चार लघु कथाएं - rashtrmat.com

चार लघु कथाएं

शिवानी खन्ना अमीरी गरीबी,सामाजिक प्रपंच,और बुनियादी समाजिक समस्याओं से मुठभेड़ करते हुए एक विमर्श का वातावरण बनाती है। और पाठकों को उसमें शामिल होने का निमंत्रण देती है। वो जानती है केवल लिखने मात्र से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला,फर्क प्रगतिशील सोच से आएगा।यहां उनकी चार लघुकथा दी जा रही है। आप पढ़िये और विचार करिये।

                                                                  लघुकथा

                                                मटर पनीर

अमित की तेहरवी पर अमिता के आगे थाली में जब मटर पनीर परोसा गया तो बचपन की बातें याद आ गयी
अमित मटर पहले खाता क्योंकि उसे पनीर पसंद था और मटर नहीं । पूरी ज़िंदगी वह मटर खाता रहा की बाद मे पनीर खाएगा … पर ज़िंदगी मटर खाने के बाद पनीर खाने का मौक़ा दे ये ज़रूरी नहीं ।
ज़िंदगी भर पैसे जोड़ता रहा … गिन कर चार जोड़े कपड़े ही रहते … भाभी को कड़ी हिदायत थी की जब तक रफ़ू हो सके चलाओ
१० रुपए बचाने के चक्कर में दूर फल सब्ज़ी ख़रीदने जाता पैदल आता जाता। एक चप्पल कई बार जुड़वाता … बच्चे देखते थाली में पनीर है पर उन्हें भी खाने की मनाही थी इसलिए वे भी चिढ़ते
एक दिन बीमारी ने दस्तक दी.. नीम हकीम से इलाज कराया …
आज अमित नहीं था पर उसके हिस्से का पनीर वैसे ही था काश थोड़ा पनीर चख लिया होता …

                                                   खर्राटे

“ आँटी जीं बरामदे में पोछा रहने दूँ “
बरामदे से खर्राटों की आवाज़ सुन मंजु बोली ।
“ नहीं लगा ले तेरे अंकल ऐसे ही सुस्ता रहे होंगे “ सोफ़े पर बैठी पुष्पा ने कहा ।
“ आँटी जी ,अंकल जी के खर्राटों की कितनी ऊँची आवाज़ है , आप रात को सोती कैसे है ? पुष्पा की चहेती मंजु ने पूछा ।
“ नज़र ना लगा , इनके खर्राटों से पता चलता है ठीक है । आवाज़ आती रहती है तो मैं निश्चिंत हो जाती हूँ”।
बरामदे में ऊँघते सुरेंद्र के चेहरे पर मीठी याद की मुस्कान थी ।
आज से 48 साल पहले जब दरवाज़े में खड़े उन्होंने सुना कि उनकी नई नवेली दुल्हन मायके में अपनी माँ से शिकायत कर रही थीं “ माँ कैसे आदमी से शादी कर दी है । इतनी ज़ोर से खर्राटे लेते है , नींद आती ही नहीं ।लड़की से इतने सवाल पूछे जाते है , खाना बनाना , सीना पिरोना , यहाँ तक कि चाल , आवाज़ कैसी है ? लड़के को कोई सुला कर नहीं देखता की खर्राटों की आवाज़ किस रेल गाड़ी से मेल खाती है

