एकल - rashtrmat.com

एकल

लघु कथा

अब मै रोज़ शाम को लाइट आन करके बाल्कनी में चाय पीती हूँ… और हम हाथ हिलाकर एकदूसरे से विदा लेते हैं..। दोनों जोर से हँस कर गुडनाइट बोलते हैं..मै भी खुल कर हँस देती हूँ…….लगता है… बेटा बहू बस.. बगल के कमरे मे हैं..।

रोज़ शाम लगभग 7-8 बजे सामने फ्लैट की लाइट जलती है…।उसी समय मै अपनी बाल्कनी की लाइट बुझा देती हूँ..।

मुझे लगता है मेरी बाल्कनी की लाइट उनके एकांत में व्यवधान डालेगी…।

उनकी गुटरगूँ उनकी हँसी से मेरा सन्नाटा टूटता है..

दोनों रोज बाल्कनी मे बैठ कर चाय पीते… आफिस की बातें डिस्कस करते… कभी कभी अपने साथियों की खिल्ली उडा़ कर ठहाके भी लगाते….। बडा़ खुशमिजाज जोडा़ है।

एक दिन सुबह सुबह डोर बेल घनघनाने लगी। दरवाजा खोला… तो चौंक गयी…। सामने वाला जोडा़ सामने खडा था..।

दोनों बेहिचक अंदर आगये… । लड़की बोली,”मै इरा हूँ, और ये आकाश…आप दो दिन से बाल्कनी में दिखाई नही दी….इसलिये आपसे मिलने चले आये… आप ठीक तो हैं?”

लगा शर्म के मारे जमीन मे गड़ जाऊं… मैने कहा,”बेटा मै ठीक हूँ….घर मे अकेली रहती हूँ.. शाम को तुम लोगों की हँसी तुम्हारी आवाजों से मेरा मन भर जाता है..लगता है… है कोई मेरे आसपास…।

आकाश बोला,”आंटी हमलोगों को भी आपको देख कर अच्छा लगता है,… लगता है हम भी अपने बुजु़र्ग की छाया में महफ़ूज हैं”। शायद उसे मेरी हिचकिचाहट, शर्म का अहसास हो गया था..।

दोनों मेरे पैर छूकर आफिस के लिये निकल गये।

यूँ लगा जैसे मेरे ही बेटा बहू आफिस के लिये निकले हों..।

अब मै रोज़ शाम को लाइट आन करके बाल्कनी में चाय पीती हूँ… और हम हाथ हिलाकर एकदूसरे से विदा लेते हैं..।

दोनों जोर से हँस कर गुडनाइट बोलते हैं..मै भी खुल कर हँस देती हूँ…….लगता है… बेटा बहू बस.. बगल के कमरे मे हैं..।

Vandana Pandey

Vandana.oasis@gmail.com

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *