एक नियामत है प्रश्नाकुल दिमाग़ - rashtrmat.com

एक नियामत है प्रश्नाकुल दिमाग़

प्रश्नों का सामना तो गौतम बुद्ध को भी करना पड़ा था। जरा-मृत्यु, सुख-दुःख के उत्तरों की खोज करते हुए,आत्मपरीक्षण करते हुए उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। लेकिन क्या इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर आज भी खोज लिए गए हैं? शायद नहीं! हमने देखा है कि छोटे बच्चों की मासूम जिज्ञासाएं तक ऐसी जटिल और विकट होती हैं, जिनके उत्तर देने में बड़े-बड़ों की घिग्घी बंध जाती है!

A blessed mind is a  questionioning mind

                                                एक नियामत है प्रश्नाकुल दिमाग़

डॉ. सेवाराम त्रिपाठी

हमारे आसपास जो घट रहा है, उससे हम अक्सर विचलित होते हैं। यह कोई आज की बात नहीं है। आदिम युगों में भी मानव अपने आस-पास हुए परिवर्तनों को लेकर अपनी तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करता ही रहा होगा! प्रागैतिहासिक काल से लेकर कांस्य और लौह युग होते हुए आधुनिक समय तक अनेक प्रकार के प्रश्न उठते रहे हैं- कुछ सार्थक, कुछ निरर्थक। प्रश्न उठना और उठाना कोई ख़राब लक्षण नहीं है, यदि प्रश्न उठेंगे तभी तो उनके उत्तर खोजे जाएंगे। इसके पश्चात फिर प्रश्न उठेंगे, फिर उत्तरों की तलाश होगी। यह एक अनवरत प्रवाह और प्रक्रिया है। प्रश्न न उठते तो लीक से हट कर सोचने वाले लोग नए-नए आविष्कार भी न कर पाते। पेड़ से सेब के फल का नीचे गिरना सनातन है लेकिन एक प्रश्नाकुल दिमाग़ हमें गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की ओर ले जाता है। भाप से किसी भी बर्तन का ढक्कन पहली बार तो उछला नहीं था, लेकिन एक कुतूहल भरी बारीक नज़र भाप की ताक़त पहचान कर रेल के इन्जन का निर्माण करा देती है!

ऊर्जा  कैसे आती है.. अनुसंधानकर्ताओं ने जिन आविष्कारों को हमारे सामने रखा उनका अस्तित्व अचानक नहीं घटित हुआ है। प्रश्नों की एक लम्बी श्रृंखला और उनके रहस्यों की खोज इसका कारक रही है। विज्ञान के प्रश्न, दर्शन के प्रश्न और मोटे तौर पर जीवन के प्रश्न गूढ़ होते हैं- मरने के बाद जीव का क्या होता है? जवाब मिला- जीव ऐसा आत्मा है जो न गलता है, न जलता है, न बहता है, न रुकता है। सम्भवतः आत्मतत्व और परमतत्व का अन्वेषण इन्हीं सूत्रों से हुआ होगा। कितना सही है और कितना ग़लत- यह हमारे मानने की प्रणाली पर निर्भर है। प्रश्न उठता है कि आदमी के भीतर जो ताक़त और ऊर्जा होती है वह कैसे आती है? उसके अन्दर कौन-सी मशीन लगी हुई है जिससे पानी निकलता है, गन्दगी निकलती है, पसीना बहता है, सर्दी और गर्मी का आभास होता है। सम्भवतः इन तत्वों की खोज या इनका रहस्योद्घाटन एक नई दुनिया रचता है। वह हमारी जानने-समझने की इच्छा को बलवती बनाता है। हमें कुछ कर गुज़रने के लिए उकसाता है। हमारे कुतूहल को नए-नए पंख और आयाम देता है। अध्यात्म की दुनिया और पदार्थ की जीवंत दुनिया के भले ही अलग-अलग ध्रुव हों, लेकिन इन सभी का रिश्ता ठोस जीवन से है।