                                                       परसेंटेज

“आओ नेहा तुम भी मुँह मीठा करो “कहते हुए प्रीति की मम्मी ने काजू कतली का डिब्बा आगे कर दिया ।
“आंटी जी कंग्राट्युलेशन्स … प्रीति कहाँ है “नेहा ने हड़बड़ी में कहा ।
“ऊपर कमरे में “
नेहा का मन बहुत विचलित था सरपट सीढ़ियाँ चढ़ गई ।
दरवाज़ा खुला था प्रीति बेड पर औंधी लेटी हुई थी ।
“ प्रीति! प्रीति !तू ठीक है ना । नेहा की आवाज़ में बैचैनी थी ।
हाँ ! हाँ गदाधारी भीम शांत क्या हुआ ? अपनी मस्त अंगड़ाई लेती प्रीति बोली ।
“ मुझे अभी प्रणव का मेसेज आया कि तुम्हारी शादी फिक्स हो गई है … कोई ज़ोर ज़बरदस्ती से घबराना नहीं .. वोह उसके पापा के दुबई से आते ही तुम्हारे घर आएगा “ ।एक साँस में नेहा ने संदेशा दिया ।
“ हाउ स्टुपिड ! व्हाट ऐन इमोशनल फूल “
मैं कोई उन्नीसवी सदी की लड़की हो जहाँ लड़की से बिना पूछे उसे किसी अनजान के साथ बांध दिया जाता था । यह सब मेरी मर्ज़ी से हो रहा है “ बालों को सही करती प्रीति बोली ।
“पर तुम तो प्रणव के साथ काफ़ी सीरियस थी … गोवा भी गई थी ? “नेहा ने अचरज से पूछा
“हा हा ! गोवा जाने से कोई शादी फिक्स हो जाती है ? “नेहा की बात को मज़ाक़ में लेते हुए प्रीति ने कहा ।
“देख तू चिल कर और बात समझ
रमन माँ बाप का इकलौता बेटा है और प्रणव दो भाई
यानी रमन का 100 % प्रणव का 50 %
रमन के पापा एक फैक्ट्री है मतलब 100 %
प्रणव के दादा की २ … एक उसके चाचा की एक उसके पापा की एक तो प्रणव को मिला एक फैक्ट्री का 50%
रमन के पापा की हज़ार गज़ की कोठी ।
रमन को मिला 100 %
प्रणव की हज़ार गज़ की कोठी पर चाचा के पाँच सौ और प्रणव के पापा के 500 आगे चलके प्रणव को मिले 250 गज़ यानी 25 % स्कूल में मुझे लगता था यह क्या मैथ्स ( गणित)में परसेंटेज पढ़ाते है पर कुछ दिन पहले मुझे यह परसेंटेज समझ आया तो मैंने अपनी लाइफ में अपना लिया … मम्मी पापा भी खुश की उनकी पसंद के लड़के से शादी कर रही हूँ कल को नहीं निभी तो कह सकती हूँ आप ही ने ढूँढा था । “गणित का पूरा हिसाब समझाते प्रीति ने कहा ।
“और हाँ ;मैंने ही प्रणव को मेसेज कर के बताया था और कहा था मैं खुश हूँ और वो भी लाइफ में आगे मूव ऑन करे । मैंने उसका नंबर ब्लॉक कर दिया है। अगर तुम्हें करे तो एक बार समझा देना नेक्स्ट टाइम ब्लॉक कर देना । “प्रीति ने हिदायत दी ।
“अब यह सब पास्ट भूल ,आ तुझे रमन की और अपने रोके की पिक्स दिखाती हूँ “कहते हुए प्रीति ने अपने फ़ोन को नेहा के आगे कर दिया ।

                                                    बूढ़ा या बुज़ुर्ग

“ क्या हुआ बस दो ही चक्कर” पूछते हुए कर्नल वर्मा कमलेश बाबू के पास बेंच पर बैठ गए ।
“हाँ हिम्मत नहीं होती और मन भी उदास है “कमलेश बाबू ने दुःखी मन से कहा
“क्यों घर परिवार सब है ,बेटा बहू पोता पोती सब बहुत सभ्य प्यार करने वाले है “कर्नल वर्मा बोले
“अब कुछ ग़लत होगा तब बोलूँ नहीं
कामवाली ने पोछा नहीं लगाया मैंने बोला तो बहू बोली ठंड बहुत है भला ये कैसे सफ़ाई हुई … बच्चे देर रात तक जागते है देर से उठते है ,बूढ़ा हो गया हुँ मेरी बात का कोई मोल नहीं “ कमलेश बाबू ने उलहाने भरे स्वर में कहा ।
“कभी समझा है बूढ़ा क्यों कहते हैं
बूढ़ा जिसके सब अंग धीरे धीरे अपनी क्षमता से कम काम करते हैं आँखे , जोड़ पाचन इत्यादि पर एक ज़ुबान ज़्यादा चलती है सारा दिन बुढ बुढ तभी बूढ़ा “ कहते हुए कर्नल वर्मा ने ज़ोर से ठहाका लगाया |
कमलेश बाबू बुज़ुर्ग बनो, जिसके पास
ब से बहुत , ज़ से ज़िंदगी का तज़ुर्बा है और ग से गर्व है की वो आनेवाली पीढ़ी को दे रहे है जिस दिन ये समझ जाओगे ख़ुश रहोगे.. तुम्हें उन्हें सही दिशा दिखानी है उपदेश नहीं देना ,उठो एक चक्कर और लगाते है हाथ बढ़ा कमलेश बाबू को साथ ले कर्नल वर्मा चल पड़े।

शिवानी खन्ना, दिल्ली