उषा सोमानी की लघुकथा - rashtrmat.com

उषा सोमानी की लघुकथा

उषा सोमानी की लघुकथा में जीवन की घटनाओं के छोटे छोटे स्ट्रोक्स देखने को मिलते हैं। सामाजिक विज्ञान पर उनकी गहरी समझ की वजह से कथानक रोचक और पठ्नीय कृति बन जाता है।

         उषा सोमानी की लघुकथा

                     पहला पड़ाव

आज फिर से धरा और धीरेन में बच्चों की परवरिश को लेकर बहस छिड़ गई। धरा रोते हुए बोली, “मेरे फूल से बच्चे।”

धीरेन बोला, “हमें बच्चों को फूल नहीं कैक्टस जैसा बनाना है। ताकि वे हर परिस्थिति में अपने को सुरक्षित रख सके। तुम्हारी ममता का आँचल कब तक उन्हें शीतलता दे पाएगा?” उसने अपना बैग उठाया और ऑफिस के लिए चल दिया।

धरा ने बड़बड़ाते हुए दरवाजा बंद किया। उसे धीरेन का बच्चों के प्रति कठोर व्यवहार जरा भी पसंद नहीं आता, परंतु आज धीरेन द्वारा बोला गया वाक्य उसके कानों में गूंज रहा था।

वह सोचने लगी। थोड़ी देर बाद उसने गाल पर लुढ़क आए आंसुओं को पोंछा। मोबाइल उठाया और धीरेन को फोन लगाया। वह बोली, “बच्चों की सही परवरिश का अर्थ आज समझ में आ गया। कैक्टस कठोर से कठोर परिस्थिति में भी अपने अस्तित्व को संभाल ही लेते हैं। उनकी विशेष संरचना से ही यह गुण उन्हें वरदान के रूप में मिला है। मुझे अपने बच्चों में ऐसे ही गुणों का विकास करना है।”

धीरेन के चेहरे पर चौड़ी मुस्कान छा गई। वह बच्चों के व्यक्तित्व विकास का पहला पड़ाव पार कर चुका था। वह बोला, “हमारे बच्चे निश्चित रूप से भविष्य में कामयाबी के नए शिखर को स्थापित करेंगे। यह तभी संभव हो पाएगा, जब तुम साथ दोगी।”

धरा का मन हल्का हो गया। वह बोली, “बच्चों के समुचित विकास के लिए हमारा एकमत होना अनिवार्य है।” उसने फोन रखा और गुनगुनाते हुए कमरे में फैले हुए सामान को करीने से जमाने लगी।

                   गहरे रंग

पलाश के पेड़ लाल फूलों से लदे थे। होली का त्योहार आने वाला था। अजय और संजय ने दोस्तों के साथ होली की तैयारियाँ शुरू कर दी।

उन्होंने एक सूखे पेड़ को गाँव की मुख्य सड़क पर रखकर रास्ता रोक दिया। फिर टोली बनाकर बैठ गए। थोड़ी ही देर में सड़क पर आवाजाही शुरू हो गई। जब सामने से किसी को वे आता देखते तो रास्ते के बीच खड़े हो जाते और एक सुर में गाते, “होलीआई होली आई, झोली भर खुशियाँ लाई।”

उन्हें कोई खुशी से चंदा दे जाता, तो किसी से जबरदस्ती मोल भाव कर, समझौता करवसूला जाता। एक दिन चंदा इकट्ठा करते समय अजय और संजय, मंगल काका सेउलझ गए। उन्होंने चंदा देने से मना कर दिया।

कोरोना के समय मंगल काका का परिवार महानगर छोड़कर, गाँव आ गया था। अब वे पास शहर में सड़क किनारे फल सब्जी बेचने का काम करते। उनका बेटा दिनेश स्कूल में छुट्टी के दिन उनके काम में हाथ बटाता।