उत्तर आज भी खोज लिए गए हैं– प्रश्नों का सामना तो गौतम बुद्ध को भी करना पड़ा था। जरा-मृत्यु, सुख-दुःख के उत्तरों की खोज करते हुए, आत्मपरीक्षण करते हुए उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। लेकिन क्या इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर आज भी खोज लिए गए हैं? शायद नहीं! हमने देखा है कि छोटे बच्चों की मासूम जिज्ञासाएं तक ऐसी जटिल और विकट होती हैं, जिनके उत्तर देने में बड़े-बड़ों की घिग्घी बंध जाती है! जैसे कि आकाशमण्डल में तारे क्यों हैं, धरती के भीतर इतने जल स्रोत क्यों है, इतनी धातुएं क्यों हैं? आदमी सांस क्यों लेता है, आदमी मर क्यों जाता है? आदमी धरती की बजाए आकाश में क्यों नहीं रहता, वह तितली या हवाई जहाज की तरह उड़ता क्यों नहीं? कम्प्यूटर की स्क्रीन पर बैठी हुई मक्खी मेरे माउस के एरो से क्यों नहीं उड़ती? हम अपनी-अपनी समझ के अनुसार वैज्ञानिक, मिथकीय या लोक-प्रचलित अवधारणाओं के सहारे उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास किया करते हैं।

ईमानदारी का  सिस्टम -आज हम अपने आस-पास नज़र डालते हैं तो प्रश्न उठता है कि ईमानदारी से जीने का कोई सिस्टम बचा भी है या नहीं? लगता है कि चोर-लबार, लुटेरे, और धूर्त हमें विकास के रास्ते पर ले आए हैं। हमारे चारों ओर उन्होंने झूठ का, भ्रष्टाचार का, आचरणहीनता एवं अराजकता का एक वितान बना डाला है। हमारा भ्रष्टाचार के लिए अनुकूलन कर दिया है। वे हमें सच्चाई की राह पर चलने ही नहीं दे रहे हैं। जबकि ऐसा है नहीं। विकास प्रकृति का एक अमूल्य और ज़रूरी नियम है। यह सच है कि सच्चाई एक ऐसा जीवन मूल्य है जिस पर चलना बहुत कठिन है। सबके सामने प्रलोभन और फ़रेब का दलदल है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में- “हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था/ शौक से डूबे जिसे भी डूबना है।“ लेकिन जब हम उत्तर खोजेंगे तो वह अपने भीतर ही मिलेगा। कबीर जब कहते हैं- “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय”, तो इसी तरफ इशारा करते हैं। मार्ग चुनने का निर्णय हमारा स्वयं का है। भले ही हमें कोई दल-दल में पटक देने के लिए मुस्तैद हो, लेकिन जब हम दलदल वाले घाट तक ले जाने वाले रास्ते पर पांव ही नहीं धरेंगे, तो भला कौन डुबा सकेगा? दरअसल हमारे भीतर एक फिसलपट्टी मौजूद है, जो लार टपकाने को मजबूर करती है और इस पर काबू न पाकर हम दूसरों पर दोष मढ़ते हैं।

नया तंत्र काम कर रहा – यह बात सही है कि अनुकूलन वह विशेष प्रक्रिया है, जो हमें एक मुद्रा या सांचे में ढाल देती है और उसी मुद्रा में हमें ख़ुशी मिलने लगती है। चीन के महान लेखक लू शुन की बोध कथा में एक मनुष्य अपने पापों के दण्डस्वरूप अगले जन्म में कीड़ा बन जाता है। लेकिन जब उसे पहचान कर नाली में से निकलने के लिए साधु पुकारता है तो वह बाहर आने से साफ मना कर देता है, क्योंकि वह वहीं परम सुखी है, गंदगी के लिए अनुकूलित हो गया है। इस सदी के शुरुआती वर्षों से ही अनुकूलन की इस कार्यवाही में नया तंत्र काम कर रहा है। यह तंत्र हर किसी को अपनी अराजकता के दायरे में ले लेता है। इस तंत्र के नियंता ऊंचे दर्जे के पारखी हैं। किसे, कैसे किस हाल में अनुकूलित रखना है, वे बख़ूबी जानते हैं। लेकिन प्रायः हर दौर में ऐसे महानुभाव होते हैं, जिन्हें अनुकूलित करने की जहमत ही नहीं उठानी पड़ती। वे स्वयं अनुकूलित होने के लिए झंडा-झोरी लिए घूमते रहते हैं।

