रहा। हर बार केवल आश्वासन मिला।सर्वे होगा, टावर प्रस्तावित है, जल्द समस्या हल होगी।पर जमीनी हकीकत आज भी वैसी ही है। कुलपा गांव के एक ग्रामीण बताते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ाई में पीछे रह गए हैं। आॅनलाइन पढ़ाई,फार्म भरना सरकारी योजनाओं की जानकारी सब कुछ मोबाइल से होता हैलेकिन हमारे गांव में मोबाइल किसी काम का नहीं।गांव व क्षेत्र में नेटवर्क न होने का सीधा असर शिक्षा पर पड़ा है। छात्र आॅनलाइन कक्षाएं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और डिजिटल सामग्री से वंचित हैं।
आदिवासी इलाको को तरजीह नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आदिवासी क्षेत्रों को ही क्यों बार.बार नजरअंदाज किया जाता है। क्या विकास केवल शहरी इलाकों तक सीमित है। ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय बड़े.बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही ये गांव फिर अंधेरे में धकेल दिए जाते हैं। बिजली की स्थिर व्यवस्था,न सड़कें और न ही नेटवर्क। कावेली और चालीसबोड़ी के युवाओं में खासा आक्रोश है।तीन दशकों से चली आ रही इस समस्या पर प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।