फिल्मी पटकथा की तरह डाॅ यशोधरा भटनागर लघुकथा लिखती हैं। एक के बाद एक घटित होने वाली घटनाओं को उन्होंने कागज पर उतारा है। सभी कथाएं वास्तविकता के लिबास में हैं। कुछ लोग चकित हो सकते हैं कि क्या जीवन भी घटित होने वाली छोटी- छोटी घटनाएं भी लघुकथा का हिस्सा होती हैं। इन लघुकथा से पता चलता है कि नैतिक गिरावट और रुपए में कोई अंतर नहीं है।
इलाज

“ऐ लच्छू!ऐ कलुआ!ऐ रामेसर ! तुम सबन का कर रये इतै? चलो उतै कों,स्वास्थ्य परीक्षण सिविर लगो है स्वास्थ्य परीक्षण हुई है।”
“ काय भइया का हुई है उतै कौन?
“नेता जी को तुम लोगन की बौत ही फिकिर आय।जा से जे कैंप लगवाओ है।जामे तुमाए नाक,कान,पेट सबई कछु चेक हुई हैं।”
” अच्छा भइया! तनिक जे बताओ आँखन के डाकदर सोई आ हैं उतै?” कहते हुए लच्छू की आँखों में उम्मीद जाग गई।
“आँखें कमजोर हों, बीमार हों, खराब हों तो इलाज, दवाई और आपरेशन सब कछु फिरी में हो जै है।”टोपी वाला उत्साह से बोला।
“भइया का बताए हम… हमाई आँखन में न जाने कौन सी बीमारी लग गई है ,सब कछु दिखाई देत है बस रोटी नईं दिखत है।हाथ-पैरन में कमजोरी सी लगत है,पेट में सोई मरोड़ उठत रहत है।”कहते हुए लच्छू ने गहरी सांस ली और अपने हाथों से अकुलाते पेट को कस कर दबा लिया।
“चलें भइया भौतई लेट हो रहे हैं।पूरे गाँव के लोगन को इकट्ठो करनो है।”टोपी वाले ने हड़बड़ी में अपनी टोपी संभाली और… मोटरसाइकिल की तेज घुर्र-घुर्र, घुर्र-घुर्र…धूल का एक गुबार उठा जिसने लच्छू, कलुआ और रामेसर के आँख ,नाक,कान और मुँह को ढक लिया।

मिट्टी पिंड दी
“मिन्नी हुण थोड़े दिन वास्ते एत्थे आ जा।रह जा थोड़े दिन अपनी बीजी कोल।” बीजी की आवाज़ और आवाज़ में दर्द अभी भी भीतर तक महसूस हो रहा है।न जाने क्यों मन अनजाने भय से घबराने सा लगा।
पहली फ्लाइट से ही भारत चली आई।
बार-बार बीजी का चेहरा आँखों के सामने घूमने लगा। ममता से पगी बड़ी-बड़ी आँखें,चंपई रंग,ऊँची-पूरी सिक्खनी। बीजी दादी कम दोस्त ज्यादा है।तीन बरस की ही तो थी जब मॉम और डैड अमेरिका शिफ्ट हो गए थे। कितना रोई थी बीजी से चिपक कर। धुंधली यादों में वह चित्र उसकी आँखों में आज भी बसा हुआ है।बस वीडियो कॉल से ही बीजी से बातें होती रहीं पर उसका दिल बीजी से पहले सा जुड़ा रहा।
छुट्टियों में बीजी के पास पिंड आती तो दिन पंख लगा कर फुर्र से उड़ जाते।
खेत-खलिहान,नहर की सैर के लिए बीजी अपने साथ ही ले जातीं। नन्हीं मिन्नी से लेकर युवती मिन्नी तक के सभी सवालों के जबाब बीजी के पास होते।
“बीजी ये पीले फूल किन्ने सोने हैं।”
“पुत्तर ऐ सरों दे खेत ने।
फिर सरसों,मैथी, बथुआ,मूली ,गाजर, टमाटर सब दुपट्टे में बाँधे घर लौटते।
“ हीरन तो महंगे असी रोहलती मिट्टी
बन हकदार मेरी रग-रग दी….”
गाते बीजी कहीं खो सी जातीं।
शाम को लाल तप्त तंदूर पर बीजी कुरकुरी रोटी उतारतीं तो मैं मंत्र मुग्ध सी उन्हें देखती रहती।
“लै हुण रोटी खा ले।” बीजी बड़े प्यार से थाली मेरे हाथ में थमा देतीं।
मा-छोले की दाल,आलू-गोभी, टमाटर की सब्जी,कटी हुई मूली और मक्खन से तर तंदूरी रोटी। अमेरीका में कैसे तरस जाती है बीजी के हाथ के खाने के लिए।
एयरपोर्ट से पिंड का रास्ता बहुत ही लंबा लग रहा था।मन में उथल-पुथल और बढ़ गई। वाहेगुरु मेरी बीजी की रक्षा करना।
सरदार हरपाल सिंह की कोठी पहुँचते ही सामान गुलाबो को थमा मैं बीजी के कमरे की ओर दौड़ गई।
“आ गया मेरा पुत्तर!मेरा बच्चा!”
“पैरी पौना बीजी।ओह व्हाट हैपेंड टू यू माय फ्रैंड?हाऊ आर यू?” चारपाई पर लेटी बीजी से लिपटते हुए मैंने कहा।
“मरजानिए गिटपिट ही करेगी या …”बीजी ने नकली गुस्सा करते हुए कहा तो मैंने बीजी को अपनी बाँहों के घेरे में और ज़ोर से कस लिया। बीजी की वही खूश्बू अंदर उतर आई जब बीजी अपनी छाती से चिपका कर, लोरी गाकर मुझे सुलाते थीं।
“कितने कमज़ोर हो गये हो बीजी आप!”मेरी रुलाई फूट पड़ी।
“बुढ़ापा है लाडो!वाहे गुरु दा बुलावा कदों आ जाए पता नहीं।बस तेरे विच जीव अटका होया सी।”
“नहीं बीजी ऐसा नहीं कहते।”मैंने बीजी के मुँह पर अपना हाथ रखते हुए कहा।
बीजी मुश्किल से बैठ पा रहीं थीं। एक बारगी लगा कि क्या वाकई में बीजी मेरे ही इंतजार में बैठीं हैं। उनके हाथ की पकड़ ढीली पड़ रही थी। दाएँ हाथ की मुठ्ठी में कस के दबा रखी लाल कपड़े की पोटली मेरी ओर बढ़ा दी।
“लाडो तेरा ही इंतज़ार कर री सी मैं।हुंण तू आ गई है ले संभाल अपनी थाती।” तिल्ले वाली कढ़ाई की लाल मखमल की पोटली बीजी ने मेरे हाथ में थमा दी। धीमे से उनके होंठ बुदबुदाए-” पिंड दी मिट्टी…वतन दी मिट्टी… ”
दूर कहीं आवाज सुनाई दे रही थी “हीरन तो महंगे असी रोहलती मिट्टी बन हकदार मेरी रग-रग दी…”
मैं बीजी की अंतिम भेंट हाथों में दबाए बीजी को विदा कर रही थी।

