टाइगर का गांव में आना,वन विभाग को चेतावनी,निवाला बनने से बची महिला - rashtrmat.com

टाइगर का गांव में आना,वन विभाग को चेतावनी,निवाला बनने से बची महिला

राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। जिला मुख्यालय से 07 किलोमीटर दूर ग्राम बरबसपुर में शुक्रवार को तड़के करीब छह बजे कमला उईके का आमना सामना बाघ से हो गया। बाघ और महिला के बीच की दूरी महज दस फीट थी। एक पल की चूक कमला उईके की जान ले सकती थी, लेकिन किस्मत और सूझबूझ ने कमला उईके का साथ दिया और बाघ बिना हमला किए जंगल की ओर निकल गया। यह घटना केवल एक महिला के बच जाने की कहानी नहीं है बल्कि, यह वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था और बाघ मानव के बीच बढ़ते टकराव व संघर्ष की बढ़ती गंभीरता का जीता जागता उदाहरण है।


सामने बाघ खड़ा था
कमला उईके के अनुसार वह रोजमर्रा के काम से सुबह घर के पीछे की ओर गई थी। लौटते समय जैसे ही वह घर के पास पहुंची अचानक उसकी नजर सामने खड़े बाघ पर पड़ी। कुछ पल के लिए उसकी सांसें थम गईं। सामने बाघ था पूरा ताकतवर चैकन्ना और बेहद करीब। महिला ने हिम्मत नहीं हारी शोर नहीं मचाया और बिना घबराए धीरे धीरे खुद को सुरक्षित करने की कोशिश की। शायद यही उसकी समझदारी उसकी जान बचा गई। कुछ ही पलों बाद बाघ वहां से मुड़कर जंगल की दिशा में चला गया। उसके बाद महिला बिना देरी किये घर पहुंची और परिजनो को जानकारी दी। जैसे ही घटना की जानकारी गांव में फैली पूरे बरबसपुर गांव में हड़कंप मच गया।


बाघ के पगमार्क मिले
ग्रामीणों ने तत्काल वन विभाग को सूचना दी। सूचना मिलते ही वन अमला गांव पहुंचा और पूरे गांव की मानीटिरिंग की। लोगों को सतर्क रहने और जंगल की ओर अकेले न जाने की हिदायत देते हुए गांव में मुनादी कराई गई। मौके पर बाघ के ताजा पगमार्क भी मिले जिससे यह पुष्टि हुई कि बाघ गांव के सामने वाले जंगल की ओर गया है। पगमार्क के आधार पर जंगल में गश्त शुरू कर दी गई और बाघ की गतिविधियों पर नजर रखने की बात कही गई। लेकिन यहीं से सवाल खड़े होते हैं. क्या सिर्फ मुनादी और हिदायतें काफी हैं,जब बाघ गांव की दहलीज तक आ चुका है तब क्या यह मान लिया जाए कि सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चैकस है।
सिमटा जंगल,बाहर आते जानवर
बालाघाट समेत आसपास के इलाकों में बाघों की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। सम्पूर्ण बालाघाट जिला वनों से घिरा है और कुछ ईलाकों में बाघ तेंदुए का मुमेंट बना रहता है। जिसे टाइगर कारिडोर के रूप में जाना जाता है। लेकिन इस वर्ष जिस तरह से बाघ आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं और इंसानो व बाघों के बीच टकराव बढ़ रहा है। यह चिंता का विषय बनता जा रहा है। जंगल सिमट रहे हैं, मानव बस्तियां बढ़ रही हैं और इसी के साथ इंसान और बाघ के बीच टकराव की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं। बरबसपुर की यह घटना कोई अपवाद नहींए बल्कि एक चेतावनी है। इससे पहले भी जिले के कई गांवों में बाघों के घुसनेए मवेशियों के शिकार और यहां तक कि इंसानी जान जाने की घटनाएं हो चुकी हैं। बावजूद इसकेए ठोस और स्थायी समाधान आज भी सवालों के घेरे में है।


गांवों में पर्याप्त फेंसिग का अभाव
वन विभाग का दावा है कि वह लगातार गश्त कर रहा है और बाघों की मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है। लेकिन बाघों का रहवासी ईलाकांे की ओर मुमेंट निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। क्या जंगलों में भोजन और पानी की कमी बाघों को आबादी की ओर धकेल रही है, या फिर टाइगर कारिडोर और बफर जोन की व्यवस्थाएं केवल कागजों तक सीमित रह गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें सिर्फ घटना के बाद चेतावनी दी जाती है, लेकिन पहले से कोई ठोस इंतजाम नहीं होते। न तो पर्याप्त फेंसिंग है न ही गांवों के आसपास नियमित पेट्रोलिंग।


क्यों बाघ जंगल छोड़ रहे हैं
जानकारो का मानना है कि बाघ और इंसानो के बीच बढ़ते टकराव को रोकने के लिए केवल तात्कालिक कदम नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है। गांवों के आसपास मजबूत बाड़, पर्याप्त रोशनी, लगातार पेट्रोलिंग रियल टाइम ट्रैकिंग सिस्टम और स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करना बेहद जरूरी है। साथ ही जंगलों में बाघों के लिए पर्याप्त शिकार और पानी की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।

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