मंगल काका के इस व्यवहार से संजय नाराज हुआ और ऊँची आवाज में बोला,“मंगल काका ने चंदा नहीं दिया, हम दिनेश को अपने साथ नहीं खिलाएंगे।”

अब वे मंगल काका के परिवार का बहिष्कार करने की योजना बनाने लगे। तभी टोली से रचित बोला, “तुम्हारी नाराजगी गलत है। मंगल काका के पास तंगी है। हमें उनकीपरेशानी समझनी चाहिए। हम इकट्ठे किए गए पैसों से पटाखे खरीदेंगे जो जलकर प्रदूषण फैलाएंगे।”

रचित की बात से एक अजीब सी खामोशी छा गई। अजय ने सड़क के बीच रखे, सूखेपेड़ को सड़क के किनारे सरका दिया। संजय खड़ा हुआ। अपने दोनों हाथों से कपड़ोंकी धूल झाड़ते हुए बोला, “पटाखो के बिना होली का मजा!” संजय नाराज होकररचित के साथ धक्का-मुक्की करने लगा।अजय ने बीच बचाव किया। वह बोला, “होली का मजा कम नहीं होना चाहिए, तुम्हारे पास योजना है तो बताओ?”

संजय नाराज होकर बोला, “मुझे कोई योजना नहीं सुननी।” वह साइकिल पर बैठा और घर की ओर रवाना हो गया।

शाम ढल चुकी थी। अंधेरा होने लगा। अचानक गाँव की बत्ती गुल हो गई। संजय की साइकिल सड़क पर बने गड्ढे में उछली। उसका संतुलन बिगड़ा और वह सड़क के दूसरी तरफ गिर गया। उसने अपने सिर पर हाथ लगाया। वह डर गया और जोर से चिल्लाया। मंगल काका का घर पास ही था। वह चिल्लाने की आवाज सुनकर, दौड़े आए।

दिनेश भी पिताजी के पीछे-पीछे, वहाँ पहुँच गया। मंगल काका संजय को गोद में उठाकर अपने घर लाए। उसके सिर में मामूली चोट थी। उन्होंने उसके सिर पर दवा लगाकर पट्टी बाँधी। थोड़ी देर बाद दिनेश, संजय को साइकिल पर बैठाकर उसके घर छोड़ आया।

संजय चुपचाप बिस्तर पर लेटा था। माँ ने पूछा, “बहुत दर्द हो रहा है?”

संजय माँ से लिपटकर, फफककर रोने लगा। माँ उसे पुचकारते हुए बोली, “बेटा

मामूली चोटें है ठीक हो जाएगी। घबराओ मत।”

संजय सिसकियाँ लेते हुए बोला, “मैं चोट के कारण नहीं रो रहा हूँ। मैंने आज मंगल काका के साथ बुरा व्यवहार किया।” उसने होली के चंदे को इकट्ठा करने का पूराघटनाक्रम माँ को बताया।

माँ संजय के बालों को सहलाते हुए बोली, “बेटा, त्योहार खुशियां बाँटने के लिए मनाएँ जाते है। होली का त्योहार तो सबसे सुंदर है। एक दूसरे को रंग लगाने का मतलब है,रिश्तो को मजबूत और गहरा बनाना। अब सो जाओ, रात गहरी हो गई है।”

दूसरे दिन सुबह संजय अजय के घर गया। फिर वे दोस्तों के साथ मंगल काका के घर गए। उन्होंने मंगल काका से माफी माँगते हुए, होलिका दहन का निमंत्रण दिया।दिनेश होली का निमंत्रण पाकर खुश था। उसने घर के बाहर सूख रहे उपले उठाकर,संजय की ओर बढ़ा दिए। वह बोला, “मेरी तरफ से होली का चंदा।”

संजय ने जोश में आकर, दिनेश को गोदी में उठा लिया। वह गाने लगा, “होली आईहोली आई, झोली भर खुशियाँ लाई।” सभी दोस्त उसके साथ ताली बजाकर गाने और नाचने लगे।

उषा सोमानी

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