आज सरकार की असहजता के पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं। पहला, वह डर कि सदन के भीतर उठे प्रश्न देश के बाहर गूंजेंगे। हाल के दिनों में सामने आए विवाद चाहे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित दस्तावेज़ हों या पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की पुस्तक में किए गए उल्लेख ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सत्ता सहज नहीं दिखती।
सत्ता के गले में परेशानी की घंटी \ लेख

– विजयशंकर चतुर्वेदी
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद के भीतर कुछ बातें रखना चाहते हैं-लेकिन उन्हें एक पंक्ति भी बोलने नहीं दी जा रही। यह दृश्य अब सदन के भीतर सीमित नहीं रहा। वह संसद भवन के बाहर आकर पत्रकारों और नागरिकों से कह रहे हैं कि वे लोकसभा में तीन–चार ठोस मुद्दों पर बोलना चाहते थे, लेकिन जैसे ही वह खड़े होते हैं, सत्तापक्ष की बेंचों से ऐसा शोर उठता है कि उनकी आवाज़ नियमों के हवाले कर दी जाती है। प्रश्न यह नहीं है कि वह क्या बोल रहे हैं; प्रश्न यह है कि उन्हें बोलने ही क्यों नहीं दिया जा रहा।
राहुल गांधी का कहना है कि वह सबसे पहले उस हालिया व्यापार समझौते पर सवाल उठाना चाहते थे, जो अमेरिका के साथ हुआ है-और जिसमें, उनके अनुसार, भारतीय किसानों के हितों को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया। वह यह पूछना चाहते थे कि जिस कृषि क्षेत्र पर देश की बड़ी आबादी निर्भर है, उसके हितों को इस डील में किस तरह सुरक्षित किया गया। यह कोई असंसदीय विषय नहीं है। यह व्यापार नीति, कृषि और आजीविका से जुड़ा प्रश्न है—और संसद ऐसे ही सवालों के लिए होती है। लेकिन यह प्रश्न सदन के रिकॉर्ड पर आने से पहले ही शोर में डुबो दिया गया।