 शिकारियों का अरण्य बनता जा रहा – ऐसे लोग मौका और दस्तूर के हिसाब से दस्तार बदल लेते हैं और समझाते हैं कि वे जो कर रहे हैं, वही सही है। वे बरगद हैं, बाक़ी सब भटकटैया। उनके गुमान देखेंगे तो आप हैरत में पड़ जाएंगे। वे छाती ठोक कर साहित्य से सच्चा प्यार करने की घोषणा करते रहेंगे और घोर असाहित्यिकों की विरुदावलियां गाकर अधिकतम लाभ उठाएंगे। अख़बार मालिकों, संपादकों, मीडिया विशेषज्ञों और उनके सिपहसालारों की जूतियां सीधी करेंगे और ‘संतन कों कहा सीकरी सों काम’ वाली त्यागी मुद्रा में दिखाई देंगे। आप उन्हें प्रणम्य मानते रहेंगे और वे परदे के पीछे प्रसाद व पारितोषिक के रूप में अपनी इमेज चमकाने और यश-संपदा बढ़ाने की जुगतें भिड़ाते रहेंगे। राजनीतिक क्षेत्र में ऐसे लोगों की बहुतायत है, मगर अब साहित्य का क्षेत्र भी अनुकूलन के शिकार और शिकारियों का अरण्य बनता जा रहा है। इस आधुनिक अरण्य-काण्ड में ऐसे-ऐसे किरदार मिल जाएंगे, जो आत्मालोचन का नाटक रचते हुए अपनी महानताओं की छतरियां फैलाते हैं और अपनी ही जैसी दूसरी महान आत्माओं से मित्रता निभाते हुए साहित्य के शॉपिंग मॉल चलाते हैं। वे क्रांतिकारी, अति-क्रांतिकारी, प्रति-क्रांतिकारी, पुनरुत्थानवादी, धर्मध्वजाधारी आदि की पंगत में समाजवादी भाव से जीमते हैं। उनकी आत्मा का अनुकूलन कुछ इस तरह हुआ है कि उन्हें फूल और कांटे समान अहसास दिलाते हैं। उज्जवल भविष्य के लिए उन्होंने सुविधाओं का समाजशास्त्र साध लिया है।

संशय के नाग फुफकार रहे -यह धतकरम देख-सुन कर हमारे सामने नए प्रश्न आकर खड़े हो जाते हैं, जो अराजकों की ओर इशारा करते हैं। उत्तर खोजने के लिए हम नज़र दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि ये किसी नवोन्मेषी आंदोलन वाले अराजक नहीं बल्कि इनका गोत्रनाम ही उच्छृंखलता है। इन अराजकों ने संस्थानों, प्रदेशों और देश भर में बवाल काट रखा है। आस-पड़ोस और पूरे परिवेश में इनकी लंबी श्रृंखला मौजूद है। इनके चलते असहिष्णुता और विद्वेष दिन-ब-दिन चौड़े और सघन हो रहे हैं। विख्यात तथ्य है कि भारतीय जीवन का विश्वास सातत्य और सामूहिकता में है। हमारे पास परंपराओं के विखण्डन के अनेक आयाम आते रहते हैं लेकिन दिक्कत यह है कि आधुनिक जीवन प्रणाली में आधुनिकता का बेहतर मनोविज्ञान शायद निर्मित नहीं हो पाया। उसमें संशय के नाग फुफकार रहे हैं। अराजक तत्व इसी आपसी अविश्वास की फसल काटते हैं। हम आधुनिक जीवनशैली का अमल नई पीढ़ी में, परिवार में, समाज में होते देखना तो चाहते हैं लेकिन भारतीय संस्कृति का मीठा रस उनके संस्कारों में उड़ेलना भूल जाते हैं। इसके फलस्वरूप जो विद्रूपताएं पैदा होती हैं, उन्हें देख-देख गुड़ में गड़ी मक्खी की तरह सिर धुनने के अलावा क्या चारा बचता है। अराजक और उच्छृंखल पीढ़ी यहीं से अपना खाद-पानी पाती है। उन्मुक्तता स्वस्थ विचार है, लेकिन उसका मर्यादित होना अनिवार्य है। नीलेश रघुवंशी की पंक्तियां हैं- “मैंने अपनी सारी जड़ें/धरती के भीतर से खींच लीं और/चिड़िया की तरह उड़ने लगी/मैं इस दुनिया को चिड़िया की आंख से देखना चाहती हूँ।” अगर हमारी दृष्टि इतनी व्यापक और सकारात्मक हो तो अराजकता भी रचनात्मक हो सकती है।