पत्थर दिल
पत्थर हूँ मैं !पत्थर!पड़ा हूँ,बस पड़ा ही रहता हूँ।
कोने वाले मकान के मालिक ने मुझे सड़क के मोड़ पर रख दिया ताकि उसकी अपनी परिधि बढ़ जाए। आते-जाते तो बहुत से लोग हैं,गिरते भी हैं, चोटिल भी होते हैं ।पर किसी ने भी मुझे न सरकाया।
आज साइकिल सवार नन्हा बिल्लू मुझ पर गिर गया। सिर से खून का फव्वारा बहने लगा। वह बहुत जोर से रोने लगा। रोना तो मुझे भी आ रहा था पर प्रकृति ने मुझे आंसू दिए ही नहीं। बस मन बहुत दुखी हो गया। कितना लाचार हूँ मैं! अपनी जड़ता को कोसता हूँ।
भला हो मैडम जी का। मैडम ने मुझे रक्तरंजित देखा तो कुछ युवकों की मदद से मुझे सड़क के एक ओर पेड़ के नीचे ,सरका दिया।
कुछ राहत महसूस हुई। दोस्तो! पत्थर हूँ तो क्या? मैं किसी को भी चोट पहुँचाना नहीं चाहता। चोटिल हो सकता हूँ पर किसी का खून नहीं बहाना चाहता। पेड़ -पौधों और वल्लरियों के साथ मैं बहुत खुश हूँ। पत्थर दिल होना पत्थरों की फितरत नहीं…।

माँ
कैसी होगी माँ? जब से ओल्ड एज होम से केयर टेकर का कॉल आया है उसे एक पल के लिए भी चैन नहीं।फ्लाइट में बैठे-बैठे अतीत उसकी आँखों के सामने से गुजरने लगा।
अच्छे से बहुत अच्छे जॉब के लिए वह अपने शहर से दूर चला आया पर इतनी दूर भी नहीं। हर सैटरडे-संडे माँ के पास चला जाता।
धीरे-धीरे बढ़ती उम्र के चलते माँ की तबीयत गिरने लगी।वह अकेला माँ की देखभाल करें या अपनी नौकरी संभाले? ऐसी नौकरी जिसमें दिन के पूरे चौबीस घंटे भी समा जाएँ तो कम।माँ की देखभाल के लिए वह उन्हें अच्छे ओल्ड एज होम ‘सांझी छत’ में ले आया।सैटरडे-संडे माँ से मिलने का क्रम जारी रहा पर बेहतर और बेहतर पैकेज की चाह और ज़रूरत के चलते बदलती नौकरियाँ, बदलते शहरों के कारण माँ और उसकी दूरी बढ़ती चली गई।
और आज यह फोन कॉल! सड़क पर भागती टैक्सी संग भागता उसका मन रो पड़ा।
टैक्सी ‘सांझी छत’ रुकी और वह बेतहाशा दौड़ता हुआ माँ के कमरे में पहुँचा।
माँ दीवार की ओर करवट लिए लेटी थी शायद सो रही थी।
“मुझे माफ कर दे पर क्या हो गया क्या करता?मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ। क्या करूँ नौकरी ही ऐसी है बारह बारह घंटे काम। पहले सैटरडे-संडे मिलता था… अब वह भी नहीं पर तुझे फोन तो करता था न।” माँ से लिपट वह सुबकने लगा।
माँ ने क्लांत मुख से बेटे की ओर देखा और बोली -”बेटा पेपर में न्यूज़ थी-ऑफिस वर्क प्रेशर के चलते एंप्लॉई ने सुसाइड… “और उससे लिपट वह फफक कर रो पड़ी।

डॉ यशोधरा भटनागर
-9425306554