डॉ नीलिमा पाण्डेय\ गीतिका - rashtrmat.com

 डॉ नीलिमा पाण्डेय\ गीतिका

डॉ नीलिमा पाण्डेय की गीतिकाओं के भाव अलग-अलग हैं, लेकिन  केंद्र में प्रेम, विरह और स्मृति की गहरी अनुभूति है। मिलन की आकांक्षा, प्रेम में अधिकार, रूठने-मनाने की चंचलता और प्रिय के आने की प्रतीक्षा का भाव है। प्रिय के अचानक सामने आ जाने से जीवन में जैसे त्योहार उतर आता है।

 

            गीतिका

प्रेम भाँवर लूँ, जताऊँ तुम पे मैं अधिकार सौ,

तुम यूँ ही रूठो, मनाऊँ मैं करूं मनुहार सौ।

मन भटकता है किए जाता है सबकी अनसुनी ,

रोकने की कोशिशें कर ली हैं बारम्बार सौ ।

जिद मेरी अड़ियल अभी भी है खड़ी उस ठौर पर,

खाई गिर-गिर के भले ही अब तक उसने हार सौ।

खोजती हैं आँखें मेरी, बस वही सपना सुखद,

जिसमें उनके आने से ही होते थे सिंगार सौ।

यूँ अचानक देख उनको, छा गईं ख़ुशियाँ अनेक,

एक ही दिन पड़ गए हों जिस तरह त्योहार सौ।

जब भी आकर मिल सकोगे, मेरे प्रिय, मेरे सनम,

सँग में आएँगी बहारें, प्रीति की बौछार सौ।

नयन बाउर हो गए, औ रँग सलोना चढ़ गया।

देखकर उनको है गूँजी कानों में झंकार सौ।

ऐसे तो सब सुख मिला है ऐ सखी ससुराल में,

फिर भी बपई को जो देखूं, बहती गंगाधार सौ।

2

बन गई हूॅं नर्मदा अब उलटे ही मैं बह रही हूॅं।

वेदना उर में लिए मैं,राह एकल चल रही हूॅं।

इक कन्हैया के लिए,मीरा हुई है क्षत-विक्षत,

रोती मूरत देखती हूॅं नयन प्यासा पढ़ रही हूॅं।

नभ निहारूॅं जब धरा से सप्तॠषि के झुंड को,

मैं अकेली क्यों धरा पर?गहन चिंतन कर रही हूॅं।

काॅंपते हैं हाथ दोनों सुख सभी ओझल हुए,

वक्त के चट्टान पर मैं देव मूरत गढ़ रही हूॅं।

तुम जहाॅं हो खुश रहो बस प्रार्थनाऍं हैं सदा,

ले तुम्हारी याद’नीलम’अश्रु मोती जड़ रही हूॅं।

3

नई है क्या,मुझे हर बात ही लगती पुरानी है।

कहीं राधा,कहीं शबरी,कहीं मीरा दिवानी है।

उठी जो आग भीतर से तो भस्मीभूत कर देगी,

सभी गांवों के खंडहर की सुनीं बीती कहानी है।

जो भटकी राह से औरत कभी ना लौट पाई फिर,

फटा आंचल,दबी सांसें,भरा ऑंखों में पानी है ।

वही खटिया,वही माचा,खटोला वो ही टूटा सा,

बगीचे, फ़ूल, तितली हैं, बसी यादों में नानी है।

रहोगे साथ कितने दिन!गहोगे हाथ कब तक तुम!

है जीवन चार दिन ‘नीलम’ यही संतों की बानी है।

4

खरे थे सिक्के जो खोटे निकल गए कैसे,
फटी सी नोट से थे लोग चल गए कैसे।

कहा थे लाएँगे सूरज को कैद करके वो,
तपन तनिक सी हुई तो बदल गए कैसे।

मलय समीर बहा और प्रेम जाग गया,
समझ न आए कि हम कब मचल गए कैसे?

धरा में थे कहीं कंकड़, कहीं थी पथरीली,
हरे हैं पेड़ खड़े देखो फल गए कैसे।

सबेर साँझ सुहावन तो थे लुभावन भी,
पर इतनी तेज़ी से दिन अच्छे ढ़ल गए कैसे?

अलग सी राह थी, वो दूर के ही थे साथी,
क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे?

जली थी आग उठे ज़लज़ले से थे ‘नीलम’,
सभी ही देख के बस हाथ मल गए कैसे?

डॉ नीलिमा पाण्डेय, मुंबई
MO-7045547501