विचारों का एक अजायबघर – समाज के भूगोल पर विहंगम दृष्टि डालने पर हमें इसके समतल मैदानों, दुर्गम घाटियों, अगम्य कंदराओं, अलभ्य उपत्यकाओं, सदानीरा सरिताओं और रोमांचक जलडमरूमध्यों में तरह-तरह के प्रश्न पताकाओं की तरह लहराते मिलेंगे। हमारा समाज कोई सीधा-सादा समाज नहीं है। उसका विकास बताता है कि वह परस्पर विरोधी विचारों का एक अजायबघर है; जहां सत्‌ और असत्‌ के बीच अहर्निश संग्राम छिड़ा रहता है। अच्छा और बुरा, खाली और भरा, उठा और गिरा, हानि और लाभ, जीवन और मरण, पाप और पुण्य के चौखटे चक्कर काटते रहते हैं। हम अपने समाज के विकासक्रम को देखें तो दो तरह की शक्तियां वहां बरबस काम करती रही हैं। एक तरह की शक्तियां समाज में आतंक, अन्याय, असमानता, दुर्बुद्धि, वैमनष्यता और तरह-तरह के छल की इबारतें लिखती हैं तो दूसरे स्वभाव की शक्तियां अभय, न्याय, समानता, सद्बुद्धि, भाईचारा और जीवन पथ को सुखद बनाने के लिए संघर्षरत रहती हैं। दुर्भाग्य से दूसरे स्वभाव वालों का आसमान वक्री है। वे अपनी-अपनी जगह रोशनी फैलाने की कोशिश करते हैं, जिन्हें हम जुगनुओं की तरह टिमटिमाता देख कर आश्वस्त होते हैं, लेकिन कारगर परिणाम नहीं निकलता। सच की भाषा, लगभग चुप की भाषा है। इसके बरक्स आतंकियों, झूठों, फ़रेबियों, दोगलों और अराजकों का काम संगठित और ऐलानिया है, उनमें आपसी बिरादराना है। उनके लिए सभी तरह के विकल्प खुले हैं। वे हर जीवन-मूल्य पर डाका डाल सकते हैं। वे बुनियादी प्रश्नों को एक तरफ ठेलकर अन्याय, अत्याचार, शोषण और उत्पीड़न के नए-नए तरीके ईजाद करते हैं। उनकी ये वीभत्स कारगुजारियां और सफलताएं देख कर हम दहल जाते हैं। धूमिल ने सही कहा है-

“जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रूरत होती है?\और बिना किसी उत्तर के चुपचाप\आगे बढ़ जाता हूँ

क्योंकि आजकल मौसम का मिजाज यों है\कि ख़ून से उड़ने वाली पत्तियों का पीछा करना

लगभग बेमानी है।“

अमर होने का जतन- ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि ग़ुलामी की बेड़ियां तोड़कर हमारे पुरखों ने क्या आज़ादी इसीलिए दिलाई थी और जनतंत्र अपनाया था? आज़ादी कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। यह हमारे लिए अमूल्य है। स्वतंत्रता का सूर्य अचानक नहीं उगता, उसके लिए अनेक उत्सर्ग करने पड़ते हैं। न जाने कितने लोगों ने लाठियां झेलीं, गोलियां खाईं, कालापानी काटा, फांसी के फंदों पर झूले, निःस्वार्थ भाव से तन-मन-धन न्यौछावर कर दिया- तब कहीं जाकर अगली पीढ़ियों के आज़ादी की उन्मुक्त हवा में सांस लेने का बंदोबस्त हो सका। लेकिन कितनी शर्मनाक स्थिति है कि आज ख़ास विचारधारा के लोग आज़ादी को खिलौना समझ रहे हैं। अपने ग़लीज स्वार्थों के लिए स्वतंत्रता के महानायकों का आपस में संग्राम करा रहे हैं और ख़ुद नाख़ून कटा कर शहीद बनने का ऐलान करके इतिहास में अमर होने का जतन कर रहे हैं!