दूसरा मुद्दा, जिस पर वह बोलना चाहते थे, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। उनका कहना है कि चीन के साथ सैन्य टकराव के समय राजनीतिक नेतृत्व ने निर्णायक भूमिका नहीं निभाई और मौके पर मौजूद सैन्य नेतृत्व पर ही निर्णय छोड़ दिया गया। यहाँ प्रश्न सेना की क्षमता का नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी का है। भारत की संवैधानिक व्यवस्था में युद्ध या सैन्य टकराव के समय अंतिम निर्णय राजनीतिक नेतृत्व करता है, न कि सेना। रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री निर्णय की स्थिति में होते हैं—यही लोकतांत्रिक और संवैधानिक परंपरा है। यदि इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो उनका उत्तर संसद के भीतर दिया जाना चाहिए था। लेकिन यह विषय भी बोलने से पहले ही रोक दिया गया।
तीसरा मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एक विवाद से जुड़ा है-अमेरिका में सामने आई घिनौनी “एप्सटीन फ़ाइल” से। राहुल गांधी का दावा है कि इन दस्तावेज़ों में प्रधानमंत्री के नाम का उल्लेख होने की चर्चा सार्वजनिक क्षेत्र में है, और ठीक उसी समय एक व्यापार समझौता, जो महीनों से लंबित था, अचानक बिना किसी बुनियादी बदलाव के हस्ताक्षरित हो गया। उनका सवाल यह है कि क्या इन दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध है, और यदि नहीं, तो सरकार इसे स्पष्ट क्यों नहीं करती। यह प्रश्न आरोप नहीं, स्पष्टीकरण की माँग है—और संसद ऐसे ही स्पष्टीकरण के लिए होती है।
इन तीनों मुद्दों में समानता यह है कि ये सभी सार्वजनिक हित, राष्ट्रीय नीति और जवाबदेही से जुड़े प्रश्न हैं। इनमें से कोई भी विषय ऐसा नहीं है, जिसे असंसदीय कहा जा सके। फिर भी नेता प्रतिपक्ष को न केवल रोका जा रहा है, बल्कि उन्हें यह भी डिक्टेट किया जा रहा है कि वे क्या बोल सकते हैं और क्या नहीं। यहीं प्रश्न उठता है—क्या नियमों का उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना है, या असुविधाजनक बहसों से बचना? अध्यक्ष की कुर्सी यदि विपक्ष को ही ‘समस्या’ मान ले और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों की गंभीरता को न समझे, सत्तारूढ़ दल व उसके नेतृत्व के बचाव में उतर जाए, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यहाँ यह भी देखना ज़रूरी है कि नियमों का प्रयोग समरूप है या चयनात्मक। यदि सत्तापक्ष के सांसदों को दस्तावेज़ पढ़ने, आरोप रखने और लंबी व्याख्याएँ देने की छूट है, जबकि विपक्ष को एक पंक्ति पर रोका जाता है, तो नियम नहीं, नियत सवालों के घेरे में आती है। निष्पक्षता केवल वास्तविक होना पर्याप्त नहीं; उसका दिखना भी उतना ही आवश्यक है—और अध्यक्ष की कुर्सी इसी दृश्य निष्पक्षता की कसौटी पर परखी जाती है।
यह भी याद रखना चाहिए कि संसद सरकार की प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं है। वहाँ सत्ता का एजेंडा नहीं, संविधान का एजेंडा चलता है। बहुमत सरकार चलाता है; संसद लोकतंत्र चलाती है। जब अध्यक्ष की भूमिका सरकार और संसद के बीच की रेखा धुंधली कर देती है, तब वही क्षण लोकतांत्रिक गिरावट का संकेत देता है।
इस क्षरण के परिणाम केवल संसद तक सीमित नहीं रहते। भारत में सत्तापक्ष को प्राप्त मत प्रतिशत और विपक्ष को मिले मतों को देखें, तो स्पष्ट है कि सत्ता में बैठी सरकार देश की अल्पमत राय का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि विपक्ष के पीछे कहीं अधिक नागरिक समर्थन होता है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष की आवाज़ दबाना, वस्तुतः उन करोड़ों मतदाताओं की आवाज़ दबाना है जिन्होंने सरकार को नहीं चुना। लोकतंत्र में बहुमत का अधिकार शासन करने का है, खामोश कराने का नहीं।
यहीं पर संविधान की आत्मा सामने आती है। भारतीय संविधान के शिल्पकार बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा बहुमत की निरंकुशता है। विपक्ष इसलिए आवश्यक है कि वह सत्ता को निरंकुश होने से रोके, प्रश्न पूछे, और जनता की आशंकाओं को सदन तक पहुँचाए। यदि विपक्ष को बोलने नहीं दिया जाएगा, तो संसद केवल औपचारिक स्वीकृति की मशीन बनकर रह जाएगी—जहाँ निर्णय पहले से तय होंगे और बहस केवल औपचारिकता।
आज सरकार की असहजता के पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं। पहला, वह डर कि सदन के भीतर उठे प्रश्न देश के बाहर गूंजेंगे। हाल के दिनों में सामने आए विवाद चाहे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित दस्तावेज़ हों या पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की पुस्तक में किए गए उल्लेख ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सत्ता सहज नहीं दिखती। जब यह कहा जाता है कि सीमाओं पर तनाव के समय राजनीतिक नेतृत्व ने निर्णय सेना पर छोड़ दिया, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम निर्णय का दायित्व किसका है। भारत में सैन्य कार्रवाई का निर्णय राजनीतिक नेतृत्व करता है—यह परंपरा भी है और संवैधानिक सिद्धांत भी। ऐसे प्रश्नों से बचने, और अपनी नाकामियों व कुकर्मों को पर्दे के पीछे छिपाने का सबसे आसान तरीका यही होता है कि विपक्ष का गला घोंट दिया जाए।
आज के राजनीतिक माहौल में फैज अहमद फैज़ की ये पंक्तियाँ याद आती हैं- “निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ, चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले।” जब संसद में विपक्ष को सिर उठाकर बोलने नहीं दिया जाता, तो यह रस्म केवल गलियों तक सीमित नहीं रहती; वह सदन के भीतर भी प्रवेश कर जाती है।

– विजयशंकर चतुर्वेदी
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