आज जब विकास को सड़कों, बिजली, कारखानों और मशीनी सुविधाओं से आँका जा रहा है, ऐसे समय में रमेश कुमार ‘रिपु’ की पुस्तक ‘नया दौर’ एक ज़रूरी सवाल खड़ा करती है-क्या विकास वही है, जिसमें इंसान ही बेदखल हो जाए।
–कौशलेश तिवारी,\समीक्षक
“नया दौर” सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, यह आज के समय का दस्तावेज़ है। लेखक ने सादगी से बड़े सवाल उठाए हैं। ज़मीन, जंगल, पानी, झूठा विकास, अनपढ़ों का शोषण,वह इसे साहित्य से आगे सामाजिक हस्तक्षेप बना देता है।“नया दौर” असल में चेतावनी है-कि अगर विकास में इंसान पीछे छूट जाए,तो वह दौर नया नहीं,सबसे खतरनाक दौर होता है।
यह कहानी पूछती है-“जिस तरक्की में आदमी बेघर, बेरोज़गार और बेआवाज़ हो जाए,क्या वह सच में तरक्की है?”मेरी राय में, यह कहानी आज के समय की सबसे ज़रूरी कहानियों में से एक है।
-मेरी ईमानदार राय नया दौर” की कहानी की सबसे बड़ी ताक़त उसका आख़िरी दृश्य है,कुत्ते को चावल देना। यह दृश्य किसी भाषण से ज़्यादा तीखा है।
-बुज़ुर्ग का पात्र गांधीवादी चेतना जैसा है-जो पहले ही सच देख लेता है, लेकिन भीड़ उसे समझने में देर कर देती है।भाषा सरल है, पर असर गहरा है-यह लोक-साहित्य की परंपरा में आती है, जहाँ आम आदमी खुद को पहचान लेता है।
-“नया दौर” का साहित्यिक महत्व-यह कहानी कॉरपोरेट विकास बनाम मानवीय विकास की बहस को जमीन पर लाती है।यह ग्रामीण भारत की उस पीड़ा को दर्ज करती है, जिसे अक्सर आंकड़ों में दबा दिया जाता है।यह आने वाले समय में संदर्भ कथा बन सकती है-खासकर आदिवासी, किसान और विस्थापन के सवालों पर। तरक्की के नाम पर छीनी गई ज़मीन की कहानी है।
आज जब विकास को सड़कों, बिजली, कारखानों और मशीनी सुविधाओं से आँका जा रहा है, ऐसे समय में रमेश कुमार ‘रिपु’ की पुस्तक ‘नया दौर’ एक ज़रूरी सवाल खड़ा करती है—
क्या विकास वही है, जिसमें इंसान ही बेदखल हो जाए?
इसी संग्रह की एक कहानी है“जिन्दगी की बैलेस शीट” कहानी नैतिक पतन, अपराधबोध, स्त्री-पुरुष संबंधों की विकृति, और प्रेम की पुनर्व्याख्या पर आधारित एक गहरी सामाजिक कथा है। यह पाठक को सहज नहीं रहने देती-और यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।
यह कहानी पाठक को सहज नहीं रहने देती, बल्कि उसे सोचने के लिए मजबूर करती है कि बीमारी से बड़ा अभिशाप सामाजिक बहिष्कार और अकेलापन है। भाषा सहज, संवाद प्रभावी और विषयवस्तु साहसिक है। यह कहानी हिंदी कथा साहित्य में गंभीर विमर्श के योग्य है।विषय की निर्भीकता-एचआईवी, कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार, देह के बदले लाभ, और बदले की मानसिकता-ये सब विषय हिंदी कथा-साहित्य में आज भी कम छुए जाते हैं। आपने बिना लाग-लपेट के इन्हें सामने रखा है।यह कहानी डराती नहीं, सवाल करती है। प्रिया का चरित्र कहानी की आत्मा है।
उसका संवाद-“तुम्हारी जिंदगी की बैलेंस शीट कभी कमजोर नहीं होगी।
साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत सशक्त है।यहाँ प्रेम त्याग नहीं, स्वीकार बन जाता है।प्रिया कोई भोली नायिका नहीं, बल्कि पूरी जानकारी के बाद लिया गया निर्णय है-जो उसे असाधारण बनाता है।कहानी का सबसे बड़ा संदेश बीमारी से ज़्यादा ख़तरनाक है-अकेलापन और अपराधबोध।और प्रेम, यदि चेतना के साथ हो, तो वह मुक्ति बन सकता है।