जन एक तरफ खड़ा कर दिया –आज़ादी मिलने के बाद हमने अपने लिए एक शासन-व्यवस्था का चयन किया था, जिसे जनतंत्र के रूप में जाना जाता है। लेकिन इस जनतंत्र में जन एक तरफ खड़ा कर दिया गया है और तंत्र दूसरी तरफ। आज़ादी के बाद से ही दोनों के बीच एक गहरी खाई खोदी जा रही है। दुर्बल जन को एक रस्साखींच प्रतियोगिता में जोत दिया गया है, जिसमें आए दिन महाबली तंत्र उसे लहूलुहान करके रख देता है। अब इस तंत्र को धनपशु-तांत्रिकों के हाथों सौंपने के लिए भयंकर वातावरण निर्मित करने की कबड्डी खेली जा रही है। जन की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, सामाजिक सरोकार वगैरह गए तेल लेने! मैं कभी-कभी सोचता हूं कि हमारी और हमसे पहले की पीढ़ी के देखते-देखते देश के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों का जिस तेज़ी से ह्रास हुआ है, भले- बुरे की समझ झीनी हुई है, नैतिक बोध और आत्मा की आवाज खोई है, उसमें क्या हमारी कोई भागेदारी नहीं हैं? क्या हमारी उदासीनता, निष्क्रियता, तटस्थता और मूढ़ता इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? इसका उत्तर मैं काफी हद तक हां में पाता हूं। इसका कारण यह है कि हम कगार धंसने तक अपना सामान नदी की भीट से नहीं हटाते। आखिरी वक़्त तक झेलते जाने की मनोवृति ने इस भेड़ियाधसान को पाला-पोसा है, जो आज भस्मासुर बन गया है। असमानता, ग़रीबी, भुखमरी, कुपोषण और क्षुद्रताएँ हर जगह व्याप्त होती रहीं और हम मूकदर्शक बने रहे। हमारे लोकतान्त्रिक मूल्यों को तिलांजलि दी जाती रही और हम टुकुर-टुकुर ताकते रहे। साम्प्रदायिकता नंगा नाच करती रही और हम तटस्थ बने रहे। कुपोषण, बदहाली और महंगाई सुरसा के वदन की तरह बढ़ती रही, हम प्रभावित होने तक अप्रभावित रहे। इसलिए हमेशा दूसरों के सर ठीकरा फोड़ने की जगह हमें थोड़ा अपनी नीयत पर शक़ करके भी देख लेना चाहिए।

शिक्षा भयमुक्त करती है – हमारा दुर्भाग्य यह है कि जो हो रहा है उसे होने दिया जाए की तर्ज़ हमारी जीवन शैली में ढल गई है। एक तरह का अज्ञात डर हमारे जेहन में है। हम जितना शिक्षित हो रहे हैं, उतना ही ज़्यादा अपने को डरा हुआ पा रहे हैं। ऐसा कैसे हो गया? कहा जाता है कि शिक्षा हमें भयमुक्त करती है लेकिन अब दिखता यह है कि शिक्षा ग्रहण करने वालों ने स्वयं को एक बाड़े में बंध जाने दिया है और शिक्षित करने वाला स्वयं अंधरे में हाथ-पांव मारने के लिए मज़बूर है। ऐसे में अंधेरे से कौन लड़ेगा, अज्ञान से कौन मुकाबला करेगा और हमें मुक्ति के पथ पर कौन चलाएगा? ये महाप्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते।

ऊर्ज़ावान कैसे बन पाएगा – प्रश्न उठाना आदिम प्रवृत्ति है लेकिन आज मुझे लगता है कि चारों तरफ जो अंधेरे का, अज्ञान का सन्नाटा पसरा है वह उत्तर नज़र नहीं आने देता। इस सन्नाटे का मूल भय में हैं। भय और असुरक्षा ने आदमी को कहां से कहां पहुंचा दिया! वह अन्याय, जुल्म और गै़रबराबरी का मुकाबला करने के लिए ताक़तवर और ऊर्ज़ावान कैसे बन पाएगा? इन प्रश्नों का उत्तर इस प्रश्न में ही निहित है कि हमें वर्तमान अंधकार से प्रकाश की ओर जाने से कौन रोक रहा है? उसे चिह्नित करके जय-पराजय की परवाह किए बिना ‘चरैवेति, चरैवेति प्रचलामः निरंतरम्‌” की भावना हृदय में भर कर आगे बढ़ जाना चाहिए। मार्ग में समय, समाज, सत्ता और समस्याएं कई प्रश्न खड़े करेंगी। उनका उत्तर ढूंढ़ने के आपके महाभिनिष्क्रमण में साथी रमेश रंजक की पंक्तियां- ‘‘बंधु देख भाल कर चलो/पैंतरे संभाल कर चलो।‘‘- आपका पाथेय बनेंगी।

 डॉ. सेवाराम त्रिपाठी

मो.7987921206