“उपकार कहानी ग्रामीण भारत की मजबूरी, पलायन, सपनों और व्यवस्था की त्रासदी को बहुत सच्चे और मार्मिक ढंग से सामने रखती है। लखन का संघर्ष केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन लाखों मजदूरों का है जो बीमारी, गरीबी और उम्मीद के बीच पिसते रहते हैं। मां के इलाज के लिए खेत बिकना यहीं से कहानी का दर्द शुरू हो जाता है और पाठक भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है।
धनवंती कहानी की सबसे मजबूत कड़ी है।उसका “बड़े सपने देखने” का विचार प्रेरणादायक है। गांव के तानों और बनिए के बेटे की नीयत के बावजूद उसका आत्मसम्मान अडिग रहता है।वह पढ़ी-लिखी होकर भी हालात की शिकार है,यह यथार्थ को गहराई देता है।धनवंती केवल पत्नी नहीं, बल्कि आशा और विवेक का प्रतीक बन जाती है।
-कोरोना काल का चित्रण बेहद यथार्थवादी और हिला देने वाला है।
रेल पटरी पर सोते मजदूर, ट्रेन को ट्रक समझ लेना,यह दृश्य केवल कहानी नहीं, बल्कि हमारे समय का कड़वा सच है।यह हिस्सा कहानी को साधारण से उठाकर समकालीन दस्तावेज़ बना देता है।
कहानी की सबसे बड़ी ताकत इसकी विडंबना है-लखन ज़िंदा रहते हुए पक्का घर नहीं बना सका,
लेकिन उसकी मौत ने वह सपना पूरा कर दिया।शीर्षक “उपकार” बहुत गहरा और व्यंग्यात्मक अर्थ रखता है।यह उपकार लखन का नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का है जो मौत के बाद मुआवजा देती है, जीवन के लिए अवसर नहीं।लखन के पिता का अंतिम वाक्य कहानी को भीतर तक तोड़ देता है।
भाषा सरल, ग्रामीण और स्वाभाविक है संवाद छोटे लेकिन प्रभावी है। कहीं-कहीं वाक्य विस्तार से और कसे जा सकते हैं, लेकिन भाव की सच्चाई उसे ढक लेती है। समग्र मूल्यांकन “उपकार” एक संवेदनशील, सामाजिक और समय-साक्ष्य कहानी है।यह पाठक को रुलाती नहीं, बल्कि चुप करा देती है-और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। यह कहानी वास्तव में एक मौन चीख है—और वह बहुत दूर तक सुनाई देती है।
“चुभन कहानी सत्ता, भय, अफ़वाह और निजी स्वार्थ के गठजोड़ को उजागर करती है। मामूली-सी खेत की मेड़ से शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे इज़्ज़त, पहचान और अस्तित्व के सवाल में बदल जाता है। यही कहानी की सबसे बड़ी शक्ति है-छोटा कारण, बड़ा विनाश।
निरमा एक सामान्य खलनायिका नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो व्यक्तिगत बदले कोसामूहिक भय (नक्सलवाद) के सहारे सामाजिक बहिष्कार में बदल देती है।
उसका संवाद- “काली वर्दी वालों से मैं नहीं डरती”-यह बताता है कि उसे कानून से नहीं, केवल पने स्वार्थ के उजागर होने से डर है।
हूंगा के मन में है उसकी पहचान पर लगे झूठे दाग की है अपने ही गांव से निष्कासन की है।
अंतिम पंक्तियाँ कहानी को बहुत ऊँचाई देती हैं-“गांव हूंगा छोड़ रहा था लेकिन निरमा को लग रहा था कि वह गांव छोड़ रही है।”यह वाक्य अपराधबोध और नैतिक हार का गहरा संकेत है।
यह कहानी बताती है कि-अफ़वाह सबसे खतरनाक हथियार है।,डर के नाम पर किसी को भी खत्म किया जा सकता है गांव का समाज भी उतना ही क्रूर हो सकता है। जितना जंगल बेगुनाही की सबसे बड़ी सज़ा बदनामी है।“चुभन” एक सशक्त सामाजिक कथा है जो नक्सलवाद को हिंसा की नहीं,अफवाह और भय की राजनीति के रूप में प्रस्तुत करती है। एक गहरी, देर तक रहने वाली चुभन।
ऐसी कहानियाँ सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं, याद रखी जाती हैं।
लेखक- रमेश कुमार ‘रिपु’
प्रकाशक- न्यू वल्र्ड
कीमत- 300 रुपए
-कौशलेश तिवारी,रायपुर छत्तीसगढ़

—कौशलेश तिवारी,रायपुर छत्तीसगढ़
MO-7828128796
